Thursday, September 8, 2011

JAGADGURUTTAM SHRI KRIPALUJI MAHARAJ SAYS: O SOULS; SING 'RADHEY' NAME TWENTY-FOUR HOURS IN YOUR HEART WITHOUT A BREAK.
SERVICE PURIFIES THE HEART,INCREASES THE FEELING OF DEDICATION AND ATTRACTS THE PERSONEL ATTENTION OF YOUR DIVINE MASTER,WHEREAS DEVOTION DEVELOPS YOUR CONFIDENCE IN THE ATTAINMENT OF RADHAKRISHN."AT A CERTAIN STATE DEVOTION BECOMES A FORM OF SERVICE". ------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

THE 'VEDAS' SAY THAT 'BHAKTI' IS THE ONLY SUPREME PATH TO GOD.'THE GITA' SAYS THAT 'SELFLESS BHAKTI' ENSURES "DIVINE VISION,DIVINE KNOWLEDGE,AND DIVINE UNITY" WITH THE SUPREME FORM OF GOD,'KRISHN'.AND THE 'BHAGWATAM' TELLS US THAT TO ATTAIN THE NECTAR OF THE BLISS OF 'KRISHN LOVE' THROUGH BHAKTI(DIVINE-LOVE-CONSCIOUSNESS) AND KEEP ON DRINKING IT FOREVER. -----FIFTH ORIGINAL JAGADGURU SWAMI SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
Mere pranadhaar hai Piya-Pyari ke padaarwind......
The world is impressed by the external decorations, but God is impressed by the internal adornments. Decorate your thoughts with the finest devotional sentiments, just as brides decorate their bodies with ornaments.
----swami mukundanand.
पीर हरि ! तुम बिनु कौन हरे ? |
दैहिक दैविक भौतिक तापन, अब लौं बहुत जरे |
लख चौरासी योनि चराचर, बहु विधि स्वाँग धरे |
मृग मृगजल ज्यों धाय रैन दिन, इंद्रिन घट न भरे |
छिन छिन बाढ़ति जाति वासना, ज्यों घृत अगिनि परे |
...
नर तनु पाय ‘कृपालु’ चेत न तु, परि भवकूप मरे ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारे बिना हमारे दु:ख और कौन दूर करे ? अब तक दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों तापों में अत्यधिक जल चुका | जड़, जंगम चौरासी लाख योनियों के अनेक प्रकार के शारीरिक स्वाँग बनाये | जिस प्रकार हिरन मरुस्थल में मिथ्या मृगजल के हेतु निरन्तर दौड़कर भी परिणाम में दु:ख ही पाता है, उसी प्रकार मैं भी सांसारिक विषयों में निरन्तर ढूँढते-ढूँढते भी सुख न पा सका, इन इंद्रियों के घड़े न भर सके | हमारी सांसारिक विषय-वासनायें उसी प्रकार बढ़ती जा रही हैं जिस प्रकार आग में घी पड़ने पर आग बढ़ती जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मानव-देह पाकर अब तू शीघ्र ही सावधान हो जा अर्थात् भगवान् के शरणागत हो जा, अन्यथा फिर संसार-रूपी कुएँ में पड़कर दु:खी हुआ करेगा | यह मानव देह देवताओं को भी दुर्लभ है, बार-बार नहीं मिलेगा |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

Wednesday, September 7, 2011

‎'BHAKTI' IS LOVINGLY LONGING FOR THE VISION AND LOVE OF YOUR BELOVED GOD,'KRISHN',WITH A DEDICATED HEART AND FAITHFUL MIND WHILE REMEMBERING AND CHANTING THE KRISHN'S NAME AND LEELAS,AND FEELING HIS 'PERSONEL PRESENCE' IN CLOSE PROXIMITY WITH YOUR OWN BEING. ----FIFTH ORIGINAL JAGADGURU SWAMI SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...