Thursday, October 13, 2011



कबीर जी कहते हैं:- तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।

यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये। इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं, ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर पहुँच नहीं...
सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल पर पहुँचोगे।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।
गुरु का एक ही अर्थ है, जो तुम्हारी नींद तोड़ दे। और नींद का टूटना हमेशा दु:खद है। जो भी तुम्हारी नींद तोड़ेगा, उसपर तुम नाराज़ होओगे, क्योंकि वह तुम्हें बेचैनी में डाल रहा है। इसलिए गुरु शुरु में तो कष्टदायी मालूम पड़ता है, दु:खदायी मालूम पड़ता है, परंतु बाद में परम सुखदायी है।



एक सद्गुरु जो जागा हुआ है, वह सोये हुए को हिला सकता है, जागा सकता है, हालाकि तुम सद्गुरु को भी धोखा दे जाते हो। उससे कहते हो, बस! उठता हूँ। करवट लेकर, आँखें बंद करके, फिर सो जाते हो। अकेले तो तुम्हारा जागना करीब-करीब असंभव है।

Tuesday, October 11, 2011

साधक का प्रश्न: 'महाराजजी' आप कहते है कि, मानव शरीर के पश्चात मानवेतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है। क्या कोई ऐसी स्थिति है जब किसी के बारे में यह कहा जा सके कि इस जन्म में उसे मानव देह मिलेगी?

श्री महाराजजी: जिस व्यक्ति का चिंतन आधे से अधिक समय में भगवदीय हो जायेगा। उसके बारे में यह निश्चित है कि अगला जन्म उसको 'मनुष्य' का ही मिलेगा।




एक अन्य साधक का प्रश्न: हम आश्रम के लिए दान द्वारा धनार्जन कि सेवा करते हैं। उसी से संबंधित विचार आते रहते हैं। भगवान का रूपध्यान नहीं होता, हमारी क्या गति होगी?

श्री महाराजजी: वह चिंतन भी, उसी लक्ष्य से संबंधित होने के कारण,साधना ही है। सेवा ही साधना है, और सेवा ही सिद्धि। सेवा के द्वारा अंत:करण की शुद्धि होती है। अत: साधना है। अंत:करण की शुद्धि के बाद भगवदप्राप्ति पर गोलोक में जो सेवा प्राप्त होती है, वही सिद्धि है।

Monday, October 10, 2011




धरो मन ! गौर-चरन को ध्यान |
जिन चरनन को राखत निज उर, सुंदर श्याम सुजान |
भटकट कोटि कल्प तोहिँ बीते, खायो सिर पदत्रान |
चार प्रकार लक्ष चौरासी, द्वार फिरयो जनु स्वान |
चरण-शरण कबहूँ नहिं आयो, अबहूँ करत न कान |
... येहि दरबार दीन को आदर, पतितन को सनमान |
पुनि ‘कृपालु’ तुम कत चूकत मन, पंडित बनत महान ||

भावार्थ- अरे मन ! कीर्ति-कुँवरी राधिका जी के चरणों का निरन्तर ध्यान किया कर, जिन चरणों का ध्यान सच्चिदानंद श्रीकृष्ण भी करते हैं | अरे मन ! तुझे भटकते हुए अनन्त जन्म बीत चुके, एवं तूने उन विषयों के अनन्त बार जूते खाये | स्वेदज, अंडज, उद् भिज, जरायुज इन चार प्रकार की उत्पति के द्वारा कुते की तरह तूने चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाया है, किन्तु किशोरी जी के चरण-कमलों की शरण कभी नहीं ली | आज भी मेरी बात नहीं मान रहा है | अरे मन ! किशोरी जी के दरबार में पतितों एवं दीनों को ही सम्मान मिलता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! तुम बहुत बड़े पंडित बनते हो फिर ऐसा अवसर क्यों खो रहे हो, अर्थात् किशोरी जी के चरणों की शरण क्यों नहीं लेते ?

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.


करो जनि मन ! मनमानी काम |
विषयन हाथ अनादि-काल ते, बिके रहे बिनु दाम |
आयो लखि, दुख लख-चौरासी, पायो नहिं विश्राम |
अंधहुँ लगे ठेह बारेक, पग, धरत सोचि तेहि ठाम |
पै तू अंध जात हठि तेहि मग, अधाधुंध अविराम |
... जो ‘कृपालु’ बीती बीती अब, सुमिरिय श्यामा-श्याम ||

भावार्थ- अरे मन ! मूर्खतावश मनमाना कार्य मत कर | देख तू अनादि काल से अकारण ही सांसारिक विषय वासनाओं का दास बना रहा तथा चौरासी लाख योनियों के अनन्त दुखों का भी अनुभव करके देख लिया कि कहीं भी सुख और शांति नहीं है | अरे मन ! अन्धे को भी जब एक बार ठोकर लग जाती है तब वह उस जगह बड़ी सावधानी के साथ पैर रखता है, पर तू ऐसा मूर्ख अन्धा है कि हठवश निरन्तर बड़ी तेजी के साथ उसी मार्ग में चलता है | इस प्रकार अनन्त बार ठोकरें खाकर भी सांसारिक विषयों से विरक्त नहीं होता | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जो कुछ अब तक हुआ उसे भूल जा, एवं अब भी श्यामा-श्याम की शरण होकर उनका निरन्तर स्मरण कर |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.



WHO ARE YOU!


Innumerable Salutations to YOU!
Countless Obeisances to YOU.
... My sweet MASTER! the ocean of LOVE!
Master of sweetness!
A perennial source of JOY!
No one knows WHO ARE YOU!

Scholars accept YOU as the 5th JAGADGURU,
Supreme Amongst All,
Artist hail YOU,The Greatest Artist'.
Musicians try to imitate the Way.YOU sing,but fail,
When YOU sing,stone heart melts,
Dry hearts feel a new joy,a new thrill,
Poets marvel,'A SUPER HUMAN SKILL'.
New poetry springs out,
Within no time with no effort,
The poor adore YOU,'OUR BEST FRIEND'.
The sinners(like sharad ie.'me') finds a new hope for their redemption.

Devotees proclaim in ecstasy,
"AN INCARNATION OF DEVOTION"
And "PERSONIFICATION OF LOVE"
BUT NO ONE KNOWS TILL DATE THAT "WHO ARE YOU".
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Shri Maharaj Ji is, truly, a form of divine love. His natural scholarliness inspires trust in even the greatest intellectuals, and his love, grace and compassion melt the heart and inspire devotional love.

His satsang is divinely exhilarating and unbelievably joy-giving. Every association with him is like being in the company of your dearest friend who is urging you every moment both from within ...and without to go closer, closer, closer to God.

Because words are still a weak substitute for direct interaction, we will be including enough material on this site so you can have as close an experience of Shri Maharaj Ji short of visiting him in India.

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj is affectionately called "Shri Maharaj Ji" by his disciples.

He is only the fifth Divine personality in the last 2500 years, and the first in the last 700 years, to be honored with the highest place among all Saints and scholars of this age by being given the title of Jagadguru, meaning Spiritual Master for the whole world. This title is only given to that Saint who inspires a spiritual revolution in the world through his Divine teachings.

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj is currently 90 years of age, and is still actively teaching the philosophy of bhakti yoga, the path of Divine love, to thousands of devoted souls throughout the world.

His spiritual status and personality are beyond the comprehension of a material mind. That Divinity can't be intellectually understood, but it can be experienced.

Shri Maharaj Ji belongs to the special class of enlightened Masters called Rasik Saints. The personality of a Rasik Saint relates to the most intimate, loving aspect of God, Radha Krishna.

Through this bhakti tradition, all formalities of worship dissolve into love. Through his affectionate and caring personality, his brilliant philosophical lectures, his soul-stirring kirtan, the facilities he provides through his ashrams, his trained teachers who he has sent throughout the world, and above all his Divine nature, Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj is bringing spiritual knowledge and understanding to thousands of people in India and around the world.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...