Wednesday, September 21, 2011

जब तक यह निश्चय न हो जाये कि संसार में सुख नहीं हैं,भगवान में ही सुख है,संसार की सम्पत्ति बटोरने की कामना रहेगी।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.



बहु जन्म करे यदि श्रवण कीर्तन,
तभू न पाय कृष्ण पदे प्रेम धन।
हृदय में ज्ञान का दीपक जलाने वाले गुरु साक्षात भगवान ही हैं। जो पुरुष उन्हे मनुष्य समझते हैं उनका समस्त शास्त्र-श्रवण हाथी के स्नान के समान व्यर्थ है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
श्रीकृष्ण, उनके नाम, उनके गुण, उनकी लीला, उनके धाम, उनके संतजनो में पूर्ण अभेद मानना है। यह सब श्री कृष्ण ही है।
इष्टदेव एवं गुरु को सदा सर्वत्र अपने साथ निरीक्षक एवं संरक्षक के रूप में मानना है। कभी भी स्वयं को अकेला नहीं मानना है। मोक्षपर्यंत की कामना एवं अपने सुख की कामना का पूर्ण त्याग करना है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

Tuesday, September 20, 2011


जयति जय, जय सद्गुरु महाराज |
छके युगल रस रास सरस जनु, मूर्तिमान रसराज |
बिनु कारण करुणाकर जाकर, अस स्वभाव भल भ्राज |
बरबस पतितन देत प्रेमरस, अस रसिकन सरताज |
डूबत आपु डुबावत जन कहँ, प्रेमसिंधु-ब्रजराज |
...
हौं ‘कृपालु’ गुरुचरण शरण गहि, भयो धन्य जग आज ||

भावार्थ- श्री सद्गुरुदेव की जय हो, जय हो | प्रेमानन्द में निमग्न गुरुदेव मानो श्यामा-श्याम के मूर्तिमान रसावतार ही हैं | उनका सहज स्वभाव ही है अकारण करुणा करके जीवोद्धार करना | गुरुदेव ऐसे रसिक शिरोमणि हैं कि पतितों को भी हठात् प्रेमानन्द प्रदान कर देते हैं; उस रस में स्वयं भी डूब जाते हैं; साथ ही शरणागत शिष्य को भी डुबा देते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं मैं तो उन सद्गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करके आज धन्य हो गया |

(प्रेम रस मदिरा सद्गुरु-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति
हमको महापुरुष के किसी भी बहिरंग व्यवहार से उनको नहीं नापना है।
------श्री महाराजजी.


संत का केवल एक ही लक्ष्य होता है, जीव को ईश्वर की और ले जाना।
------श्री महाराजजी.




हम जो कुछ करते हैं वह गलत हो सकता है, किन्तु महापुरुष जो कुछ करता है ,"सही ही है" । ऐसा सोचना चाहिए।
-------श्री महाराजजी.


संसारी दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव मेँ अहमता, ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । स्वाभिमान कितना कम हुआ,अपने अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,आत्म-प्रशंसा कितनी अचछी लगती है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना दुख होता है,उनके मिलने मेँ कितना सुख मिलता है, यह सब अपनी आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
तुम्हारी जिस वस्तु में सबसे अधिक आसक्ति हो, उसी को भगवान को अर्पण कर दो । इससे तुम्हारी आसक्ति कम हो जाएगी । आसक्ति ही भगवदक्षेत्र में बाधा डालती है। तुम्हारी आसक्ति किस मेँ है ,यह जानने के लिए, चिंतन द्वारा पता लगाओ, तत्पश्चात उस वस्तु का समर्पण कर दो ।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.




सबसे बड़ी गड़बड़ जो हम करते हैं, वह है प्रतिकूल चिन्तन। इससे हमारी बहुत बड़ी हानि हो जाती है।
------श्री महाराजजी.


संसार से वैराग्य इसलिये नहीं है की हमे तत्वज्ञान नहीं है, अत: तत्वज्ञान के सिद्धान्त को सदा ही रीवाईज़ करते रहना चाहिए ।
-------श्री महाराजजी.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...