Saturday, March 8, 2025

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी वस्तु में किया तो हमको फल मिलेगा नरक। अगर राजसी व्यक्ति या राजसी वस्तु में मन का लगाव किया तो फल मिलेगा मृत्युलोक। अगर सात्त्विक पर्सनैलिटी देवता आदि प्लस सात्त्विक वस्तुओं में मन का अटैचमेन्ट किया तो फल मिलेगा स्वर्ग और जब गुणातीत महापुरुष या भगवान् से प्यार किया, उनमें मन का लगाव किया तो भगवान् का सब मालटाल मिलेगा। बड़ी सीधी-सी बात है। गधे की अकल से समझ सकता है कोई। हमको क्या चाहिये ? ये हम तय कर लें, बस उसी से प्यार कर लें, छुट्टी। कोई तमाम नॉलेज की आवश्यकता नहीं है। संसार में देखो, बाजार में आप जाते हैं, खरीदने। तमाम सामान बिक रहा है, आपको क्या चाहिये ? एक ने कहा- हमको तरकारी, एक ने कहा- हमको कपड़ा, एक ने कहा- हमको जूता, एक ने कहा- हमको रसगुल्ला। ठीक है, जाइये आप लोग। अब जिसकी जहाँ जो दुकान मिली अपनी- अपनी, वहाँ वो खड़ा हो गया और उसने खरीदा और चला आया। अब बाजार लगा है, लगा रहे, हमसे क्या मतलब? हमको जो लेना है, अपनी जो पसन्द है, जो अपना aim है, उद्देश्य है उसके अनुसार हम उस दुकान पर गये और ले आये। वैसे ही हमको जो कुछ प्राप्तव्य हो, बस उसी पर्सनैलिटी में मन का अटैचमेन्ट करना है।

#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज


Sunday, February 23, 2025

गुरु कृपा

अनहोनी होनी नहीं, तू क्यों हुआ उदास ।

होनी भी टल जायेगी, रख गुरु में विश्वास ।।


जितने आये कष्ट सब, कर लेना मंजूर।

लेकिन गुरु के द्वार से, कभी न होना दूर ।।


अपने गुरु को छोड़कर, करे किसी की आस ।

निश्चित ही वह शिष्य फिर, करे नरक में वास ।।


बिना गुरु के तर सका, हुआ न कोई शूर।

फैल रहा चारों तरफ, मेरे 'कृपालु' सदगुरु का नूर ।।


गुरु चरणों में शिष्य के, दुःख कट जाते आप ।

पास न उसके आ सके, जग के तीनों ताप ।।


अपने गुरु से प्रीत जो, करता है निष्काम।

गुरु चरणों में ही बसे, उसके चारों धाम ।।


जितने भी तू कष्ट दे, सब मुझको स्वीकार।

लेकिन गुरु-सेवा विमुख, मत करना करतार ।।


कठिन परीक्षा में भी कभी, मत छोड़ो विश्वास।

खोट काटने शिष्य का, देते हैं सतगुरु त्रास ।।


!!!श्री सदगुरुदेव भगवान की जय !!!


।।जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की जय।।


Saturday, February 22, 2025

तन, मन, धन खोया गोविन्द राधे,

जगत में सोच तो जग तोहिं का दे।।

सरलार्थ - हे जीव! यदि तुमने अपना तन, मन और धन संसार और संसारियों की सेवा में लगा दिया तो उससे तुम्हें क्या मिलेगा? आनंदप्राप्ति की समस्या हल न होगी क्योंकि संसार में किसी के पास आनंद ही नहीं है जो माया के आधीन है, उल्टे त्रिगुणात्मक गुणों से युक्त संसार में इनका अटैचमेन्ट कर देने से बंधन ही होगा और 84 लाख में भटकना होगा। अतः इन तीनों का सार्थक उपयोग तो भगवान और महापुरुषों के निमित्त ही करना चाहिये क्योंकि वे आनंद के धाम हैं और आनंद उन्हीं की सेवा से मिलेगा।


प्रैक्टिकल से मतलब है, भावना से मतलब है। इसलिये उनकी इच्छा में इच्छा रखना, उनके सुख को ही लक्ष्य रखना। उनकी सेवा की ही सदा भावना रहे, उनको कभी दुःख न होने पाये। ऐसा क्यों किया, ये न कहना पड़े। ऐसा कोई काम हम न करें की उनको दुःख हो। उनके पास रिपोर्ट जाय या वो नोट करके हमको, दुःखी हों। हम सावधान रहें, हमेशा। ये शरणागति, एक दो घंटे की नहीं होती। शरणागति सदा करनी पड़ेगी। निरंतर जैसे 'मैं' को निरंतर रियलाइज़ करते हो। ऐसे ही शरणागति भी निरंतर करनी होगी। थोड़ी देर के लिये शरणागत हो गये और आँसू भी निकल गये, और 'हम बड़े बेवकूफ हैं, गधे हैं, दीन हैं, पापी हैं' - ये फीलिंग भी हो गई, फिर भूल गया। और फिर विपरीत चिंतन कर रहे हैं भगवान् के, गुरु के। ये सब दोगली बातें नहीं करनी होगी। एक लक्ष्य रखना होगा।

इसलिये हर समय सावधान रहना पड़ेगा पहले। जैसे जब पहले-पहले आप लोग साइकल चलाते हैं, कार चलाते हैं, बहुत सावधान रहते हैं। फिर अभ्यास जब हो जायगा तब फिर बात भी कर रहे हैं फोन से भी और गाड़ी भी चल रही है, पीछे आदमी एक साइड मांग रहा है, वो भी दे रहे हैं, सब काम हो रहा है। लेकिन पहले तो बहुत सावधान रहना पड़ेगा।

Tuesday, November 15, 2022

 #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_की_प्रचारिका #सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_विशेष_लेख!

मानव देह प्राप्त सभी जीव परम सौभाग्यशाली हैं। देवताओं से भी अधिक बड़भागी
हैं। नारद पुराण में कहा गया -

‘दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि‘

अर्थात् देवता भी इस देह को पाने के लिए लालायित रहते हैं लेकिन यह देह उनके
लिये भी दुर्लभ है। रामायण कहती है -
‘कबहुँक करि करुणा नर देही, देत ईश बिनु हेतु सनेही‘
ये तो कभी कभी किसी बड़भागी को भगवत्कृपा से प्राप्त होता है। अर्थात् 84 लाख
प्रकार के देहधारियों में केवल मनुष्य देहधारी ही सर्वश्रेष्ठ है। वेदों, शास्त्रों में सर्वत्र इस देह
की भूरि भूरि प्रशंसा की गई है। ज्ञान प्रधान एवं विशेषतः कर्म प्रधान होने के कारण ही
इसकी वंदना की गई है। पुरुषार्थ करने का अधिकार केवल मनुष्य को प्राप्त है। भक्ति रूपी
पुरुषार्थ के द्वारा इसमें भगवान को प्राप्त करके जीव सदा सदा के लिए कृतार्थ हो सकता है,
आनंदित हो सकता है और एकमात्र भगवत्प्राप्ति के उद्देश्य से ही ये देह हमें दिया गया है।
अर्थात् ये देह एक अनमोल हीरे के समान है जो हमारे कल्याण के लिए भगवान द्वारा उपहार
स्वरूप हमें प्रदान किया गया है। लेकिन इसका मूल्य न समझने के कारण ही अधिकांश लोग इस देह द्वारा सासरिक विषयों का उपभोग करके निरंतर इसका दुरुपयोग कर रहे हैं, इसके
एक-एक मूल्यवान क्षण को व्यर्थ गँवा रहे हैं। संसार में आसक्त होने, दैहिक सुखों को लक्ष्य
बनाने का परिणाम केवल 84 लाख योनियों में भ्रमण करते हुए अनंतानंत दुःख भोगना ही है।
इसीलिए ऐसे अविवेकी मनुष्य को तुलसीदास जी ने आत्महत्यारा कहा है -
‘जो न तरै भवसागर नर समाज अस पाई,
सो कृत निंदक मंदमति आतमहन गति जाई।‘
अतएव विवेकी पुरुष को इस देवदुर्लभ अमूल्य रत्न रूपी देह का महत्व समझकर
इसके द्वारा अपने परम चरम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति के लिए ही प्रयास करना चाहिए अन्यथा
‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्‘ बारंबार जन्म मरण का चक्र चलता
रहेगा और अनेकानेक दुःख सहता हुआ जीव इस भवाटवी में घूमता रहेगा। जैसे हाथ में आए
रत्न को फेंक देना नासमझी है, इसी प्रकार इस अनमोल मानव देह रूपी रत्न का मूल्य न
समझकर संसार में इसका दुरुपयोग करना भी पराकाष्ठा का अज्ञान है।

Thursday, May 21, 2020


सदा सर्वत्र हर श्वाँस के साथ '#राधे' नाम का जप करो।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु की जय।
जय-जय श्री राधे।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...