Monday, September 19, 2011

सखी सुनु, इक रहस्य की बात |
जो मो कहँ भगवान मान सो, मो ते अति डरपात |
राजा स्वामी मित्र पुत्र पति, भाव पाँच विख्यात |
जिन भावन सों प्रीति करत जो, हौं जोरत सोइ नात |
अति नीरस ऐश्वर्य सखी मम, रसिकन नाहिं सुहात |
... तू ‘कृपालु’ प्यारी प्रियतम की, प्रियतम श्यामल गात ||

भावार्थ- एक भोली-भाली सखी को समझाते हुए श्यामसुन्दर कहते हैं कि अरी सखी ! एक रहस्य की बात सुन, मुझको जो भगवान् मानता है वह मुझसे भयभीत रहता है, प्यार नहीं कर सकता | मुझसे प्यार करने के लिए शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, और माधुर्य इन पाँच भावों के अनुसार क्रमश: राजा, स्वामी, मित्र, पुत्र तथा पति ही मानना चाहिये | इन पाँच भावों में जिस भाव से जो भी मुझसे प्यार करता है, मैं भी उससे वही भाव रखता हूँ | अरी सखी ! भगवान् सम्बन्धी मेरे छहों ऐश्वर्य अत्यन्त नीरस हैं, वे रसिकों को नहीं अच्छे लगते | इसलिये तू मेरी भगवत्ता के चक्कर में न पड़ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! तू तो केवल इतना ही समझ ले कि तू श्यामसुन्दर की प्रेयसी है एवं श्यामसुन्दर तेरे प्रियतम हैं |


(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला -माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

Sunday, September 18, 2011

कोई दोष महापुरुष के साथ रहकर भी इसलिए नहीं जाता है क्योकि जीव उसके लिए क्रियमान नहीं करता । यध्यपी भगवान में मन का एटेचमेंट रहने से सारे दोष अपने आप ही चले जायेंगे, पर मन भगवान में सदा नहीं लगा रहता। इसलिए संसार के दोषों को माइनस करने के बारे में भी प्रयत्न करते रहना चाहिये ,प्रयत्न करना पड़ता है ।
--------श्री महाराजजी.
जिसको स्पिरिटूयल(spiritual) शक्ति से पावर मिल रही है ,उसकी शक्ति का ह्रास नहीं होता ,लकीन संसार वाले को भीतर से तो शक्ति मिल नहीं रही है ,अत: उसकी शक्ति का ह्रास होता है ,इसीलिए वो थक जाता है।
--------श्री महाराजजी।
ईश्वर और संत की वाणी पर जितना अविश्वास होगा ;निराशा उतनी ही मात्रा में आयेगी।
------श्री महाराजजी.
जिस समय कुसंस्कार आये उस समय और अधिक परिश्रम करना चाहिए ,जैसे चढ़ाई आने पर साइकल चलाने में और अधिक ज़ोर लगाना पड़ता है।
------श्री महाराजजी.
प्रश्न : जो संत या भगवान की निंदा करे ,उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
उत्तर : श्रीमहाराजजी द्वारा:- जिससे तुम्हारा 24 घंटे का साथ है,उसकी बात सुनकर तो हँस कर उसकी बात सुनलों ,वह खिसिया कर चुप हो जायेगा। जिससे कभी-कभी का संबंध है,उसको झिड़क दो ,उससे संबंध खत्म कर दो, हर जगह अलग-अलग व्यवहार करना पड़ेगा ।
प्रश्न: परमार्थ के पथ पर चलने वाले साधक को क्या अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए ?
उत्तर: श्री महाराजजी द्वारा :- नहीं। क्योंकि जो कुछ प्रारब्ध में होगा वही उसे प्राप्त होगा । परमार्थ के पथ पर चलने वाले को चिंता किस बात की ,अगर कोई कहे की भविष्य की चिंता नहीं करेंगे तो मर जाएंगे ,यह कैसे हो सकता है ,जब भगवान के वो शरणागत है और शरणागत का योगक्षेम स्वयं भगवान वहन करते हैं।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...