Monday, October 10, 2011



गुरु द्वारा दिया गया 'तत्त्वज्ञान' हमारे लिये रिवॉल्वर का काम करेगा। बड़ा भारी पहलवान आ रहा है वह हमें मार देगा। अरे! क्या मार देगा। रिवॉल्वर जेब में है तो भागेगा डर के मारे वो पहलवान। तो वो शक्ति है गुरु के उपदेश में कि संसार की बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति का सामना भी आसानी से कर सकते हो। गुरु की आज्ञा का अगर हम पालन करते तो हम लापरवाही न करते। इसलिए अपने पतन में हम स्वयं कारण है, हमारी बुद्धि, हमार...ी लापरवाही और उत्थान में गुरु कृपा मानो ,हमारी बुद्धि से उत्थान कभी नहीं हुआ आजतक न होगा ,हमारी बुद्धि तो मायिक है ये तो ईश्वरीय बुद्धि महापुरुष ने दान दी कि ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो, इस बुद्धि के दान के द्वारा भगवननाम लिया, भगवान के लिये आँसू बहाया जो कुछ भी अच्छी चीजें हमारे पास आई वो महापुरुष के द्वारा ही आई। उसकी कृपा से अच्छे काम हो रहें है और गलत काम इसलिए हो रहें है कि महापुरुष के आदेश को, उपदेश को छोड़ दिया और अपनी बुद्धि के बल पर आ गये तो हमारी बुद्धि तो गड़बड़ ही थी, उसने हमें गड़बड़ में डाल दिया बस अब मर गये, अब हम दोष दे रहें है महापुरुष को, भगवान को, इसलिए सदा यह ज्ञान रहना चाहिए कि अच्छे कार्य उनकी ही कृपा से हो रहें है लेकिन गलत कार्य में अपना दोष ही समझना चाहिये क्योकि हमने उनके आदेशों का उल्लंघन किया लापरवाही की और अपनी बुद्धि के बल पर हमने कार्य किया इसलिए पतन हो गया हमारा।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।

The Pillars of Devotion!
There are 8.4 million species on the earth planet. Amongst them, the human form of life is the only one where spiritual practice is made possible to get rid of all sorrows and attain eternal happiness. This human life is so rare that even celestial Gods long for it. This human form can only be attained by the ultimate grace of God.
We are already aware that Supreme God, S...hree Krishna is synonymous with Bliss. Therefore, this proves that the attainment of God is the only goal of human life, since we all seek happiness. We also know that the only way to achieve this is to practice Bhakti (Devotion). In Bhakti, all we need to do is remember God in our mind and keep increasing our love for Him. We have to increase the longing for His Divine vision. This alone has the power to purify our hearts and when the process is complete, our guru will bestow upon us the priceless Divine love of Shree Radha Krishna.
There are many types of Bhakti, but three of them are most significant: - Shravan Bhakti, Kirtan Bhakti and Smaran Bhakti.
Shravan Bhakti means to listen to knowledge related to God, understand it and follow it. To chant, sing and immerse ourselves in the Divine names of God, His virtues, His glories and His pastimes is known as Kirtan Bhakti.
Smaran Bhakti is to deeply meditate on the form of God in your mind. This is called as Roopdhyan. Every individual is qualified and has the right to do Bhakti, unlike other paths (Gyan and Yog) where there are many rules, conditions and pre-requisites.
There are three main conditions which every follower of the path Bhakti has to fulfill.
trinādapi sunīchen tarorapi sahiṣhṇunā |
amāninā mānden kīrtanīyaḥ sadā hariḥ ||
Humility trinādapi sunīchen - A devotee must be more humble than a blade of grass. A devotee must realize and consider oneself to be more humble than a blade of grass. When you crush grass under your feet, it never protests or complaints. It bends as directed and then becomes straight after a while. In the same way, one should always be humble in his/her behavior.
Forbearing / Tolerance tarorapi sahiṣhṇunā - A devotee must be more forgiving/tolerant than a tree that bears fruits. When someone throws a stone at the tree, it does not get angry but in return, gives us a fruit, is it not amazing! It replies to your anger with a sweet fruit for your benefit! Svayam na khādanti phalāni vṛikṣhāḥ. The tree itself does not eat the fruits. It feeds everybody.
Respect for others - A devotee should not be looking for praise or compliments, but rather have respect for others. A devotee should always give respect to others and should not desire respect in return.
In this way, one should lead a life filled with humility, tolerance and respect for others. A devotee should always chant, sing and remember God, His pastimes, His grace and virtues with affinity every moment.
Having respect for others without seeking any compliments, being humble and always forgiving, all of these virtues can be expressed in one word, Humility. It is the foundation of devotion. Devotion starts, stays, and develops only on the basis of humbleness. Any touch of pride and ego spoils it, just like a pinch of salt spoils a cake. Pride or ego is an obstacle in devotion. Humbleness of a devotee develops dedication to his master and dependence on God's Grace.

Saturday, October 8, 2011

वेदव्यास कहते है कि जितनी आराधनाएँ हैं, उपासनाएँ हैं- तामसी, उससे ऊंची राजसी, उससे ऊंची सात्विकी देवताओं की भक्ति, उससे ऊंची ब्रह्म की भक्ति, उससे ऊंची परमात्मा की भक्ति ,परमात्मा की भक्ति से ऊंची भगवान की और उनके अवतारों की भक्ति, और सबसे ऊंची भक्ति श्री राधाकृष्ण की, लेकिन श्री राधाकृष्ण की भक्ति से भी ऊंची है-उनके भक्तों की भक्ति।
भगवान के भक्तों की भक्ति से भगवान जितनी शीघ्रता से संतुष्ट होते हैं,अपनी भक्ति से नहीं।



वास्तविक महापुरुष के सान्निध्य में संसार से सहज वैराग्य एवं भगवान में सहज अनुराग बढ्ने लगता है। तत्वज्ञान परिपक्व होने लगता है। जीव अवश्य महसूस करने लगता है कि वो कल्पना भी नहीं कर सकता था की भगवदविषय में कभी इतना मन लगने लगेगा, इतना समय वो दे पाएगा।






हम साधकों को सदा यही समझना चाहिए कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है, वह गुरु एवं भगवान की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध घोर संसारी, घोर निकृष्ट, गंदे आइडियास वाले बिलकुल गंदगी से भरे पड़े हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये, भगवान के लिए एक आँसू निकल जाय, महापुरुष के लिए, एक नाम निकल जाये मुख से, अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी यह सब उनकी ही कृपा से हुआ ऐसा ही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धान्त न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवर्ति ही क्यों होती, कभी यह न सोचो की हमारा कमाल है, अन्यथा अहंकार पैदा होगा , अहंकार आया की दीनता गयी, दीनता गयी तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जाएंगे एक सेकंड में इसलिए कोई भी भगवत संबंधी कार्य हो जाये तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है, उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता, उसने हमको न समझाया होता ,उसने अपना प्यार दुलार न दिया होता, आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर कि और प्रव्रत्त ही न होतें। अत: उन्ही की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहें है ऐसा सदा मान के चलो।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
एक कल गया,एक आज जा रहा है और एक उसको लेकर जा रहा है शमशान घाट तक, राम नाम सत्य है और फिर भूल गया लौटते समय कि संसार सत्य है और प्लानिंग कर रहा है करोड़पति बनने की ये सबसे बड़ा आश्चर्य है कि बचे हुए लोग अपने लिये नहीं सोचते कि हम भी किसी भी क्षण जा सकते हैं। अपराध से बचें,हरि-गुरु का चिंतन करें। लापरवाही छोड़े।
राम नाम सब सत्य कह,जब लौं जात मसान।
लौटत ही पुनि जगत केंह,सत्य मान धनि ज्ञान।।

--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.


रावण ने लक्ष्मण को उपदेश दिया था कि देखो लक्ष्मण! में ब्राह्मण हूँ, चारों वेदों का विदवान हूँ और भगवान के लोक का पार्षद रहा हूँ। मेरा उपदेश नोट करो कि भगवद विषय का काम तुरंत करो संसार के काम को नंबर दो कर दो। नहीं तो उधार करते करते अनंत जन्म बीते हैं आगे भी अनंत जन्म बीतेंगे। कल-कल मत करो। क्या पता काल कल को आने ही न दे।





तन का भरोसा नहीं गोविन्द राधे।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे।।

कालि से भजूँगा जनि गोविन्द राधे।
कहु जाने काल कब टिकिट कटा दे।।
...
कालि का उधार तजु गोविन्द राधे।
जाने कब काल लाल झंडी दिखा दे।।

इस तन का भरोसा करके और हम आराम से संसार में भाग रहें हैं। बड़े-बड़े प्लान बनाते हैं, पंचवर्षीय, दसवर्षीय, पचासवर्षीय, इन्शुरेंस कराते हैं। अभी हम 20 साल के हैं, 25 साल का इन्शुरेंस करा लों, और अंदर ही अंदर डरते भी जाते हैं। लेकिन गलत काम, चोरी, नहीं छोड़ते। सही काम छोड़ देते हैं। भगवान की भक्ति करना है और ईधर रुपया मिलेगा। आज कौन सा काम करोगे? रुपए वाला। क्यों? अजी उसमें आनंद है। भगवान में आनंद है यह बात तुम नहीं मानते। मानते तो हैं। क्या मानते हो? अगर सचमुच मानते तो भगवान के कार्य को महत्व देते, उसको तुरंत करते।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

दयामय ! अब तो दया करो |
बानि अकारन-करुन जानि निज, अवगुन चित न धरो |
हम अयान मन-बुधि-अतीत पुनि, तुम अरु जन तुम्हरो |
याते संतन कह्यो न मानत, उर अभिमान खरो |
सुन्यो कान अभिमान अशन तव, पुनि काहे जु डरो |
... देहु ‘कृपालुहिं’ चरण कमल रति, जात त्रिताप जरो ||

भावार्थ- हे दयामय ! अब तो मेरे ऊपर कृपा कीजिए आपका विरद है कि मैं बिना कारण ही कृपा करता हूँ | हमारे अवगुणों को अपने हृदय में न रखिये | हम अबोध हैं किन्तु तुम एवं तुम्हारे जन दोनों ही मन-बुद्धि से परे हैं, इसी से हम सन्तों की कही हुई बातों को भी नहीं मान पाते | हम इनको पहचानने में भी तो असमर्थ हैं | हृदय में अत्यन्त अभिमान होने के कारण हम महापुरुषों का भी अपमान कर देते हैं | रसिकों के मुख से सुना है कि अभिमान तुम्हारा भोजन है | यदि यह सच है तो फिर मेरे अभिमान से क्यों डर रहे हो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैं अब तीनों प्रकार के तापों में अत्यन्त जला जा रहा हूँ , अतएव मुझे अपने चरण-कमलों का प्रेम देकर कृतार्थ कीजिये |


(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

Friday, October 7, 2011

"ठाकुर युगल किशोर हमारों, चाकर हम पिय प्यारी के।
गुरु सेवा ही धर्म हमारों, दास न हम श्रुतिचारी के"।।

संयोग और वियोग में 'वियोग' बड़ा है। संयोग में प्रियतम एक ही स्थान पर दिखाई देता है, लैकिन वियोग में त्रिभुवन में दिखाई देता है।
------श्री महाराजजी.



गुरुवर से मिलने का 'वृन्दावन' इक बहाना है, गुरुवर की शरण बिना ,फीका सारा जमाना है।
वृन्दावन की गलियों में, वृन्दावन के धामों में,"श्यामा-श्याम धाम" ही मेरा अपना ठिकाना है।
तुमने कहा 'खोटा' खरों में ही चल पायेगा, खरे-खरे छांट लिये, खोटे को भी चलना है।
सुबह का भूला हूँ, शाम घर पहुँचा हूँ, जिंदगी 'अमावस' है, इसे 'पूनम' बनाना है।
कितने प्यारे-प्यारे हो, आँखों के तारे हो, गुरुवर जैसा कोई नहीं, देखा सारा जमाना है।
जहाँ-जहाँ जाते हो, 'रस' बरसाते हो, 'गोविंद' बने 'गुरुवर', 'प्रेमरस' का ख़जाना है।
पतित ने दी अरजी, आगे अब तुम्हारी मरजी, तुम हो 'पतितपावन' अपना रिश्ता पुराना है।



बिना महापुरुष की शरणागति के और बिना महापुरुष की कृपा के भगवतप्राप्ति असंभव है।


साधक के जीवन में मुख्य चीज एट्मस्फीयर( वातावरण) है। साधक कुछ प्रयत्न करता है, आगे बढ़ता है,फिर प्रयत्न में ढिलाई कर देता है। इससे व्यवधान आ जाता है,जिससे साधक आगे नहीं बढ़ पाता है। जिंदा तो वह रहता है पर आगे बढ्ने की शक्ति उपार्जित नहीं कर पाता। जैसे बीज़ पर पानी डाला और बंद कर दिया। जब सूखने लगा तो थोड़ा पानी फिर डाल दिया। इससे वह सूखा तो नहीं परंतु बढ़ा भी नहीं। अत: निरंतर और अटूट प्रयत्न की आवश्यकता है। उसी की महत्व है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।



वेदव्यास कहते है कि जितनी आराधनाएँ हैं, उपासनाएँ हैं- तामसी, उससे ऊंची राजसी, उससे ऊंची सात्विकी देवताओं की भक्ति, उससे ऊंची ब्रह्म की भक्ति, उससे ऊंची परमात्मा की भक्ति ,परमात्मा की भक्ति से ऊंची भगवान की और उनके अवतारों की भक्ति, और सबसे ऊंची भक्ति श्री राधाकृष्ण की, लेकिन श्री राधाकृष्ण की भक्ति से भी ऊंची है-उनके भक्तों की भक्ति।
भगवान के भक्तों की भक्ति से भगवान जितनी शीघ्रता से संतुष्ट होते हैं,अपनी भक्ति से नहीं।









मालिक तेरी रजा रहे, और तू ही तू रहे।
बाकी न 'मैं' रहूँ न मेरी 'आरजू' रहे।।


किसी व्यक्ति को तत्वज्ञान हो जाना और भगवतरूचि बने रहना, प्रभु को पाने की छटपटाहट बनी रहना,यह हजारों जन्मों के प्रयत्न से भी नहीं हो पाता। यही छटपटाहट भगवदप्राप्ति की जड़ है। यह वह चिंगारी है जो भगवदप्रेम रूपी अग्नि को प्रज़्जव्लित करेगी। इसमे निरंतर व्याकुलतापूर्वक स्मरण का तृण पड़ता रहे तो चिंगारी से ज्वाला निकले।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।



वास्तविक महापुरुष से मिलन ही ईश्वर की अंतिम कृपा है। महापुरुष मिलन, ईश्वर मिलन का पक्का प्रमाण है।
--------श्री कृपालुजी महाप्रभु।



समस्त धर्मों का फल 'श्रीकृष्ण' भक्ति है। समस्त साधनाएँ एवं योग्यताएँ श्री कृष्ण भक्ति के बिना व्यर्थ है।
-------श्री महाराजजी.



अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से भगवतचर्चा करना कुसंग है।
------श्री महाराजजी.


संसार में न दुख है न सुख, वस्तुत: हमारी काल्पनिक मान्यता का परिणाम ही सुख एवं दुख है।
------श्री कृपालुजी महाप्रभु।



 अनन्यता माने क्या? " एक भरोसों एक बल, एक आस विश्वास"।







संसार में सभी चीजे सहीं हैं ,गलत कुछ भी नहीं हैं। आपको अपने लिये देखना है कि हमारे लिये अनुकूल क्या है।
------श्री महाराजजी.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...