Monday, September 12, 2011

गुरु के व्यवहार को कभी मत देखो,सदा यह सोचो कि वो कुछ भी करे।कैसा भी व्यवहार करें,हमे इससे कोई मतलब नहीं।बस हमे तो उनकी आज्ञा पालन करना है।चाहे वो आंखे फेर लें,चाहे उदासीन हो जाए,चाहे डांट लगाए,लेकिन हमारे प्यार में कभी कमी नहीं आएगी।सदा उन्हे सुख पंहूचाना ही हमारे जीवन का प्रथम लक्ष्य है.
गुरुवर तो कृपा की मूर्ति ही हैं यानी अंदर,बाहर,सर्वत्र कृपा ही कृपा है।यही उनका वास्तविक स्वरूप है।"कृपालु" का तो अर्थ ही है कृपा लुटाने वाला।कोई दुर्भावना या सदभावना जिससे भी उनके पास आए,वे सब पर कृपा ही करते है।ऐसा प्रतीत होता है की गुरुवर का तन मन सब कृपा का ही बना हुआ है।सोते जागते उठते बैठते उनका एक ही काम है जीवो पर कृपा करना ।बिना कृपा किए गुरुवर रह ही नहीं सकते। हम जिस दिन उन्हे सेंट परसेंट "कृपालु" मान लेंगे,बस हमारा काम बन जाएगा।
राधे-राधे।

Sunday, September 11, 2011

मन एक है या तो वह संसार को दे दो,या हरि-गुरु को...........
गुरु का गुरु को देने में बुद्धि क्यों लगती है?
संत कृपा कह कर नहीं कर के दिखाते हैं।
जिस-जिस क्षण गुरु या भगवान को अपने से दूर मानोगे,उस-उस क्षण मन लापरवाही या मक्कारी करने लगेगा।
-----श्री महाराजजी.
हाथ-पैर की सेवा करना कोई बहुत बड़ी सेवा नहीं है,संत जो कहता है,उसके अनुसार चलना,सबसे बड़ी सेवा है।
------श्री कृपालुजी महाराज.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...