This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, September 29, 2011
एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट कुछ नहीं दूंगा, केयर ऑफ महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।
गुरु: कृपालुर्मम शरणम वन्देsहं सदगुरुचरणम...............
हम शिष्य भी नहीं बनाते एवं समपरदाय भी नहीं चलाते।
यह सब मेरे मत से उचित नहीं हैं। संपरदायों से परस्पर द्वेष फैलता है। में सभी संपरदायचार्यों के सिद्धांतों का पूरा समन्वय करता हूँ।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
संत एवं श्यामा श्याम सदा हमारी रक्षा करते हैं। सदा हमारे प्रत्येक संकल्प को नोट करते हैं, सदा सर्वत्त्र बार-बार अनुभव करने का अभ्यास करो। यह कल्पना नहीं सत्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
वास्तविक महापुरुष का केवल एक ही लक्ष्य होता है, वो है जीव को ईश्वर कि और ले जाना।
-----श्री महाराजजी.
गुरु: कृपालुर्मम शरणम वन्देsहं सदगुरुचरणम...............
हम शिष्य भी नहीं बनाते एवं समपरदाय भी नहीं चलाते।
यह सब मेरे मत से उचित नहीं हैं। संपरदायों से परस्पर द्वेष फैलता है। में सभी संपरदायचार्यों के सिद्धांतों का पूरा समन्वय करता हूँ।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
संत एवं श्यामा श्याम सदा हमारी रक्षा करते हैं। सदा हमारे प्रत्येक संकल्प को नोट करते हैं, सदा सर्वत्त्र बार-बार अनुभव करने का अभ्यास करो। यह कल्पना नहीं सत्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
वास्तविक महापुरुष का केवल एक ही लक्ष्य होता है, वो है जीव को ईश्वर कि और ले जाना।
-----श्री महाराजजी.
भगवान से बड़ा है, उनका भक्त। अर्जुन से भगवान ने कहा कि जो मेरे भक्त है वो मेरे भक्त नहीं है, धोखा है उनको। जो मेरे भक्त के भक्त हैं वो ही मेरे सच्चे भक्त हैं।
A TRUE SERVANT WILL NOT ASK FOR ANYTHING FROM HIS MASTER,THAT IS DONE ONLY BY A BUSSINESSMAN.
CONSTANTLY DEVELOP FEELING OF FORBEARANCE,HUMILITY AND SUBMISSIVENESS.
JUST AS A DIAMOND CAN BE RECOGNIZED ONLY BY AN EXPERT,THERE ARE ONLY A FEW PEOPLE WHO CAN RECOGNIZE A GENUINE GURU.
चुम्बक का कमाल,शुद्ध लोहे पर होता है, मिलावट वाले पर नहीं हो सकता। जिस लोहे में 90 परसेंट मिलावट है, उसको चुंबक नहीं खींच सकता। वो तो केवल क्लीन लोहा हो उसी को खींचता है। तो भगवान का अवतार या संत महापुरुष उसी को जल्दी खींच सकते हैं ,जिसका अंत:करण जितना शुद्ध हो। पापात्मा नहीं खिंचता वो हँसता है। बाबाजी क्या बोल रहे थे? भगवान,इन लोगो को और कोई काम नहीं है।मज़ाक बनाते हैं,खिल्ली उड़ाते हैं।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
सब झूठो जग व्यवहार रे |
जब लौं तन मन धन जन सब रह, पुछत सब संसार रे |
जब उन कहँ अभाव देखत तब, तजत सकल परिवार रे |
जब लौं काम बनत काहू सों, जोरत नात हजार रे |
जब ही काम बनत नहिं देखत, रहति न यारी यार रे |
... ताते भजु ‘कृपालु’ मन छिन-छिन, नागर नंदकुमार रे ||
भावार्थ- अरे मन ! इस संसार का समस्त व्यवहार झूठा है | जब तक किसी के पास तन, मन, धन एवं सहायक जन रहते हैं तब तक उसे सब संसार पूछता है किन्तु जब इनका अभाव देखता है तब अपना परिवार भी उसे छोड़ देता है | जब तक किसी से स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक उससे हजारों नाते जोड़ता है किन्तु जैसे ही अपना काम बनते नहीं देखता वैसे ही वह मित्र भी अपनी मित्रता छोड़ देता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! इसलिए तू संसार से किसी प्रकार की आशा न रखते हुए प्रतिक्षण श्यामसुन्दर का भजन कर |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
जब लौं तन मन धन जन सब रह, पुछत सब संसार रे |
जब उन कहँ अभाव देखत तब, तजत सकल परिवार रे |
जब लौं काम बनत काहू सों, जोरत नात हजार रे |
जब ही काम बनत नहिं देखत, रहति न यारी यार रे |
... ताते भजु ‘कृपालु’ मन छिन-छिन, नागर नंदकुमार रे ||
भावार्थ- अरे मन ! इस संसार का समस्त व्यवहार झूठा है | जब तक किसी के पास तन, मन, धन एवं सहायक जन रहते हैं तब तक उसे सब संसार पूछता है किन्तु जब इनका अभाव देखता है तब अपना परिवार भी उसे छोड़ देता है | जब तक किसी से स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक उससे हजारों नाते जोड़ता है किन्तु जैसे ही अपना काम बनते नहीं देखता वैसे ही वह मित्र भी अपनी मित्रता छोड़ देता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! इसलिए तू संसार से किसी प्रकार की आशा न रखते हुए प्रतिक्षण श्यामसुन्दर का भजन कर |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
Wednesday, September 28, 2011
भला तुम कैसे हो भगवान |
प्रीति करत नित पर नारिन सों, लंपट नर उनमान |
पतिव्रत-धर्म मिटावत आपुहिं, आपुहिं करत बखान |
वेद वेध जब वेद न मानत, और कौन पुनि मान |
हरि कह ‘दैहिक धर्म पतिव्रत, ता फल स्वर्गहिं जान |
यह ‘कृपालु’ परधर्म मोरि-रति, ता फल दिव्य महान’ ||
भावार्थ- एक भोली भाली सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर ! तुम भला भगवान् कैसे हो सकते हो ? तुम विषयासक्त मनुष्य की भाँति पर स्त्रियों से प्यार करते हो तथा स्वयं ही पतिव्रत धर्म की वेदों में प्रशंसा करते हुए स्वयं ही उसे नष्ट भी करते हो | वेदों से जानने योग्य भगवान् ही जब वेद को नहीं मानता तो फिर भला और कौन मानेगा | श्यामसुन्दर ने कहा सांसारिक पतियों से अनन्य प्रेम होना ही पतिव्रत धर्म है, जिसे दैहिक धर्म भी कहते हैं | इसका फल क्षणभंगुर स्वर्ग ही है एवं ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में परम पति परमेश्वर में अनन्य प्रेम होना ही परधर्म है, इसका फल अनन्त काल के लिए दिव्य पमानन्द प्राप्ति अथवा गोलोक प्राप्ति है |
(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
हरि गुरु की सेवा से, हरि गुरु के निरंतर स्मरण से हमारा अन्तः करण शुद्ध होगा ।
ये प्रतिज्ञा कर लो सब लोग की जब आपस मे मिलो तो केवल भगवद् चर्चा करो और यदि दूसरा न करे तो वहाँ से तुरंत चले जाओ, हट जाओ । इस प्रकार कुसंग से बचो । जो कमाइए उसको लॉक करके रखिए, लापरवाही मत कीजिये ।
वे जरा अटपटे स्वभाव के हैं । छिप छिप कर देखते हैं एवं अब तुम जरा सा असावधान होकर संसारी वस्तु की आसक्ति मे बह जाते हो तब श्याम सुंदर को वेदना होती है की यह मुझे अपना मान कर भी गलत काम कर रहा है । मन श्यामसुंदर को दे देने के पश्चात ! उसमे संसारिक चाह न लाना चाहिए । यह श्यामसुंदर के लिए कष्टप्रद है ।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
हरि एवं गुरु से जितना विशुद्ध प्रेम होगा,उतना ही संसार से सच्चा वैराग्य होगा।
ज़ीरो में गुणा करो चाहे ज़ीरो से, चाहे करोड़ से ,जवाब ज़ीरो ही आयेगा। ऐसे ही बिना मन के कोई भी इंद्रिय की कोई भी साधना लिखी नहीं जायेगी साधना मानी नहीं जायेगी। उसको एक्टिंग कहते हैं और भगवान से एक्टिंग करना, यह सबसे बुरी बात है। संसार में करो ठीक है। वह तो एक्टिंग की जगह है ही। वहाँ तो फ़ैक्ट करते हो और जहां फ़ैक्ट करना है वहाँ एक्टिंग करते हो ,लापरवाही करते हो,ये अच्छा नहीं है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु.
ये प्रतिज्ञा कर लो सब लोग की जब आपस मे मिलो तो केवल भगवद् चर्चा करो और यदि दूसरा न करे तो वहाँ से तुरंत चले जाओ, हट जाओ । इस प्रकार कुसंग से बचो । जो कमाइए उसको लॉक करके रखिए, लापरवाही मत कीजिये ।
वे जरा अटपटे स्वभाव के हैं । छिप छिप कर देखते हैं एवं अब तुम जरा सा असावधान होकर संसारी वस्तु की आसक्ति मे बह जाते हो तब श्याम सुंदर को वेदना होती है की यह मुझे अपना मान कर भी गलत काम कर रहा है । मन श्यामसुंदर को दे देने के पश्चात ! उसमे संसारिक चाह न लाना चाहिए । यह श्यामसुंदर के लिए कष्टप्रद है ।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
हरि एवं गुरु से जितना विशुद्ध प्रेम होगा,उतना ही संसार से सच्चा वैराग्य होगा।
ज़ीरो में गुणा करो चाहे ज़ीरो से, चाहे करोड़ से ,जवाब ज़ीरो ही आयेगा। ऐसे ही बिना मन के कोई भी इंद्रिय की कोई भी साधना लिखी नहीं जायेगी साधना मानी नहीं जायेगी। उसको एक्टिंग कहते हैं और भगवान से एक्टिंग करना, यह सबसे बुरी बात है। संसार में करो ठीक है। वह तो एक्टिंग की जगह है ही। वहाँ तो फ़ैक्ट करते हो और जहां फ़ैक्ट करना है वहाँ एक्टिंग करते हो ,लापरवाही करते हो,ये अच्छा नहीं है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु.
Subscribe to:
Posts (Atom)
मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
-
Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
-
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
-
ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...



















