Saturday, September 24, 2011


मन ! इक दिन ऐसा आयेगा |
जो मुट्ठी बाँधे आया सो, हाथ पसारे जायगा |
जोरि जोरि भल धरहु करोरन, अंत कफन सँग पायगा |
जिन को कहत सपूत तिनहिँ सों, अंत बाँस सिर खायगा |
जब यम कालदंड लै अइहैं, देखि देखि डर पायगा |
... तब ‘कृपालु’ धरि हाथ माथ पर, मन ही मन पछ्तायगा ||

भावार्थ- अरे मन ! एक दिन ऐसा आयेगा जिस दिन, जन्म के समय में जो मुट्ठी बाँधकर आया है वह हाथ पसार कर जायेगा | कोई भले ही जोड़-जोड़कर करोड़ों का धन इकट्ठा कर ले, किन्तु अन्त समय में चार गज कफ़न ही पायेगा | जिनको तू सुपूत कहता है अन्त में उन्हीं के हाथ से सिर पर बाँस की मार खायेगा | जब यमराज काल-दण्ड लेकर आयेगा तब हे मन ! तू देख-देखकर डरेगा | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि उस समय सिर पर हाथ रखकर तू मन ही मन पछतायेगा किन्तु तब कुछ भी काम न बनेगा | अतएव तू श्यामसुन्दर का भजन कर |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

Friday, September 23, 2011

कभी यह ना सोचो कि कृपा की कमी है। कमी जो है वह हममे ही है। महापुरुष शरणागत के लिये क्या-क्या भगीरथ प्रयत्न करता है, यह तो भगवतप्राप्ति होने पर ही साधक को समझ में आ सकता है। सब लोग कमरा बंद करके सोचे तो पायेंगे कि मेरा कितना कायापलट हो गया? में कहाँ जा रहा था,कहाँ लाकर खड़ा कर दिया महाराजजी ने?

वे सदा से हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प, हर क्रिया को, हर क्षण ,हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी ही कमी है की हम उन्हे अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीन अतिदीन होकर अपनी इंद्रिय मन बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए अर्पित कर दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हे सदा साथ-साथ महसूस क्यो नहीं करते।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

जरा सोचो यह जीवन क्षणभंगुर है। अत: यदि कल का दिन ना मिला तो इतनी बड़ी गुरु-कृपा, भगवतकृपा, सौभाग्य सब व्यर्थ हो जायेगा। बार-बार सोचो, बार-बार सोचो।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

वे क्या हैं? हम नहीं जान सकते। यह तो केवल वही जान सकता है जिस पर वो कृपा करके बोध करा देते हैं। केवल इतना ही दृढ़ विश्वास बनाए रखो कि वे ही हमारे सर्वस्व हैं। सर्वसमर्थ हैं, सर्वांतर्यामी हैं और इतना ही नहीं वे तो हमारे बिलकुल अपने हैं और सदा से हमपर अकारण करुण हैं।
-----जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाराज.
अगर कोई महापुरुष की कृपा को फील करना सीख जाये, तो बस उसे और साधना करने की आवश्यकता नहीं हैं। जिसके पीछे-पीछे भगवान चलता है, उसने हमे दर्शन दिये, बस यही सोच-सोचकर, बलिहार जाकर, हमें हर्ष में पागल हो जाना चाहिये। एक ईश्वरीय अक्षर का भी ज्ञान गुरु करा दे और उसके बदले मेँ सम्पूर्ण पृथ्वी भी अगर कोई दे दे, तो भी गुरु के ऋण से उऋण नहीं हों सकता।

अहो हरि ! कब ते द्वार खड़ो |
मांगत भीख कृपा की सिर धरि, कोटिन पाप घड़ो |
यधपि लखि निज ओर दयामय, लाजन जात गड़ो |
तदपि तिहारो विरद सोचि जिय, साहस कछुक पड़ो |
रसिकन सुनि बिनु हेतु सनेही, हौं रिरियात अड़ो |
...
जेतिक पतित ‘कृपालु’ मिले तोहिँ, हौं उन माहिँ बड़ो ||

भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! एक दीन-भिखारी तुम्हारे द्वार पर बड़ी देर से खड़ा-खड़ा कृपा की भीख माँग रहा है | साथ ही अपने सिर पर करोड़ों महापापों का घड़ा भी रखे हुए है | हे दया के सागर ! यधपि जब मैं अपने पापों की ओर देखता हूँ, तो लज्जा के कारण पृथ्वी में गड़ा-सा जाता हूँ तथापि जब तुम्हारे ‘अकारण करुण’ इस विरद पर विचार करता हूँ, तो कुछ साहस अवश्य हो जाता है | महापुरुषों के मुख से सुना है कि तुम बिना कारण ही प्रेम करते हो, इसी विश्वास पर गिड़गिड़ाता हुआ हठपूर्वक तुम्हारे द्वार पर अड़ा हुआ हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तुम्हें आज तक जितने भी पापी मिले हैं, मैं उन सबमें महान् हूँ |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...