Tuesday, September 13, 2011

सब धामन वारो वृन्दावन पै,औ वृन्दावन हूँ गुरुधाम पै वारो।
जो गुरु के पद प्रीति जुरि तो,भज्यो चलि आवेगो ब्रह्म बिचारो।
हैं हरी निर्मल भक्तन को,गुरु हैं अधमों को उधारन हारो।
औरन को गुरु हों या न हों,गुरु मेरो 'कृपालु' सुभाग हमारो।।
धनि मनगढ़ धाम निवास सुनो मन,
पुण्यन पुंज सों पाइये जू।
बनि दीन प्रापन्न रहो गुरु के,नित सेवा सों ताहि रिझाइये जू।
मन ते हरि को गुरु को सुमिरो,रसना सों सदा गुण गाइये जू।
क्षणभंगुर जीवन जानि मना, छनहु जनि व्यर्थ गँवाइए जू।।
जीव की कितनी बुरी स्थिति है कि वह भगवान और महापुरुष के सामने भी कपट करता है।
-------श्री कृपालु भगवान.
तत्वज्ञान व्यक्ति के दिमाग से गया कि गलती हुई.............
-------श्री महाराजजी.
कर्म से शरीर बनता है, फिर शरीर से कर्म होता है,फिर कर्म से शरीर बनता है।
-----श्री महाराजजी.

श्री महाराजजी के मुखारविंद से: तुम लोगो को मै कितना उठाता हूं पर तुम लोग नामापराध करके सब बराबर कर देते हो। मै तुम्हारे अपराधों को देखता हूं फिर भी तुम लोगो से कहने में डर लगता है। सोचता हू, अभी इतने चल रहे हो ,अगर कह दूँगा तो सत्संग भी छोड़ दोगे। मै माफ करना जानता हूँ,सोचता हू , कभी तो अक्ल आएगी तो ठीक हो जाओगे।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...