Monday, August 29, 2011


Samast ved, Shastro Mein Kalikaal mein  Bhavrog Ke Nidan Ke liye Ek Matra Harinaam Sankirtan ko hi Aushadhi bataya gaya hai. Kalyug mein  Shree Radha-Krishna ka Gunanuvaad hi Samast Bhavrogiyo ke liye Rambaan Aushadhi hai. Kintu Iss Ghor Kalikaal mein Anek Agyanio, Asanto dwara Ishwarprapti ke anek Mangadhant Margo, Anekaanek Sadhanao ka Nirupan sunkar Bhole Bhale Manushya kore Karmakand aadi mein  Pravriit hokar Bhraant ho rahe hai.

Aise me Agyaan , Andhkaar mein  dube Jeevo ka Vastavik Margdarshan karte hue Sant Shiromani Bhagtiyog Rasavtaar Iss Yug ke Parmacharya Pancham Mool JAGADGURU SHREE KRIPALUJI MAHARAJ ke Divya Prem Ras se Aotprot Swarachit Adwitya Braj Ras Sankirtano Dwara Roopdhyan ke Sarvasugam, Sarvasadhya Sarlaatisaral Paddhatti se pipasu Jeevo ko Hari Namamritt ka Paan karakar Ishwariya Prem mein  Sarabor kar rahe hai.

PREM RAS MADIRA.....प्रकीर्ण माधुरी...Padd no-21.श्री राधे हमारी सरकार,फिकिर मोहि काहे की|
हित अधम उधारन देह धरे,
बिनु कारन दिनन नेह करे,
जब ऐसी दया दरबार ,फिकिर मोहि काहे की|
...तुक निज-जन क्रंदन सुनी पावे,
तजि श्यामाहू निज जन पह धावे,
जब ऐसी सरल सुकुमार,फिकिर मोहि काहे की|
भृकुटी नित ताकत ब्रह्मा जाकी,
ताकि शरनाई डर काकी,
जब ऐसी हमारी सरकार,फिकिर मोहि काहे की|
जो आरत "मम स्वआमीनी!" भकैई ,
तेहि पुतरिन सम आखिन राखै|
जब ऐसे "कृपालु" रिझवार ,फिकिर मोहि काहे की||
जब किशोरी जी हमारी स्वामिनी है तब मुझे किस बात की चिंता है?
जो पतितो के उद्धार के लिए ही अवतार लेती है ,औरअकारण ही दीनो से प्रेम करती है.
जब हमारी स्वामिनी के दरबार में इतनी अपार दया है,तब मुझे किस बात की चिंता है.
हमारी स्वामिनी जी अपने शरणागत की थोड़ी भी करुण पुकार सुनते ही अपने प्राणेश्वर श्यामसुंदर को भी छोड़कर अपने जन के पास तत्क्षण अपनी सुधि-बुधि भूलकर दौड़ आती है.
जब हमारी किशोरी जी इतनी सुकुमार और सरल स्वभाव की है,तब मुझे किस बात की चिंता है.
ब्रह्म श्रीकृष्ण भी जिनकी बोहे देखते रहते है अर्थात प्यारे श्यामसुंदर भी जिनके संकेत से चलते है,उनके शरण में जाकर फिर किसका भय है.
जब ऐसे स्वामिनी जी हमारी रक्षा करने वाली तब मुझे किस बात की चिंता है.
जो शरणागत होकर दृढ़ निष्ठापूर्वक "मेरी स्वामिनी जी!" ऐसा कह देता है,उसे स्वामिनी जी अपनी आंखोंकी पुतली के सामान रखती है.
"श्री कृपालुजी" कहते है----- की जब हमारी स्वामिनी जी शरणागत से इतना प्यार करती है तब मुझे किस बात की चिंता है


GOLDEN OPPURTUNITY FOR JAIPURITES: JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ KI PRACHARIKA SUSHREE SHREEDHARI JI DEVI DWARA DIVYA ADHYATMIK PRAVACHAN AVAM RASMAY SANKIRTAN KA AYOJAN.

DATE:18th SEPTEMBER TO 02nd OCTOBER,2011.
TIME:6.30P.M. TO 8.30P.M.
PLACE:GANESH MANDIR SATSANG BHAWAN,TARANAGAR-'A',JHOTWARA JAIPUR.
FOR FURTHER DETAILS:CONTACT:9314887735.
गहो रे मन ! श्याम चरण शरणाई ।
अंत समय कोउ काम न अइहैं मात पिता सुत भाई ।
काम क्रोध... अरु लोभ मोह मद इन सों कछु न बसाई ।
यह जग मृग तृष्णा सम दिखत सुख लवलेश न पाई ।
धन यौवन तन छन भंगुर सब ज्यों कपूर उडि जाई ।
...बहुरि 'कृपालु' न नर तनु पाइय बिगरी लेहु बनाई ॥
(Prem Ras Madira)

O mind! Take shelter of Shyamsunder's soft Lotus Feet.
Ones you call your own: mother, father, brother and son, will not accompany you after death.
Moreover, there is no other way of escaping from the clutches of demons like Lust, Anger, Greed, Attachment and Pride.
This world is like a mirage, containing not even a trace of happiness..
Wealth, youth and life are temporary, disappearing like camphor.
Says Shree ‘Kripalu’, “O mind! You will not be blessed with a human body again and again. Therefore, do not delay in improving your pitiable condition.”
कान्ह ! हम सुने तुमहिं भगवान !
साँचु बताउ मोहिं मनमोहन, कहहुँ न काहुहिं आन |
मोहिं परतीति होति नहिं नेकहुँ, हौं तुम कहँ भल जान |
षडैश्वर्य परिपूर्ण सुन्यों हौं, है याकी पहिचान |
तुम्हरे तो एकहुँ नहिं दीखत, पुनि हम लें कत मान |
...मोहिं समुझाउ सौंह तोहिं मोरी, सुनहु सखी ! कह कान्ह |
होत विभोर ‘कृपालु’ प्रेम लखि, रहत न शक्तिहिं भान ||

भावार्थ- एक भोली-भाली सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर ! मैंने सुना है कि तुम्हीं भगवान् हो | हे मनमोहन ! मुझसे सच्ची-सच्ची बात बता दो, मैं किसी से नहीं बताऊँगी | मुझे तो थोड़ा भी विश्वास नहीं होता, क्योंकि मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से भली-भाँति परिचित हूँ | मैंने सुना है कि भगवान् छहों ऐश्वर्यों (समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य) से परिपूर्ण होता है | तुम्हारे भीतर तो इन ऐश्वर्यों में एक भी नहीं दिखाई पड़ता | फिर हमें विश्वास कैसे हो ? यदि तुम सचमुच भगवान् हो तो मेरी सौगन्ध है मुझे समझा दो | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में श्यामसुन्दर ने कहा कि मेरे भीतर छहों ऐश्वर्यों की शक्तियाँ हैं किन्तु भक्तों के प्रेम में मैं इतना विभोर हो जाता हूँ कि मुझे उन शक्तियों का बिल्कुल भान ही नहीं रहता |

(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
श्रुति सिद्धांत सार...........

 -------जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज(१) भगवान, जीव एवं माया तीनों नित्य हैं , किन्तु जीव एवं माया का शासक भगवान ही है ।
(२) जीव आनंद चाहता है ;... क्योंकि वह आनंद स्वरूप भगवान का सनातन अंश है ।
(३) आनंद अनंत मात्र का होता है एवं अनंत काल का होता है ।
(४) संसार का आनंद सीमित एवं नश्वर है । वह दिव्य जीव का विषय ही नहीं है ।
(५) संसार में न सुख है , न दुख है , हमारी मान्यता से ही सुख या दुख मिलता है ।
(६) संसार में राग भी न हो एवं द्वेष भी न हो , यही सच्चा वैराग्य है ।
(७) अनादि माया के कारण ही आनंद रूपी भगवान का अंश जीव अपने अंशी भगवान से विमुख है ।
(८) अंश जीव का अंशी भगवान के सन्मुख होना ही एक मात्र औषधि है ।
(९) जीव दिव्य तत्व है ; अतः उसका लक्ष्य भी दिव्यानन्द स्वरूप भग्वत्प्राप्ति ही है ।
(१०) संसार पंच महाभूत का है , शरीर भी भौतिक है, अतः भौतिक शरीर के हेतु ही भौतिक संसार है ।
(११) भगवान इंद्रिय, मन, बुद्धि से परे है ; क्योंकि इंद्रिय, मन, बुद्धि मायिक हैं ।
(१२) भग्वत्प्राप्ति केवल भग्वत्कृपा से ही संभव है , अन्य कर्म , ज्ञानादि किसी भी साधन से असंभव है ।
(१३) भग्वत्कृपा के हेतु अन्तः कारण शुद्ध करना होगा । यह कार्य वास्तविक गुरु की सहायता से ही होगा ।
(१४) वास्तविक गुरु तत्वज्ञानी एवं भगवतप्रेम प्राप्त होना चाहिए ।
(१५) अन्तःकरण की शुद्धि के हेतु एक मात्र भग्वत्भक्ति ही साधन है , अन्य कोई मार्ग नहीं।
(१६) भक्ति के अनेक भेद् है , किन्तु श्रवण, कीर्तन एवं स्मरण तीन ही प्रमुख हैं ।
(१७) सर्वप्रमुख स्मरण भक्ति ही है, अन्य इंद्रियादिकों की भक्ति हो या न हो ।
(१८) भक्ति मे अनन्यता परम आवश्यक है । भक्ति , भक्त, भगवान के अतिरिक्त मन की आसक्ति अन्यत्र न हो ।
(१९) शुद्ध भक्ति में संसारी विषय सुख अथवा मोक्ष की भी कामना न रहे ।
(२०) संसारी कामना ही दुखों का मूल है ; क्योंकि कामना पूर्ति पर लोभ एवं अपूर्ति पर क्रोध बदता है ।
(२१) भगवान का नाम , रूप , गुण , लीला , धाम एवं उनके भक्त सब एक ही हैं , इनमे कहीं भी मन का अनुराग अनन्यता ही है ।
(२२) भगवान के साथ – साथ गुरु की भक्ति भी अनिवार्य है, क्योंकि गुरु द्वारा ही साधक का स्वार्थ सिद्ध होगा ।
(२३) हरि गुरु का रूप ध्यान करते हुए रोकर ही साधना करनी है । स्वयं को अति पतित , दीन मानना है ।
(२४) हरि गुरु में निष्काम भाव से मन लगाना ही साधना है एवं उनमे मन लग जाना ही सिद्धि है ।
(२५) निंदनीय की भी निंदा करना या सुनना कुसंग है , स्वयं में ही दोष देखना है ।
(२६) सदा सर्वत्र हरि गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानना है , कभी स्वयं को अकेला नहीं मानना है ।
(२७) संसारी वस्तु का त्याग वास्तविक त्याग नहीं है वरन मन की आसक्ति का त्याग ही त्याग है ।
(२८) हरि और गुरु से जितना विशुद्ध प्रेम होगा , उतना ही संसार से सच्चा वैराग्य होगा ।
(२९) मन से हरि गुरु ने अनुराग करना एवं तन से संसार का कर्म करना ही कर्मयोग है ।
(३०) मानव देह देव दुर्लभ है , किन्तु क्षण भंगुर है; अतः तत्काल साधना करनी है ।
(३१) तन मन धन से हरि गुरु सेवा करना ही सेवक कर्तव्य है , सेवा से ही शीघ्र मन शुद्ध होगा ।

Sunday, August 28, 2011

THE PURIFICATION OF THE HEART IS ONLY POSSIBLE THROUGH DEVOTIONAL PRACTICE AS INSTRUCTED BY YOUR GURU.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...