This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, August 31, 2011
Meri Radheyrani prem roop ras khaani ,
Jaaki kare poorna brahma Shyam agwaani..
Meri aisi Radheyrani brajras khani ,
Jaake paache paache dolen saarangpaani ..
...Meri Radheyrani prem roop ras khani ,
Jai ho jai ho jai ho vrindavan thakuraani..
Meri aisi Radheyrani , braj thakuraani ,
Jehi Hari ne bhi nij swamini maani ..
------ Braj Ras Madhuri Part -3 Parisisht
-------- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
Jaaki kare poorna brahma Shyam agwaani..
Meri aisi Radheyrani brajras khani ,
Jaake paache paache dolen saarangpaani ..
...Meri Radheyrani prem roop ras khani ,
Jai ho jai ho jai ho vrindavan thakuraani..
Meri aisi Radheyrani , braj thakuraani ,
Jehi Hari ne bhi nij swamini maani ..
------ Braj Ras Madhuri Part -3 Parisisht
-------- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
ज्ञान की परिभाषा गोविंद राधे।
जिससे बढ़े नित प्रेम श्याम का बता दे।।
कोटि कल्प सिर मारे गोविंद राधे।
भक्ति बिनु ब्रह्म ज्ञान हो ना बता दे।।
...
भक्ति बिनु ज्ञानी ज्ञान गोविंद राधे।
मिथ्या ज्ञानाभिमान बढ़ा दे।।
ज्ञान वैराग्य दोनों गोविंद राधे।
भक्ति महारानी के पुत्र हैं बता दे।।
भक्ति का मार्ग सरल गोविंद राधे।
नाव पर बैठो हरि पार करा दे।।
सर्व वेदान्त सार गोविंद राधे।
श्रीकृष्ण भक्ति वेदव्यास बता दे।।
प्रेम की सीमा नहीं गोविंद राधे।
किन्तु बढ़ता ही जाये सर्वदा बता दे।।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु
जिससे बढ़े नित प्रेम श्याम का बता दे।।
कोटि कल्प सिर मारे गोविंद राधे।
भक्ति बिनु ब्रह्म ज्ञान हो ना बता दे।।
...
भक्ति बिनु ज्ञानी ज्ञान गोविंद राधे।
मिथ्या ज्ञानाभिमान बढ़ा दे।।
ज्ञान वैराग्य दोनों गोविंद राधे।
भक्ति महारानी के पुत्र हैं बता दे।।
भक्ति का मार्ग सरल गोविंद राधे।
नाव पर बैठो हरि पार करा दे।।
सर्व वेदान्त सार गोविंद राधे।
श्रीकृष्ण भक्ति वेदव्यास बता दे।।
प्रेम की सीमा नहीं गोविंद राधे।
किन्तु बढ़ता ही जाये सर्वदा बता दे।।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु
अनुपम रूप नीलमणि को री |
उर धरि कर करि हाय ! गिरत सोइ, लखत बार इक भूलेहुँ जो री |
प्रति अंगनि छवि कोटि अनंगनि, सुषमा-सुधा-सार-रस बोरी |
जिनहिंन अंगनि नैनन निरखत, तिनहिंन कहँ कह सरस बड़ो री |
नखशिख लखि सखि अँखियन हूँ ते, पलपल तलफति देखन को री |
...कह ‘कृपालु’ गागर महँ सागर, आव न यतन करोर करो री ||
भावार्थ- नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है | जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह ह्रदय पर हाथ रखकर एवं हाय ! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है | उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौंछावर हैं | ऐसी उनकी छवि सौन्दर्य के अमृत के सार के रस में डुबोई हुई है | एक विलक्षणता यह भी है – उनके नख से शिख तक समस्त अंगों को आँखों से देखकर तृप्ति नहीं होती है | उनके जिन अंगों को आँख देखती है उन्हीं अंगों को और अंगों से अधिक सरस अनुभव करती हैं | आँखें प्रतिक्षण पुनः पुनः देखने को तड़पती ही रहती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्राकृत इंद्रिय मन बुद्धि रूपी घड़े में दिव्यानन्द रूपी समुद्र नहीं समा सकता, भले ही कोई करोड़ों प्रयत्न क्यों न करे |
(प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
उर धरि कर करि हाय ! गिरत सोइ, लखत बार इक भूलेहुँ जो री |
प्रति अंगनि छवि कोटि अनंगनि, सुषमा-सुधा-सार-रस बोरी |
जिनहिंन अंगनि नैनन निरखत, तिनहिंन कहँ कह सरस बड़ो री |
नखशिख लखि सखि अँखियन हूँ ते, पलपल तलफति देखन को री |
...कह ‘कृपालु’ गागर महँ सागर, आव न यतन करोर करो री ||
भावार्थ- नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है | जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह ह्रदय पर हाथ रखकर एवं हाय ! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है | उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौंछावर हैं | ऐसी उनकी छवि सौन्दर्य के अमृत के सार के रस में डुबोई हुई है | एक विलक्षणता यह भी है – उनके नख से शिख तक समस्त अंगों को आँखों से देखकर तृप्ति नहीं होती है | उनके जिन अंगों को आँख देखती है उन्हीं अंगों को और अंगों से अधिक सरस अनुभव करती हैं | आँखें प्रतिक्षण पुनः पुनः देखने को तड़पती ही रहती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्राकृत इंद्रिय मन बुद्धि रूपी घड़े में दिव्यानन्द रूपी समुद्र नहीं समा सकता, भले ही कोई करोड़ों प्रयत्न क्यों न करे |
(प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






