Thursday, September 15, 2011

शौक पैदा करो की लोग हमे खराब कहे और हम हँसते रहें।
-----श्री महाराजजी.
क्षमा मांगने का मतलब है की पुन: अपराध न करो।
------श्री महाराजजी.
सहनशीलता बढ़ानी है। किसी के भी निंदनीय शब्द से अथवा व्यवहार से मन में अशांति न हो । बस यही साधना एवं दीनता है। किसी की निरर्थक बात को न सुनना है, न सोचना है। यदि कोई दुराग्रह करके या अन्य कुसंग द्वारा अपना पतन करना ही चाहता है तो भगवान और महापुरुष क्या कर सकते हैं।
------श्री कृपालुजी महाराज.
हमारो, दोउ प्यारी प्यारो |
एक गौर तनु एक नील-तनु, दोउ नैननि-तारो |
इक धारो नीलांबर अरु इक, पीतांबर धारो |
इक सोरह श्रृंगारहिं छवि इक, नटवर-छवि वारो |
इक भोरी अति इक अति चंचल, दोउ त्रिभुवन न्यारो |
... कह ‘कृपालु’ जब होति होड़ तब, कोउ नहिं कोउ हारो ||

भावार्थ- प्रिया-प्रियतम दोनों ही हमारे सर्वस्व हैं | एक गौर वर्ण और एक नील वर्ण के हैं तथा दोनों ही मेरी आँखों के तारों के समान हैं | एक नीलाम्बर धारण किये हुए हैं एवं एक पीताम्बर धारण किये हुए हैं | एक सोलहों श्रृंगार से अलंकृत हैं, एवं एक नटवर वेष से अलंकृत हैं | एक स्वभावत: अत्यन्त भोली हैं, और एक स्वभावत: अत्यन्त चंचल हैं | दोनों ही संसार से निराले हैं, क्योंकि दिव्य चिन्मय हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जब दोनों में किसी प्रकार की रसमयी होड़ हो जाती है तब कोई भी किसी से हार नहीं मानता क्योंकि स्वरूपत:, परमार्थत: दोनों एक ही हैं |


(प्रेम रस मदिरा युगल-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
बिना तत्वज्ञान के हम साधना नहीं कर सकते । भगवतप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तत्वज्ञान के बिना तो हम तर्क, कुतर्क संशय ही करते रहेंगे ,इसी में पूरा जीवन बीत जाएगा,मानव देह व्यर्थ चला जाएगा।
------श्री महाराजजी.
मन को बाँधो। मन के दास न बनो। कुसंग से सदा बचो तथा मन को सदा अपने गुरु में लगाए रहो। मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।
------श्री महाराजजी.
हमारे प्रिय गुरुवर "जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज" चौबीस घंटे अनंत प्रेमानन्द में डूबे रहते हैं, वे हम गंदे जीवों के साथ कुछ भी व्यवहार करे यह उनकी अकारण कृपा ही है। अगर इसकी इम्पॉर्टेन्स कोई जीव महसूस करे तो उसको भक्ति करने की आवश्यकता नहीं हैं, भगवदप्राप्ति हो जाएगी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...