This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, September 2, 2011
Hame teen baatein sada dhayan rakhana chahiye ,annanyata matlab dusre mein man ka lagaav na ho ek isht ho ,ek Guru ho ,ek marg ho ,apne isht ke prati annanyata, apne guru ke prati annanyata ,apne marg ke prati annanyata . hame dusre guru ki baatein tak nahi sunna chahiye kyo ki koi guru koi baat, koi guru koi baat bolta hai vo galat nahi hai,aap brahmit ho sakte hai,sab apne apne adhikaar se bol rahe hai hame jaha lagta hai ki yaha per kaam ban jayega usi guru ke pallu ko pakad lena chahiye or sab bhul jana chahiye !!!!!!!!!!!!!!!!!
जाकी याचत शरण सब, विधि हरि हर उनमान | सोइ यशुमति की गोद हित, लोटत रोदन ठान ||९९||
भावार्थ-जिन भगवान् श्रीकृष्ण की शरण, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सरीखे भी चाहते हैं | वही सर्वशरण्य ब्रह्म श्रीकृष्ण यशोदा मैय्या की गोद की शरण पाने के हेतु रोता हुआ ब्रजभूमि पर लोट रहा है |
Brief explanation-Even personalities like Brahma, Shankar and Vishnu seek shelter of Lord Krishn. But Lord Krishn who is the shelter of all, is seen rolling on the ground and crying for the shelter of His mother Yashoda lap.........Bhakti Shatak
भावार्थ-जिन भगवान् श्रीकृष्ण की शरण, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सरीखे भी चाहते हैं | वही सर्वशरण्य ब्रह्म श्रीकृष्ण यशोदा मैय्या की गोद की शरण पाने के हेतु रोता हुआ ब्रजभूमि पर लोट रहा है |
Brief explanation-Even personalities like Brahma, Shankar and Vishnu seek shelter of Lord Krishn. But Lord Krishn who is the shelter of all, is seen rolling on the ground and crying for the shelter of His mother Yashoda lap.........Bhakti Shatak
सुन लाख टका की बात रे |
जो तोहिँ मानत रहत आपुनो, सुत दारा पितु भ्रात रे |
सो सब धोखा जान मूढ़ मन, है सब स्वारथ नात रे |
जब ये जानत नहिं आपन हित, भटकट जग दिन रात रे |
तब ये कहा करैं हित तेरो, तू इन कत पतियात रे |
...अब ‘कृपालु’ तू तोरि नात सब, जोर नात बलभ्रात रे ||
भावार्थ- अरे मन ! लाख टका की बात सुन | जो पुत्र, पिता, भाई आदि तुझे अपना मानते रहते हैं, यह सब धोखा है | क्योंकि वे लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही ऐसा करते हैं | अरे मन ! जब ये लोग अपना ही वास्तविक हित नहीं समझते और सांसरिक विषयों में भटकते रहते हैं तब भला ये तेरा क्या हित करेंगे | तू इन पर क्या विश्वास करता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! अब तू सबसे नाता तोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर से नाता जोड़ ले |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
जो तोहिँ मानत रहत आपुनो, सुत दारा पितु भ्रात रे |
सो सब धोखा जान मूढ़ मन, है सब स्वारथ नात रे |
जब ये जानत नहिं आपन हित, भटकट जग दिन रात रे |
तब ये कहा करैं हित तेरो, तू इन कत पतियात रे |
...अब ‘कृपालु’ तू तोरि नात सब, जोर नात बलभ्रात रे ||
भावार्थ- अरे मन ! लाख टका की बात सुन | जो पुत्र, पिता, भाई आदि तुझे अपना मानते रहते हैं, यह सब धोखा है | क्योंकि वे लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही ऐसा करते हैं | अरे मन ! जब ये लोग अपना ही वास्तविक हित नहीं समझते और सांसरिक विषयों में भटकते रहते हैं तब भला ये तेरा क्या हित करेंगे | तू इन पर क्या विश्वास करता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! अब तू सबसे नाता तोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर से नाता जोड़ ले |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
ओं माँ श्यामा तेरी जो चरण शरण आये!
माया की कौन कहे मायापति घबराये!
वनचरिन आचरन को श्रुति निंदित बतराये,
सहचरि करि उन सबको निज भुज भरि उर लाये!
तव पद रज पावन को पद्माहूँ ललचाये,ब्रज लता विटप बननो ब्रह्माहूँ मन भाये!
तेरी अनुकम्पा ते शिव गोपी बनि आये,
सनकादि ब्रह्मज्ञानी तन लतन पतन पाये!
चाहत "कृपालु" मेरी तेरी ही कहलाये,
भूले भटके कबहूँ तव सेवा मिल जाए!!!!
माया की कौन कहे मायापति घबराये!
वनचरिन आचरन को श्रुति निंदित बतराये,
सहचरि करि उन सबको निज भुज भरि उर लाये!
तव पद रज पावन को पद्माहूँ ललचाये,ब्रज लता विटप बननो ब्रह्माहूँ मन भाये!
तेरी अनुकम्पा ते शिव गोपी बनि आये,
सनकादि ब्रह्मज्ञानी तन लतन पतन पाये!
चाहत "कृपालु" मेरी तेरी ही कहलाये,
भूले भटके कबहूँ तव सेवा मिल जाए!!!!
The material mind oscillates amidst the three gunas, and so at times we experience a deep longing for God and at times we feel uninspired. However, a sadhak is one who pushes the mind and intellect to harbor a deep desire for God, even when they would rather be languid and cold. Sometimes we naturally feel inspired. Other times, when we strain to become inspired, even when we don't naturally feel so, that is sadhana...Swami Mukundanand..
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






