This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, September 7, 2011
Without the true Bhakti,in millions of lifetimes,the Divine knowledge of 'Brahm' cannot be obtained with any kind of practice.The practices of Gyan and Yog,If done without Bhakti,will only increase 'Hypocritical Vanity' in the heart of the practitioner,Because the 'true knowledge' and the 'true renunciation' are the natural consequences of Bhakti.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
Human Mind and the World,both are creations of Maya.This is the reason that the worldly things and worldly attachments are always pleasing and appealing to Mind.The mayic energy is extremely potent.Without the grace of Krishn its effects on the Mind can never be reduced or removed,And that Grace is received by selflessly surrendering to Krishn. -----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
प्रभु जी ! भले बुरे हम तेरे |
उदर भरे पर महा आलसी, सोवत साँझ सवेरे |
काम क्रोध अरु ममता तृष्णा, रहत सदा नित घेरे |
माया-वश सब जनम गमायो, भटक फिरे बहुतेरे |
तुम बिनु कौन सहायक मेरो, बैरी बहुत घनेरे |
... दास ‘कृपालु’ आस तजि सब की, भये श्याम के चेरे ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! हम अच्छे या बुरे जैसे भी हैं तुम्हारे हैं | पेट भरने पर अत्यन्त आलस्य से युक्त होकर सांयकाल से प्रात:काल तक सोते रहते हैं | हे नाथ ! काम, क्रोध, ममता, एवं लालच आदि ने मेरे ऊपर पूर्ण अधिकार जमा रखा है | आपकी माया के वशीभूत होकर सारा जीवन इधर-उधर भटक कर व्यर्थ ही गँवा दिया है | तुमको छोड़कर दूसरा कोई भी मेरी सहायता करने वाला नहीं है | सभी स्वजन बनकर शत्रु की भाँति स्वार्थ सिद्ध करना चाहता हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, सभी आशाओं को छोड़कर एवं सबसे संबन्ध तोड़ कर श्यामसुन्दर के दास हो गये हैं |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
उदर भरे पर महा आलसी, सोवत साँझ सवेरे |
काम क्रोध अरु ममता तृष्णा, रहत सदा नित घेरे |
माया-वश सब जनम गमायो, भटक फिरे बहुतेरे |
तुम बिनु कौन सहायक मेरो, बैरी बहुत घनेरे |
... दास ‘कृपालु’ आस तजि सब की, भये श्याम के चेरे ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! हम अच्छे या बुरे जैसे भी हैं तुम्हारे हैं | पेट भरने पर अत्यन्त आलस्य से युक्त होकर सांयकाल से प्रात:काल तक सोते रहते हैं | हे नाथ ! काम, क्रोध, ममता, एवं लालच आदि ने मेरे ऊपर पूर्ण अधिकार जमा रखा है | आपकी माया के वशीभूत होकर सारा जीवन इधर-उधर भटक कर व्यर्थ ही गँवा दिया है | तुमको छोड़कर दूसरा कोई भी मेरी सहायता करने वाला नहीं है | सभी स्वजन बनकर शत्रु की भाँति स्वार्थ सिद्ध करना चाहता हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, सभी आशाओं को छोड़कर एवं सबसे संबन्ध तोड़ कर श्यामसुन्दर के दास हो गये हैं |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






