This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, September 20, 2011
जयति जय, जय सद्गुरु महाराज |
छके युगल रस रास सरस जनु, मूर्तिमान रसराज |
बिनु कारण करुणाकर जाकर, अस स्वभाव भल भ्राज |
बरबस पतितन देत प्रेमरस, अस रसिकन सरताज |
डूबत आपु डुबावत जन कहँ, प्रेमसिंधु-ब्रजराज |
... हौं ‘कृपालु’ गुरुचरण शरण गहि, भयो धन्य जग आज ||
भावार्थ- श्री सद्गुरुदेव की जय हो, जय हो | प्रेमानन्द में निमग्न गुरुदेव मानो श्यामा-श्याम के मूर्तिमान रसावतार ही हैं | उनका सहज स्वभाव ही है अकारण करुणा करके जीवोद्धार करना | गुरुदेव ऐसे रसिक शिरोमणि हैं कि पतितों को भी हठात् प्रेमानन्द प्रदान कर देते हैं; उस रस में स्वयं भी डूब जाते हैं; साथ ही शरणागत शिष्य को भी डुबा देते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं मैं तो उन सद्गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करके आज धन्य हो गया |
(प्रेम रस मदिरा सद्गुरु-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
छके युगल रस रास सरस जनु, मूर्तिमान रसराज |
बिनु कारण करुणाकर जाकर, अस स्वभाव भल भ्राज |
बरबस पतितन देत प्रेमरस, अस रसिकन सरताज |
डूबत आपु डुबावत जन कहँ, प्रेमसिंधु-ब्रजराज |
... हौं ‘कृपालु’ गुरुचरण शरण गहि, भयो धन्य जग आज ||
भावार्थ- श्री सद्गुरुदेव की जय हो, जय हो | प्रेमानन्द में निमग्न गुरुदेव मानो श्यामा-श्याम के मूर्तिमान रसावतार ही हैं | उनका सहज स्वभाव ही है अकारण करुणा करके जीवोद्धार करना | गुरुदेव ऐसे रसिक शिरोमणि हैं कि पतितों को भी हठात् प्रेमानन्द प्रदान कर देते हैं; उस रस में स्वयं भी डूब जाते हैं; साथ ही शरणागत शिष्य को भी डुबा देते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं मैं तो उन सद्गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करके आज धन्य हो गया |
(प्रेम रस मदिरा सद्गुरु-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
हमको महापुरुष के किसी भी बहिरंग व्यवहार से उनको नहीं नापना है।
------श्री महाराजजी.
संत का केवल एक ही लक्ष्य होता है, जीव को ईश्वर की और ले जाना।
------श्री महाराजजी.
हम जो कुछ करते हैं वह गलत हो सकता है, किन्तु महापुरुष जो कुछ करता है ,"सही ही है" । ऐसा सोचना चाहिए।
-------श्री महाराजजी.
संसारी दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव मेँ अहमता, ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । स्वाभिमान कितना कम हुआ,अपने अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,आत्म-प्रशंसा कितनी अचछी लगती है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना दुख होता है,उनके मिलने मेँ कितना सुख मिलता है, यह सब अपनी आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
------श्री महाराजजी.
संत का केवल एक ही लक्ष्य होता है, जीव को ईश्वर की और ले जाना।
------श्री महाराजजी.
हम जो कुछ करते हैं वह गलत हो सकता है, किन्तु महापुरुष जो कुछ करता है ,"सही ही है" । ऐसा सोचना चाहिए।
-------श्री महाराजजी.
संसारी दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव मेँ अहमता, ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । स्वाभिमान कितना कम हुआ,अपने अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,आत्म-प्रशंसा कितनी अचछी लगती है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना दुख होता है,उनके मिलने मेँ कितना सुख मिलता है, यह सब अपनी आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
तुम्हारी जिस वस्तु में सबसे अधिक आसक्ति हो, उसी को भगवान को अर्पण कर दो । इससे तुम्हारी आसक्ति कम हो जाएगी । आसक्ति ही भगवदक्षेत्र में बाधा डालती है। तुम्हारी आसक्ति किस मेँ है ,यह जानने के लिए, चिंतन द्वारा पता लगाओ, तत्पश्चात उस वस्तु का समर्पण कर दो ।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
सबसे बड़ी गड़बड़ जो हम करते हैं, वह है प्रतिकूल चिन्तन। इससे हमारी बहुत बड़ी हानि हो जाती है।
------श्री महाराजजी.
संसार से वैराग्य इसलिये नहीं है की हमे तत्वज्ञान नहीं है, अत: तत्वज्ञान के सिद्धान्त को सदा ही रीवाईज़ करते रहना चाहिए ।
-------श्री महाराजजी.
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
सबसे बड़ी गड़बड़ जो हम करते हैं, वह है प्रतिकूल चिन्तन। इससे हमारी बहुत बड़ी हानि हो जाती है।
------श्री महाराजजी.
संसार से वैराग्य इसलिये नहीं है की हमे तत्वज्ञान नहीं है, अत: तत्वज्ञान के सिद्धान्त को सदा ही रीवाईज़ करते रहना चाहिए ।
-------श्री महाराजजी.
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