This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, September 8, 2011
THE 'VEDAS' SAY THAT 'BHAKTI' IS THE ONLY SUPREME PATH TO GOD.'THE GITA' SAYS THAT 'SELFLESS BHAKTI' ENSURES "DIVINE VISION,DIVINE KNOWLEDGE,AND DIVINE UNITY" WITH THE SUPREME FORM OF GOD,'KRISHN'.AND THE 'BHAGWATAM' TELLS US THAT TO ATTAIN THE NECTAR OF THE BLISS OF 'KRISHN LOVE' THROUGH BHAKTI(DIVINE-LOVE-CONSCIOUSNE
पीर हरि ! तुम बिनु कौन हरे ? |
दैहिक दैविक भौतिक तापन, अब लौं बहुत जरे |
लख चौरासी योनि चराचर, बहु विधि स्वाँग धरे |
मृग मृगजल ज्यों धाय रैन दिन, इंद्रिन घट न भरे |
छिन छिन बाढ़ति जाति वासना, ज्यों घृत अगिनि परे |
... नर तनु पाय ‘कृपालु’ चेत न तु, परि भवकूप मरे ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारे बिना हमारे दु:ख और कौन दूर करे ? अब तक दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों तापों में अत्यधिक जल चुका | जड़, जंगम चौरासी लाख योनियों के अनेक प्रकार के शारीरिक स्वाँग बनाये | जिस प्रकार हिरन मरुस्थल में मिथ्या मृगजल के हेतु निरन्तर दौड़कर भी परिणाम में दु:ख ही पाता है, उसी प्रकार मैं भी सांसारिक विषयों में निरन्तर ढूँढते-ढूँढते भी सुख न पा सका, इन इंद्रियों के घड़े न भर सके | हमारी सांसारिक विषय-वासनायें उसी प्रकार बढ़ती जा रही हैं जिस प्रकार आग में घी पड़ने पर आग बढ़ती जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मानव-देह पाकर अब तू शीघ्र ही सावधान हो जा अर्थात् भगवान् के शरणागत हो जा, अन्यथा फिर संसार-रूपी कुएँ में पड़कर दु:खी हुआ करेगा | यह मानव देह देवताओं को भी दुर्लभ है, बार-बार नहीं मिलेगा |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
दैहिक दैविक भौतिक तापन, अब लौं बहुत जरे |
लख चौरासी योनि चराचर, बहु विधि स्वाँग धरे |
मृग मृगजल ज्यों धाय रैन दिन, इंद्रिन घट न भरे |
छिन छिन बाढ़ति जाति वासना, ज्यों घृत अगिनि परे |
... नर तनु पाय ‘कृपालु’ चेत न तु, परि भवकूप मरे ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारे बिना हमारे दु:ख और कौन दूर करे ? अब तक दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों तापों में अत्यधिक जल चुका | जड़, जंगम चौरासी लाख योनियों के अनेक प्रकार के शारीरिक स्वाँग बनाये | जिस प्रकार हिरन मरुस्थल में मिथ्या मृगजल के हेतु निरन्तर दौड़कर भी परिणाम में दु:ख ही पाता है, उसी प्रकार मैं भी सांसारिक विषयों में निरन्तर ढूँढते-ढूँढते भी सुख न पा सका, इन इंद्रियों के घड़े न भर सके | हमारी सांसारिक विषय-वासनायें उसी प्रकार बढ़ती जा रही हैं जिस प्रकार आग में घी पड़ने पर आग बढ़ती जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मानव-देह पाकर अब तू शीघ्र ही सावधान हो जा अर्थात् भगवान् के शरणागत हो जा, अन्यथा फिर संसार-रूपी कुएँ में पड़कर दु:खी हुआ करेगा | यह मानव देह देवताओं को भी दुर्लभ है, बार-बार नहीं मिलेगा |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
Wednesday, September 7, 2011
'BHAKTI' IS LOVINGLY LONGING FOR THE VISION AND LOVE OF YOUR BELOVED GOD,'KRISHN',WITH A DEDICATED HEART AND FAITHFUL MIND WHILE REMEMBERING AND CHANTING THE KRISHN'S NAME AND LEELAS,AND FEELING HIS 'PERSONEL PRESENCE' IN CLOSE PROXIMITY WITH YOUR OWN BEING. ----FIFTH ORIGINAL JAGADGURU SWAMI SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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