Friday, September 16, 2011

1.किसी वस्तु कि तुम कामना करते हो ,उसके मिलने पर तुमको जैसी प्रसन्ता,खुशी होती है ,वैसी ही प्रसन्ता,खुशी 'सेवा' मेँ होनी चाहिये। तभी लाभ होगा ।

2.संसार वाले बाहरी चीजे देखते हैं, और महापुरुष और भगवान भीतर (आंतरिक) चीजे देखते हैं।


 3.वास्तविक महापुरुष का केवल एक ही लक्ष्य होता है, वो है जीव को ईश्वर कि और ले जाना।

-------जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज.





 
हमारो ऐसो है रखवार | जैसो है नहिं सकल विश्व महँ, कोउ समरथ सरकार |
तीनि लोक अनुचर रह जिन को, विधि हरि हर करतार |
सोउ अनुचर श्री महाविष्णु कहँ, जो कमला भरतार |
सोउ श्री महाविष्णु अनुचर जिन, तिन कह नंदकुमार |
...
सोउ ‘कृपालु’ अनुचर जिन सोइ गुरु, कह भागवत पुकार ||


भावार्थ- हमारी रक्षा करने वाले ऐसे श्री गुरुदेव हैं जैसा सम्पूर्ण विश्व में कोई समर्थ नहीं है | जरा सोचिये, तीनों लोकों के स्वामी ब्रम्हा, विष्णु, शंकर कहे जाते हैं, किन्तु वे तीनों भी महाविष्णु के दास हैं और फिर वे महाविष्णु भी श्याम के दास हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वे श्यामसुन्दर भी सद्गुरु के दास हैं | ऐसा उद्घोष भागवत पुराण का भी है |


(प्रेम रस मदिरा सद्गुरु-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

महापुरुष कि चाहे घोर से घोर विपरीत क्रिया ही क्यों न मालूम पड़े ,उसमे अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिए । उनकी हर क्रिया जीव कल्याण के लिए होती है,जिसमे कृपा ही कृपा छिपी होती है। मनुष्य अपनी मायिक बुद्धि से, इस दो अंगुल कि खोपड़ी से वास्तविक महापुरुष कि 'क्रियाओं मेँ छिपी कृपाओं' को कभी नहीं समझ सकता। उनकी तो हर क्रिया ही कृपा है ।
-------जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज.
श्री महाराजजी समझाते है कि: संयोग और वियोग मेँ से वियोग बड़ा है ,संयोग मेँ तो प्रियतम एक ही स्थान पर दिखाई देता है ,जबकि वियोग मेँ त्रिभुवन मेँ दिखाई देता है । निष्कामता और वियोग के कारण ही गोपियाँ महाभाव तक पहुँच सकी।

Thursday, September 15, 2011



1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।
 

2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
 

3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।

4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।


6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।
 

7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवो को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरू श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है . भगवन्नाम में पाप नाश करने को ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी पापो से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है.

-------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज. 

सहनशील बनो तथा कभी भी किसी की बात को फील न करो। सदा अपने अंदर झाँको। दूसरा चाहे कुछ भी करे, तुम्हें तो बस अपने से ही मतलब रखना चाहिए। यदि कोई कमाएगा तो भी अपने लिए ,गँवाएगा तो भी अपने लिए ।
------श्री महाराजजी.
लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है, परन्तु हमारा स्वयं का क्या होगा ,इसकी फिक्र नहीं है। आश्चर्य: अपनी फिक्र क्यो नहीं करते हो।
-----श्री कृपालुजी महाराज.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...