This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, September 28, 2011
Tuesday, September 27, 2011
अहो हरि ! तुम मम साहूकार |
तुम्हरे ऋणहिं उऋण नहिं होइ सक, अगनित जनम मझार |
करि करुणा करुणावरुणालय, नर तनु दिय सरकार |
पुनि निज वेदन मार्ग बतायो, कीनो मम उपकार |
पुनि समुझायेहु संत अनंतन, लै पुनि पुनि अवतार |
... कह ‘कृपालु’ मन तबहुँ सुन्यो नहिं, तुम ही सुनहु पुकार ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! तुम मेरे साहूकार हो और मैं तुम्हारा कर्ज़दार हूँ | तुम्हारे अकारण उपकारों के ऋण से मैं अनन्त जन्मों में भी उऋण नहीं हो सकता | हे करुणा-वरुणालय ! तुमने अकारण करुणा के ही परिणाम-स्वरूप मनुष्य शरीर दिया, फिर स्वयं वेदों को प्रकट करके अपनी प्राप्ति का मार्गदर्शन किया, फिर अनन्तानन्त संतों को अवतार दिला कर मुझे बार-बार जगाया | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं तब भी इस नीच मन ने मेरी नहीं सुनी | हे श्यामसुन्दर ! अब तुम्हीं हमारी पुकार सुनकर हमें अपना लो |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
तुम्हरे ऋणहिं उऋण नहिं होइ सक, अगनित जनम मझार |
करि करुणा करुणावरुणालय, नर तनु दिय सरकार |
पुनि निज वेदन मार्ग बतायो, कीनो मम उपकार |
पुनि समुझायेहु संत अनंतन, लै पुनि पुनि अवतार |
... कह ‘कृपालु’ मन तबहुँ सुन्यो नहिं, तुम ही सुनहु पुकार ||
भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! तुम मेरे साहूकार हो और मैं तुम्हारा कर्ज़दार हूँ | तुम्हारे अकारण उपकारों के ऋण से मैं अनन्त जन्मों में भी उऋण नहीं हो सकता | हे करुणा-वरुणालय ! तुमने अकारण करुणा के ही परिणाम-स्वरूप मनुष्य शरीर दिया, फिर स्वयं वेदों को प्रकट करके अपनी प्राप्ति का मार्गदर्शन किया, फिर अनन्तानन्त संतों को अवतार दिला कर मुझे बार-बार जगाया | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं तब भी इस नीच मन ने मेरी नहीं सुनी | हे श्यामसुन्दर ! अब तुम्हीं हमारी पुकार सुनकर हमें अपना लो |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
ALWAYS REMEMBER YOUR BELOVED RADHAKRISHN AND YOUR GRACIOUS MASTER IN YOUR HEART AND KEEP ON SINGING THEIR VIRTUES.
******RADHEY-RADHEY******
O MY MIND! BE HUMBLE,SELFLESS AND WHOLEHEARTEDLY SURRENDER TO YOUR BELOVED MASTER,AND ALWAYS TRY TO PLEASE HIM WITH YOUR SINCERE SERVICES.
******RADHEY-RADHEY********
"ALL INDIVIDUAL SOULS ARE ETERNAL,IMMORTAL AND UNBORN."
MY MASTER (JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ) IS THE DESCENSION OF THE BLISSFUL NECTAR OF DIVINE LOVE.
*******RADHEY-RADHEY********
"NO SOUL CAN REMAIN INACTIVE EVEN FOR A MOMENT." IT IS THE INHERENT NATURE OF EVERY INDIVIDUAL TO CONSTANTLY PERFORM ACTIONS WITH THE AIM OF ATTAINING HAPPINESS.HE WILL NOT CEASE TO WORK UNTIL HE ATTAINS SUPREME BLISS.
-----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
******RADHEY-RADHEY******
O MY MIND! BE HUMBLE,SELFLESS AND WHOLEHEARTEDLY SURRENDER TO YOUR BELOVED MASTER,AND ALWAYS TRY TO PLEASE HIM WITH YOUR SINCERE SERVICES.
******RADHEY-RADHEY********
"ALL INDIVIDUAL SOULS ARE ETERNAL,IMMORTAL AND UNBORN."
MY MASTER (JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ) IS THE DESCENSION OF THE BLISSFUL NECTAR OF DIVINE LOVE.
*******RADHEY-RADHEY********
"NO SOUL CAN REMAIN INACTIVE EVEN FOR A MOMENT." IT IS THE INHERENT NATURE OF EVERY INDIVIDUAL TO CONSTANTLY PERFORM ACTIONS WITH THE AIM OF ATTAINING HAPPINESS.HE WILL NOT CEASE TO WORK UNTIL HE ATTAINS SUPREME BLISS.
-----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
वेद शास्त्र कहे संबंध अभिधेय प्रयोजन।
कृष्ण, कृष्ण भक्ति, प्रेम,तिन महाधन।।
श्रवण कीर्तन स्मरण ही है ,प्रमुख साधन प्यारे।
स्मरण ही को साधना का, प्राण मानो प्यारे।।
सकल दुख का मूल है इक, हरि विमुखता प्यारे।
हरिहि सन्मुखता है याकी, एक औषधि प्यारे।।
स्मरणयुक्त नित रोके माँगो,प्रेम हरि का प्यारे।
उनके सुख को मानु निज सुख लक्ष्य यह रखु प्यारे।।
श्री महाराजजी बताते हैं कि: तीन चीज़ प्रमुख है- 'हरि', 'गुरु' और 'हरि-गुरु' की मिलन वाली पावर, 'भक्ति'। इन तीनों में 'अनन्य' रहो।
Monday, September 26, 2011
भला तुम कैसे हो भगवान |
प्रीति करत नित पर नारिन सों, लंपट नर उनमान |
पतिव्रत-धर्म मिटावत आपुहिं, आपुहिं करत बखान |
वेद वेध जब वेद न मानत, और कौन पुनि मान |
हरि कह ‘दैहिक धर्म पतिव्रत, ता फल स्वर्गहिं जान |
... यह ‘कृपालु’ परधर्म मोरि-रति, ता फल दिव्य महान’ ||
भावार्थ- एक भोली भाली सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर ! तुम भला भगवान् कैसे हो सकते हो ? तुम विषयासक्त मनुष्य की भाँति पर स्त्रियों से प्यार करते हो तथा स्वयं ही पतिव्रत धर्म की वेदों में प्रशंसा करते हुए स्वयं ही उसे नष्ट भी करते हो | वेदों से जानने योग्य भगवान् ही जब वेद को नहीं मानता तो फिर भला और कौन मानेगा | श्यामसुन्दर ने कहा सांसारिक पतियों से अनन्य प्रेम होना ही पतिव्रत धर्म है, जिसे दैहिक धर्म भी कहते हैं | इसका फल क्षणभंगुर स्वर्ग ही है एवं ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में परम पति परमेश्वर में अनन्य प्रेम होना ही परधर्म है, इसका फल अनन्त काल के लिए दिव्य पमानन्द प्राप्ति अथवा गोलोक प्राप्ति है |
(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
प्रीति करत नित पर नारिन सों, लंपट नर उनमान |
पतिव्रत-धर्म मिटावत आपुहिं, आपुहिं करत बखान |
वेद वेध जब वेद न मानत, और कौन पुनि मान |
हरि कह ‘दैहिक धर्म पतिव्रत, ता फल स्वर्गहिं जान |
... यह ‘कृपालु’ परधर्म मोरि-रति, ता फल दिव्य महान’ ||
भावार्थ- एक भोली भाली सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर ! तुम भला भगवान् कैसे हो सकते हो ? तुम विषयासक्त मनुष्य की भाँति पर स्त्रियों से प्यार करते हो तथा स्वयं ही पतिव्रत धर्म की वेदों में प्रशंसा करते हुए स्वयं ही उसे नष्ट भी करते हो | वेदों से जानने योग्य भगवान् ही जब वेद को नहीं मानता तो फिर भला और कौन मानेगा | श्यामसुन्दर ने कहा सांसारिक पतियों से अनन्य प्रेम होना ही पतिव्रत धर्म है, जिसे दैहिक धर्म भी कहते हैं | इसका फल क्षणभंगुर स्वर्ग ही है एवं ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में परम पति परमेश्वर में अनन्य प्रेम होना ही परधर्म है, इसका फल अनन्त काल के लिए दिव्य पमानन्द प्राप्ति अथवा गोलोक प्राप्ति है |
(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...






















