Sunday, September 25, 2011


जानि लइ हरि तुम्हरी सब पोल |
लाख टका की बात कहौं हौं, सुनहु कान निज खोल |
तुम कहँ चहिय न कछु काहू सों, कहत पीटि श्रुति ढोल |
भूखे तुम ब्रज नारिन गारिन, अति अटपट कटु बोल |
निदरतहूँ घर जात वनचरिन, बिके मनहुँ बिनु मोल |
...
सब को सार ‘कृपालु’ प्रेम बस, देख्यों सबइ टटोल ||

भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! हमने तुम्हारी सब पोल पट्टी जान ली है | हम डंके की चोट से कहते हैं, कान खोलकर सुन लो कि तुम्हें किसी से कुछ नहीं चाहिये, ऐसा वेद भी कह रहे हैं, किन्तु तुम ब्रजांगनाओं की अत्यन्त अटपटी कटु गालियों के बोल के भूखे हो | उन वनचरियों के अपमान करने पर भी बिना मोल के बिके हुए के समान उनके घर जाते हो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैंने सब तोलकर देख लिया है | सब का सार केवल प्रेम ही है | बस उसी की भिक्षा मैं भी चाहता हूँ |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

Saturday, September 24, 2011


जो व्यक्ति अनावश्यक अधिक बोलता है, उसी की लड़ाई अधिक होती है। वह स्वयं परेशान रहता है और दूसरों को भी परेशान करता है। अपना परमार्थ भी वह इसी दोष के कारण ही खराब कर लेता है। जो चुप रहता है, गड़बड़ी तो उससे भी होती है,लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पाती। संसार में भी उसको अधिक परेशानी नहीं होती और परमार्थ भी उसका ठीक रहता है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
महापुरुष के करुणामय व्यवहार को भला कोई कैसे समझ सकता है। स्वयं गाली खाकर भी वे अपना चिंतन (सत का चिंतन) करा कर जीव के अंत:करण को शुद्ध जो करना चाहते हैं।

जिस जीव का अंत:करण जितना पापयुक्त होगा, उसको उतनी ही मात्रा में संत के प्रति अश्रद्धा होगी। वो हर जगह बुद्धि लगायेगा और तर्क, वितर्क, कुतर्क, अतितर्क, संशय करेगा। जितना अधिक पाप होगा अंदर, उतना ही हम दूर जाते जाएंगे महापुरुष और भगवान से।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
साधक जब तक पूर्ण श्रद्धायुक्त नहीं होगा , वो ज्ञान का ग्रहण नहीं कर सकता। अगर पूर्ण श्रद्धा नहीं है, संशय है तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। यानि वो संत पर दुर्भावना कर बैठेगा। यह बाबाजी कैसे हैं? कैसे हैं? सोचेगा, जैसा हम चाहते हैं, ऐसा बाबा होना चाहिये। हर आदमी इतना बड़ा मूर्ख है कि वो अपनी राय के अनुसार संत चाहता है।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:-
'स्मरण',एक मिनट तो क्या एक क्षण से शुरू होता है, इसे बढ़ाना ही साधना है। इस एक क्षण के स्मरण को मरण तक बढ़ाते रहना है। यह एक क्षण का स्मरण जब एक क्षण को भी विस्मृत न हो ,यही लक्ष्य की सिद्धि है।

यदि कभी कोई जीव हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज) से गुरुमंत्र के लिए प्रेमाग्रह करता है तो मुसकुराते हुए जवाब देते हैं। हमारे विषय में तो सब जानते ही हैं कि ना चेला बनाता है, और ना बनाने देता हैं। हमारे खिलाफ़ है सारे बाबा लोग, चाहे वो कोई भी हो। इसलिए मेरे पास कोई मंत्र लेने के लिये सोचना भी नहीं। मुझे अपना बनाना है तो- सदा सर्वत्र हर श्वास के साथ 'राधा' नाम का जप करो।


क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो. पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो. 


श्री महाराजजी के मुखारविंद से:
हम आप लोगों के सामने उतनी ही बात प्रकट करते हैं जितनी आप लोग समझ पाते हैं। कभी उससे थोड़ा अधिक भी प्रकट कर देते हैं। शेष जो रिजर्व रहती हैं,वह बहुत ज्यादा है। उसको यदि हम प्रकट भी करना चाहें तो उससे कोई मतलब हल होने वाला नहीं है।



मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...