Wednesday, August 31, 2011

Kishori Ji! Although I am known as Your devotee, yet I have great love for only worldly wealth and family members. Shri ‘Kripalu’ Ji says, “Bless me also with Your grace and gratify me by giving me Your selfless love.”
Shree Maharaj Ji says:

We wash our clothes with clean water to rid them of impurities. If we wash them with dirty water, they will only get worse. Similarly, we have to wash our hearts clean by inviting only pure personalities in. If we let the impure into our heart, it will only get worse.
Meri Radheyrani prem roop ras khaani ,
Jaaki kare poorna brahma Shyam agwaani..
Meri aisi Radheyrani brajras khani ,
Jaake paache paache dolen saarangpaani ..

...
Meri Radheyrani prem roop ras khani ,
Jai ho jai ho jai ho vrindavan thakuraani..
Meri aisi Radheyrani , braj thakuraani ,
Jehi Hari ne bhi nij swamini maani ..

------ Braj Ras Madhuri Part -3 Parisisht

-------- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
ज्ञान की परिभाषा गोविंद राधे।
जिससे बढ़े नित प्रेम श्याम का बता दे।।

कोटि कल्प सिर मारे गोविंद राधे।
भक्ति बिनु ब्रह्म ज्ञान हो ना बता दे।।
...

भक्ति बिनु ज्ञानी ज्ञान गोविंद राधे।
मिथ्या ज्ञानाभिमान बढ़ा दे।।

ज्ञान वैराग्य दोनों गोविंद राधे।
भक्ति महारानी के पुत्र हैं बता दे।।

भक्ति का मार्ग सरल गोविंद राधे।
नाव पर बैठो हरि पार करा दे।।

सर्व वेदान्त सार गोविंद राधे।
श्रीकृष्ण भक्ति वेदव्यास बता दे।।

प्रेम की सीमा नहीं गोविंद राधे।
किन्तु बढ़ता ही जाये सर्वदा बता दे।।

-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु
अनुपम रूप नीलमणि को री |
उर धरि कर करि हाय ! गिरत सोइ, लखत बार इक भूलेहुँ जो री |
प्रति अंगनि छवि कोटि अनंगनि, सुषमा-सुधा-सार-रस बोरी |
जिनहिंन अंगनि नैनन निरखत, तिनहिंन कहँ कह सरस बड़ो री |
नखशिख लखि सखि अँखियन हूँ ते, पलपल तलफति देखन को री |
...कह ‘कृपालु’ गागर महँ सागर, आव न यतन करोर करो री ||

भावार्थ- नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है | जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह ह्रदय पर हाथ रखकर एवं हाय ! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है | उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौंछावर हैं | ऐसी उनकी छवि सौन्दर्य के अमृत के सार के रस में डुबोई हुई है | एक विलक्षणता यह भी है – उनके नख से शिख तक समस्त अंगों को आँखों से देखकर तृप्ति नहीं होती है | उनके जिन अंगों को आँख देखती है उन्हीं अंगों को और अंगों से अधिक सरस अनुभव करती हैं | आँखें प्रतिक्षण पुनः पुनः देखने को तड़पती ही रहती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्राकृत इंद्रिय मन बुद्धि रूपी घड़े में दिव्यानन्द रूपी समुद्र नहीं समा सकता, भले ही कोई करोड़ों प्रयत्न क्यों न करे |

(प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

Tuesday, August 30, 2011

‎'SHRI KRISHNA' AND 'BLISS' ARE SYNONYMOUS WORDS.EVERY PERSON IN THE WORLD DESIRES ONLY BLISS.IN OTHER WORDS HE IS A SERVANT OF BLISS AND THEREFORE UNKNOWINGLY,A SERVANT OF SHRI KRISHNA.
------JAGADGURUTTAM BHAGWAN SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
"IF ALL THE OBJECTS OF THE UNIVERSE WERE AVAILABLE TO ONE MAN,THE DISEASE OF 'DESIRE' WOULD NEVERTHELESS KEEP ON INCREASING." THEREFORE,IT IS RIDICULOUS TO AIM FOR SATISFACTION OF DESIRES THROUGH ORDINARY MATERIAL THINGS.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...