Showing posts with label jagadguru kripalu. Show all posts
Showing posts with label jagadguru kripalu. Show all posts

Saturday, February 22, 2025

तन, मन, धन खोया गोविन्द राधे,

जगत में सोच तो जग तोहिं का दे।।

सरलार्थ - हे जीव! यदि तुमने अपना तन, मन और धन संसार और संसारियों की सेवा में लगा दिया तो उससे तुम्हें क्या मिलेगा? आनंदप्राप्ति की समस्या हल न होगी क्योंकि संसार में किसी के पास आनंद ही नहीं है जो माया के आधीन है, उल्टे त्रिगुणात्मक गुणों से युक्त संसार में इनका अटैचमेन्ट कर देने से बंधन ही होगा और 84 लाख में भटकना होगा। अतः इन तीनों का सार्थक उपयोग तो भगवान और महापुरुषों के निमित्त ही करना चाहिये क्योंकि वे आनंद के धाम हैं और आनंद उन्हीं की सेवा से मिलेगा।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...