Wednesday, October 5, 2011





IN ALL THE DIRECTIONS OF THE WHOLE UNIVERSE "NORTH,SOUTH,EAST,AND WEST","JAGADGURUTTAM BHAGWAN SHRI KRIPALUJI MAHARAJ IS THE BEST".
RADHEY-RADHEY.



साक्षी बन कर नृत्य किय,शरत पूर्णिमा चंद।
जन्म दिवस गुरुदेव का,ज्यू प्रकटे आनंदकंद।।

कोटि-कोटि प्रणाम, हे, दिव्य धाम।
शत-शत नमन वसुधा अभिराम।।



"BY DOING EVERYTHING,NOTHING IS ATTAINED.
BY DOING NOTHING,EVERYTHING IS ATTAINED."
-----PRINCIPLE OF 'SHARNAGATI' AS TOLD BY JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

Monday, October 3, 2011


O MY DEAR MAHARAJJI (SHRI KRIPALUJI MAHARAJ),YOU ARE THE PROTECTOR OF HUMBLE SOULS BUT I AM AN INCARNATION OF VANITY.PLEASE DO SOMETHING FOR ME SO THAT I MAY BECOME HUMBLE.

KNOWLEDGE AND DETACHMENT (GYAAN AVAM VAIRAGYA) ARE AUTOMATIC BY-PRODUCTS OF DEVOTIONAL PRACTICE.ONE DOES NOT NEED TO ENDEAVOUR SEPERATELY FOR THEM.
------SHRI MAHARAJJI.


"BY DOING EVERYTHING,NOTHING IS ATTAINED.
BY DOING NOTHING,EVERYTHING IS ATTAINED."
-----PRINCIPLE OF 'SHARNAGATI' AS TOLD BY JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
अरे मन ! सुन सूधी-सी बात |
तू अपनी स्वामिनि आत्महिँ हित, करत कर्म दिन रात |
पै आत्महिं-हित, परमात्महिँ नित, यह कत नहिं पतियात |
जग-वैभव मायाभव यामें, सुख-दुख कछु नहिं तात |
पुनि येहि दै चह पामात्महिं-सुख, कत इतनो बौरात |
...
तजु ‘कृपालु’ हठ भज मन निशि-दिन, सुंदर श्यामलगात ||


भावार्थ- अरे मन ! सीधी सी बात सुन ! तू आत्मा का दास है; अतएव प्रतिक्षण अपनी स्वामिनी आत्मा के सुख के लिए ही कर्म करता रहता है | किन्तु यह नहीं जानता कि जिस प्रकार तू आत्मा का नित्य दास है, उसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का नित्य दास है | अतएव आत्मा का सुख एक मात्र परमात्मा में ही है | संसार के समस्त ऐश्वर्य माया से बने हैं, अतएव इनमें सुख या दु:ख कुछ भी नहीं है | फिर तू उन मायिक ऐश्वर्य को देखकर परमात्मा सम्बन्धी नित्य सुख चाहता है, इससे बड़ा पागलपन और क्या हो सकता है ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अरे मन ! अब हठ छोड़ दे एवं श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन कर |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
हे! कृपामयी राधे, मेरे ऊपर भी तो कृपा करो, मुझ पर कृपा करने से तुम्हारे कृपा के भंडार मे कोई कमी नहीं आएगी अपितु तुम्हारे यश का ही विस्तार होगा
हे! राधे, तुम्हारा तन, मन, प्राण सब कृपा द्वारा ही निर्मित है। तुम तो कृपा का ही एक दूसरा स्वरूप हो। राधे ! कृपा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य तुम नहीं कर सकती कृपा किए बिना तुमसे रहा भी नहीं जाता, जिस प्रकार संसार मे मछ्ली जल से ही जीवित रहती है उसी प्रकार कृपा ही तुम्हारा जीवन है अर्थात तुमने जीवन धारण ही कृपा करने के लिए किया है संसार मे सुर, नर, मुनि भी कृपा करते देखे जाते हैं परंतु वे बिना कारण के कृपा नहीं कर सकते।

- जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज.





मेरो प्रियतम कुंज बिहारी.....................

मेरो साँचो सजन मेरो नंदनंदन, वे मेरे सजन मैं उनकी दुल्हन।
मेरो प्रियतम सत चित आनंदघन,बिनु नंदनंदन नहिं कल पल छन।
मेरो रोम रोम चह पिय परसन,करु ऐसों यतन होवे मधुर मिलन।
चह मधुर मिलन,मन नन्द सुवन,तु 'कृपालु' को सजन अपनाओ दुल्हन।।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

Sunday, October 2, 2011

भक्त के लिये भगवान का प्राण समर्पित है।

GOD IS READY TO DO ANYTHING AND EVERYTHING FOR A TRULY SURRENDERED DEVOTEE.


मनगढ़ मन मोहन का गढ़, कान्हा की मुस्कान यहाँ।
मस्ती के कुंज घने बहुतेरे, राधे नाम की छाव यहाँ।।







अरे मन ! तू मेरो मत मान |
‘अनन्य चेता: सततं यो मां’, गुन येहि गीता-ज्ञान |
तन,मन,प्राण समर्पण करि जो, कर नित हरि को ध्यान |
ताको हरि अति सुलभ जान मन, रह न कामना आन |
तर्क, वितर्क, कुतर्क आदि की, तजि दे अपनी बान |
...
रहु ‘कृपालु’ सद्गुरु शरणागति, करु गोविँद गुनगान ||

भावार्थ- अरे मन ! तू मेरे सिद्धान्त को मान ले | ‘अनन्य चेता:’ इस गीता महावाक्य का यही अभिप्राय है कि जो तन, मन, प्राण समर्पण करके श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण करता है, वे उसके लिये सुलभ हैं, किन्तु अन्य कामनायें नहीं रहनी चाहिये | हे मन ! तू तर्क, वितर्क आदि करने की अपनी आदत छोड़ दे | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अपने गुरु की शरण में रहकर गोविन्द गुण गाओ |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
LIMIT YOUR FRIENDSHIPS AND LIMIT YOUR INTERACTION WITH OTHERS.

कम दोस्ती रखो। कम लोगों से मिलो। कम लोगों से बात करो।


अपनी भावना के अनुसार ही हम भगवान और संत को देखते हैं और उसी भावना के अनुसार फल मिलता है। एक भगवतप्राप्ति कर लेता है और एक नामापराध कमा के लौट आता है। और पाप कमा लेता है भगवान के पास जाकर, संत के पास जाकर 'ये तो ऐसा लगता है,मेरा ख्याल है कि'.......ये अपना ख्याल लगाता है वहाँ। अरे पहले दो-दो रुपए के स्वार्थ साधने वाले,झूठ बोलने वाले, अपने माँ, बाप ,बीबी को तो समझ नहीं सके तुम और संत और भगवान को समझन...े जा रहे हो। कहाँ जा रहे हो। हैसियत क्या है तुम्हारी,बुद्धि तो मायिक है।एक ए,बी,सी,डी.......पढ़ने वाला बच्चा प्रोफेसर की परीक्षा ले रहा है कि में देखूंगा प्रोफेसर कितना काबिल है। अरे क्या देखेगा तू तो ए,बी,सी........नहीं जानता।अपनी नॉलेज को पहले देख।अपनी योग्यता को पहले देख। तो इसलिए जिसकी जैसी भावना होती है वैसा ही फल अवतार काल में भी मिलता है अधिक नहीं मिलता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
 
ALWAYS KEEP IN MIND THAT DEATH CAN APPROACH YOU AT ANYTIME.WHO KNOWS WHETHER YOU WILL LIVE THE NEXT MOMENT.
मौत को हर समय याद रखो। पता नहीं अगला क्षण मिले न मिले।
 
THE DESIRE TO APPEAR TO BE GOOD IN THE EYES OF OTHERS, IS THE MAJOR CAUSE OF OUR SPIRITUAL DOWNFALL.

हम लोग स्वयं को अच्छा कहलाने का प्रयत्न करते हैं, यह महान पतन कारक है।
यह समझे रहना है की हमारे प्रेमास्पद श्री कृष्ण सर्वत्र है एवं सर्वदा है .विश्व में एक परमाणु भी ऐसा नहीं है, जहाँ उसका निवास न हो. जैसे तिल में तेल व्याप्त होता है ऐसे ही भगवान भी सर्वव्यापक है. उनको कोई भी स्थान या काल अपवित्र नहीं कर सकता.वरन वे ही अपवित्र को पवित्र कर देते है .


भजु मन जीवन धन नन्दनन्दन.
बीतयो जाय जीवन बिनु प्रेम धन.
जीवन धन बिनु नही चह जीवन.
भजु मन क्षण क्षण जीवन धन. 


मेरे महाराजजी प्यारे,मेरे गिरिधर प्यारे.
जोई महाराजजी प्यारे , सोई गिरिधर प्यारे.
भज महाराजजी प्यारे,भज गिरिधर प्यारे.
जहँ महाराजजी प्यारे,तहँ गिरिधर प्यारे.






भगवान योगमाया के पर्दे में रहते हैं और जीव माया के पर्दे में, अत: भगवान के साकार रूप में सामने खड़े होने पर भी हम उन्हें अपनी भावना के अनुसार ही देख पाते हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.



 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...