Monday, September 26, 2011

ज़ीरो में गुणा करो चाहे ज़ीरो से, चाहे करोड़ से ,जवाब ज़ीरो ही आयेगा। ऐसे ही बिना मन के कोई भी इंद्रिय की कोई भी साधना लिखी नहीं जायेगी साधना मानी नहीं जायेगी। उसको एक्टिंग कहते हैं और भगवान से एक्टिंग करना, यह सबसे बुरी बात है। संसार में करो ठीक है। वह तो एक्टिंग की जगह है ही। वहाँ तो फ़ैक्ट करते हो और जहां फ़ैक्ट करना है वहाँ एक्टिंग करते हो ,लापरवाही करते हो,ये अच्छा नहीं है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु.
श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।




 
 

हे श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लकीन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।
खूब तरसाया है तेरी ख़्वाहिशों ने ही तुझे।
तू भी अब इन ख़्वाहिशों को कुछ तरसती छोड़ दे।।


Sunday, September 25, 2011

बार बार सोचो कि भगवान में सुख है , भगवान में ही सुख है. हरि गुरु ही मेरे है. यह बार बार सोचोगे तो भगवान से प्यार हो जायेगा. सीधा सा इलाज है . सोचना , बस बोलना नहीं .सोचना. बोलना बहुत हो चूका. बार बार सोचने से डिसीजन होगा और वह डिसीजन ही साधना करायेगा.


क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो. पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो. 

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.



JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ KI JAI HO.........



 


भगवान तुमको नहीं भूलते. वो तो तुम्हारे ह्रदय में बैठे है, सदा सर्वत्र. वो तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ते. तुम ही भूले हुये हो अपने बाप को. भगवान कहते है - बस मेरे स्मरण करो और कुछ न करो. में सब कुछ करूँगा तुम्हारा . तुम खाली स्मरण करो बाकी सब काम में करूँगा और सदा के लिये अपना बना लूँगा.

- JAGADGURU SHREE KRIPALUJI MAHARAJ.



श्री राधाकृष्णभ्याम नम:
श्री गुरवे नम: श्री गुरवे नम: श्री गुरवे नम:!

हे परम प्रियतम पूर्णतम पूरुषोत्तम श्री कृष्ण! तुमसे विमुख होने के कारण अनादिकाल से हमने अनंतानंत दुख पाये एवं पा रहे हैं। पाप करते करते अंत:करण इतना मलिन हो चुका है कि रसिकों द्वारा यह जानने पर भी कि तुम अपनी भुजाओं को पसारे अपनी वात्सल्यमयी दृष्टि से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हो, तुम्हारी शरण में नहीं आ पाता।
हे अशरण शरण! तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हें कोई जान भी तो नहीं सकता।ऐसी स्थिति मेँ,हे अकारण करुण! पतितपावन श्रीकृष्ण! तुम अपनी अहैतुकी कृपा से ही हमको अपना लो। हे करुणा सागर! हम भुक्ति-मुक्ति आदि कुछ नहीं मांगते ,हमें तो केवल तुम्हारे निष्काम प्रेम की ही एकमात्र चाह है।
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हे नाथ! अपने विरद की और देखकर इस अधम को निराश न करो। हे जीवनधन! अब बहुत हो चुका,अब तो तुम्हारे प्रेम के बिना यह जीवन मृत्यु से भी अधिक भयानक है। अतएव:
प्रेम भिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि।
साकेत बिहारी श्री राघवेंद्र सरकार की जय।
वृन्दावन बिहारी श्री यादवेन्द्र सरकार की जय।
श्रीमद सद्गुरु सरकार की जय।
जय-जय श्री राधे जय-जय श्री राधे जय-जय श्री राधे।

--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...