Thursday, September 22, 2011


अरे मन ! यह ऐसो जग जान |
करत रहे पवनासन जिन मुनि, विश्वामित्र महान |
काम विवश किय तिनहुँ मेनका, मारि तानि दृगबान |
ऋषि वशिष्ठ कहँ वधन बैठ सोइ, लै कर परशु कृपान |
जब अस मुनि को काम क्रोध अस, दीख परत बलवान |
...
तब ‘कृपालु’ का गति औरन की, ताते भजु मन कान्ह ||

भावार्थ- अरे मन ! यह संसार ऐसा है जो किसी को नहीं छोड़ता | विश्वामित्र हवा खा कर ही रहते थे किंतु मेनका अप्सरा ने अपने कटाक्षों से उनको मोहित कर लिया | वे ही विश्वामित्र वशिष्ठ महर्षि को मारने के लिए उन्हीं की कुटी के पीछे नंगी तलवार लिये बैठे हुए थे | जब ऐसे महामुनियों का भी काम, क्रोध ऐसा बलवान है तब ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि साधारण जन की क्या बात है | इसलिए हे मन ! श्यामसुन्दर की शरण में चला जा |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

IT IS AN INBORN WEAKNESS OF A HUMAN BEING TO EXPRESS VANITY BY TRYING TO PRESENT HIMSELF AS AN IMPORTANT PERSON TO GAIN COMPLIMENTS. A DEVOTEE,WHO HAS UNDERSTOOD THE INGLORIOUS CONSEQUENCES OF THE GLORY OF THE WORLD,IS NEVER DECEIVED WITH ITS ILLUSIVE MAGNIFICIENCE.THUS HE REJECTS WORLDLY COMPLIMENTS AND REMAINS IN HUMBLENESS.
-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.





A DIVINE PERSONALITY IS BEYOND MAYA.
ALL OF HIS ACTIONS ARE ONLY GRACIOUS.
WHEN YOUR HEART IS IMPREGNATED WITH RADHAKRISHN AND YOUR MASTER,S LOVE,AND YOU ARE LONGING TO MEET RADHAKRISHN,IT IS TRUE DEVOTION,IT IS 'BHAKTI'.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
IN PRACTICE 'DESIRELESSNESS' IS IMPOSSIBLE.SOME DESIRES ARE ESSENTIAL.ONE CAN NEVER BE DESIRELESS,BUT THE FIELD OF DESIRE CAN BE CHANGED FROM THE MATERIAL TO DIVINE.
--------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
"KRISHN AND KRISHN LOVE ARE THE SAME.AS THE HEART MELTS,KRISHN LOVE NATURALLY IMPREGNATES.WHEN THE HEART HAS MELTED FULLY ,THE DIVINE BELOVED KRISHN ENTERS THE DEVOTEE'S HEART TO SUCH A DEPTH THAT THEY BECOME ONE.THE HEART LOSES ITS ORIGINAL MAYIC NATURE AND BECOMES THE FORM OF KRISHN'S LOVE".THIS IS THE FINAL LIMIT OF BHAKTI,CALLED 'PARA BHAKTI'.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

Wednesday, September 21, 2011


अरे मन ! अवसर बीत्यो जात |
काल-कवल वश विधि हरि, हर सब, तोरी कहा बिसात |
लहि पारस नर-तनु सुर-दुर्लभ, गुंजन-हित भटकाट |
बधिर, अंध जिमि सुनत न देखत, रहत विषय मदमात |
‘अब करिहौं, अब करिहौं’, इमि कहि, रहि जैहौ पछितात |
...
होत ‘कृपालु’ प्रलय पल महँ तू, केहि बल पर इतरात ||

भावार्थ- अरे मन ! यह स्वर्ण अवसर बिता जा रहा है | तेरी तो गिनती ही क्या है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि सभी सीमित आयु वाले काल के ग्रास बन जाते हैं | पारस के समान देवताओं के लिए भी दुर्लभ मनुष्य-शरीर को पाकर भी तू अज्ञानवश सांसारिक विषयरूपी घुंघुची के बनावटी सौंदर्य पर मुग्ध हो रहा है | बहरे एवं अंधे के समान तू न तो सत्पुरुषों की बातें ही सुनता और न स्वयं ही संसार के मिथ्यापन को देखता है | विषयों में ही मतवाला हो रहा है | ‘अब इसके बाद करूँगा, अब इसके बाद करूँगा’ ऐसा बार-बार कहते हुए रह जायगा | अन्त में पछताना ही पल्ले पड़ेगा | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि एक क्षण में तो प्राण महाप्रयाण ( मृत्यु ) कर जाते हैं, तू बार-बार भविष्य के लिए क्यों छोड़ देता है | उस मृत्यु को रोकने के लिए तेरे पास शक्ति ही क्या है, जिस पर इतरा रहा है ?

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

सत्य अहिंसा आदि मन!
बिनु हरिभजन न पाय।
जल ते घृत निकले नहीं,
कोटिन करिय उपाय।।
भक्ति शतक------जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज।
...
भावार्थ: सत्य,अहिंसा आदि दैवी गुण केवल श्रीक़ृष्ण भक्ति से ही मिल सकते हैं। जैसे पानी मथने से घी नहीं निकल सकता। ऐसे ही अन्य करोड़ो उपायों से भी दैवी गुण नहीं मिलते।
जब तक भगवान की भक्ति न की जायेगी तब तक अंत:करण शुद्ध ही नहीं होगा। बिना अंत:करण शुद्ध हुए हम सत्य आदि दैवी गुणों का प्रदर्शन मात्र कर सकते हैं, किन्तु वास्तव में दैवीगुण युक्त नहीं हो सकते। केवल मन से सोचने मात्र से हमारा मन शुद्ध नहीं होगा। हाँ -यह हो सकता है कि बारबार सोचने से ,परलोक के भय से कुछ मात्रा में बहिरंग रूप से इन गुणो का दिखावा कर लें।
------श्री महाराजजी.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...