Tuesday, September 20, 2011

Beloved of Shri Radha Rani(Krishn) is the Beloved of my Heart and Soul,But My Gracious Guru(spiritual master) Jagadguru Kripaluji Maharaj is still the Great.



(A true Guru is the form of Power of Grace which is synonymous with God,thus) Guru adores Krishn and Krishn adores Guru.Virtually both are one and same,however My Supreme Guru,Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj,is still superior(because it is he who redeems the transgressions of a devotee,fosters our devotional love for RadhaKrishn and makes him qualified to receive their Divine Vision).

Without The True Master ,Even Brahm Krishn will not be able to help you enough,Because a True Master is the medium between a Devotee and RadhaKrishn.RADHEY-RADHEY.

My Gurudev Shri Kripaluji Maharaj Is Extremely Kind And Is The Ocean Of Grace.
RADHEY-RADHEY.


O MY DEAREST DARLING,THE ABSOLUTE SUPREME SHREE KRISHN; I SUFFERED TO EXTREMES IN THIS WORLD FROM THE VERY BEGINNING AS I HAVE IGNORED YOUR GRACE.MY HEART HAS BECOME SO IMPIOUS BY MATERIAL ASSOCIATIONS,THAT EVEN HAVING LEARNED FROM YOUR LOVING SAINTS,THAT YOU ARE WAITING FOR ME WITH YOUR OPEN ARMS TO EMBRACE,AND YOU ARE LOOKING TO ME WITH YOUR GRACEFUL EYES TO GRACE,I HAVE FAILED TO SURRENDER MY 'SELF' TO YOU.

Monday, September 19, 2011

जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
धर्मशाला में यात्री रहें ज्यों बता दे ॥
धर्मशाला को ही गोविंद राधे ।
निज घर मान लेना मूर्खता बता दे ॥
ऐसे ही जग को भी गोविंद राधे ।
...
अपना मान लेना है मूर्खता बता दे ॥
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
तन ते हो कर्म मन हरि में लगा दे ॥
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
गाय घास चरे बछड़ा ना भुला दे ॥
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
जल में रहे माखन ज्यों बता दे ॥
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
नाटक में ज्यों कोई पात्र बता दे ॥
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
ना हो शत्रु कोई ना ही मित्र बता दे ॥
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
राग द्वेष ना हो अभिनय ही करा दे ॥


!!!!जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज!!!
Prashna :
Bhajan kise kahte hein ?

Uttar :
Premaspad ki sewa hi bhajan hai.. Sewa tabhi hoti hai jab preeti purvak ho.
Preeti tabhi prabal hoti hai  jab premaspad mein apnattwa ka bhaav prabal hota
hai. Apanattwa ka bhaav ki prabalata tabhi samjhi jati hai jab apne sukh ki chinta nahin rehti kewal premaspad ki sewa ka hi dhyan rehta hai.
Yehi sacchi sadhana hey …

------ Shree Maharaj ji
कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते है . लेकिन जब कोशिश ही कम होती है तब दोष भी कम ठीक होते है .गलती तो सभी से होती है , लेकिन बार बार कहने पर भी गलती हो , यह सबसे बड़ी मिस्टेक है .

शास्त्रों और महापुरुष की वाणी के विरुद्ध जब कभी आपकी बुद्धि का फैसला हो तो यह सोचते रहना चाहिये कि शास्त्र और महापुरुष गलत नहीं हो सकते , हम ही गलत हो सकते है , भले ही इस समय हमारी समझ में न आ रहा हो क्योकि हमारी बुद्धि मायाधीन है

दाद को खुजालते समय तो आराम मालूम होता है पर बाद में, उस जगह असह्य जलन होने लगती है . संसार के भोग में भी ऐसे ही है - शुरू शुरू में तो वे बड़े ही सुखप्रद मालूम होते है परन्तु बाद में उनका परिणाम अत्यंत भयंकर और दुखमय होता है.


बरसात का पानी उची जमीन पर नहीं ठहर पाता, बहकर नीचे जगह में ही जमता है . वैसे ही इश्वर की कृपा भी नम्र व्यक्तियों के ही हृदय में ठहरती है , अहंकार - अभिमानपूर्ण हृदय में नहीं .

- JAGADGURU SHREE KRIPALUJI MAHARAJ.
प्रश्न: परमार्थ के पथ पर चलने वाले साधक को क्या अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए ?
उत्तर: श्री महाराजजी द्वारा :- नहीं। क्योंकि जो कुछ प्रारब्ध में होगा वही उसे प्राप्त होगा । परमार्थ के पथ पर चलने वाले को चिंता किस बात की ,अगर कोई कहे की भविष्य की चिंता नहीं करेंगे तो मर जाएंगे ,यह कैसे हो सकता है ,जब भगवान के वो शरणागत है और शरणागत का योगक्षेम स्वयं भगवान वहन करते हैं।



श्री महाराजजी से प्रश्न: क्या आपके सत्संगीयों के लिए अगले जनम में मनुष्य शरीर निश्चित है?
उत्तर :- पूरे भारतवर्ष में हमारे ही सतसंगी ऐसे हैं जो रूपध्यान का प्रयास करते हैं। यदाकदा भगवान के लिए आँसू भी बहा लेते हैं। शरणागति का प्रयास भी करते हैं। इससे लोग यह भावार्थ लगा लेते हैं कि हमारे सत्संगीयों को भविष्य में मानवदेह मिलेगा ही। यदि कोई पूर्ण शरणागत हो गया तो उसके लिए 'गोलोक' भी निश्चित हैं।
प्रश्न: कोई साधक गुरु का क़र्ज़ा लेकर मर गया,तो क्या अगले जनम में उसे वो क़र्ज़ा चुकाना होगा?

उत्तर श्री महाराजजी द्वारा:- यदि साधक की सदभावना है ,क़र्ज़ा वह चुकाना चाहता है ,परिस्थितिवश नहीं चुका पाया, उसे क़र्ज़ा नहीं चुकाना पड़ेगा । यदि जानबूझ कर मंशा खराब होने के कारण ,साधन रहने पर भी उसने नहीं चुकाया,तो उसे निश्चित ही दंड भोगना पड़ेगा ।


प्रश्न: क्या अलौकिक अनुभव साधना के अनुसार होते हैं?
उत्तर: श्री महाराजजी द्वारा :- हाँ,साधना के अनुसार होते हैं । अनुभव में "आनंद का अनुभव" करना प्रत्येक जीव की साधना पर निर्भर करता है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...