Tuesday, October 18, 2011



सखी ! इन नैनन कहा करूँ? |
इन नैनन की लरिकैयन के, कारण आह भरूँ |
इन निगुरिन उर आग लगाई, हौं दिन रैन जरूँ |
इन ने तो निज नात जोरि लइ, हौं भल भाल परूँ |
कछु तो मोहिं समुझाउ श्याम बिनु, केहि विधि धीर धरूँ |
... अब ‘कृपालु’ अस दशा भई मम, ना जीऊँ न मरूँ ||

भावार्थ- एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी ! मैं इन आँखों का क्या करूँ | इनके लड़कपन के कारण रात-दिन मैं आहें भरा करती हूँ | इन निगुरियों ने हमारे हृदय में आग लगा दी | मैं बिना अपराध के ही जल रही हूँ | इन्होंने तो अपना नाता श्यामसुन्दर से स्थापित कर लिया, मैं भले ही भाड़ में पड़ूँ | अरी सखी ! मुझे कुछ तो समझा, मैं किस प्रकार धीरज धारण करूँ | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मेरी दशा तो ऐसी हो गयी है कि न जीवित रहते बनता है और न मरते ही बनता है |

(प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
श्यामा श्याम की प्राप्ति गुरु द्वारा ही होगी। अतएव गुरु की शरणागति निरंतर बनी रहे, तदर्थ निरंतर अनुकूल भाव से ही अनुसरण करना है तथा सदा यही सोचना है कि वे ही हमारे हैं। शेष सभी सफर के यात्री मिलन के समान हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


हरि-गुरु चिन्तन साधना, साध्य प्रेम निष्काम।
दिव्य दरस की प्यास नित, बाढ़े आठों याम।।
-----श्री महाराजजी।





चिन्तन में ही सारी शक्ति है। चिंतन से ही कोई जीव अपने आपको ऊपर उठा सकता है और चाहे तो नीचे भी गिरा सकता है।
------जगद्गुरु श्रीकृपालुजी महाराज।




सारा खेल मन के चिंतन और बुद्धि के decision पर है। वह जो चाहे बन सकता है- देव, दानव, या महापुरुष।
-------श्री महाराजजी।



अपना जीवन अपना न मानो, अपने शरण्य का ही मानो। सदा यही सोचो कि उनकी सेवा में ही क्षण-क्षण व्यतीत हो।
------श्री महाराजजी।



अपराध करने वाले का सबसे बड़ा अपराध है, भगवान या गुरु के प्रति ये सोचना कि उससे छिप कर मैं अपराध कर सकता हूँ। अगर किसी प्रकार से गुरु को पता भी पड़ गया तो फिर यह सोचना और भी अहितकर है कि किसी ने इनको बता दिया होगा।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

Monday, October 17, 2011

लोग अपने ही गुरु के सामने कहते हैं महाराजजी! आप तो अंतर्यामी है। अच्छा, मैं अंतर्यामी हूँ! और बोल जाते हैं झूठ। गुरु मन में कितना दुखी होता होगा ये सुन के कि देखो ये मुँह से बोलता है आप अंतर्यामी हैं और हमहीं से झूठ बोल रहा है, कपट की बात कर रहा है।
-----श्री महाराजजी।



रूपध्यान ही साधना है, उपासना है, भक्ति है।
-----श्री महाराजजी।
मानवदेह देव दुर्लभ है। अत: अमूल्य है। इसी देह में साधना हो सकती है। अत: उधार नहीं करना है। तत्काल साधना में जुट जाना है। निराशा को पास नहीं फटकने देना है। मन को सद्गुरु एवं शास्त्रों के आदेशानुसार ही चलाना है। अभ्यास एवं वैराग्य ही एकमात्र उपाय है। सदा यही विश्वास बढ़ाना है कि वे अवश्य मिलेंगे। उनकी सेवा अवश्य मिलेंगी।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


सब साधन जनु देह सम, रूपध्यान जनु प्राण।
खात गीध अरु स्वान जनु ,कामादिक शव मान।।

श्री कृष्ण प्राप्ति की समस्त साधनाएँ (यम,नियम,कर्म,योग,ज्ञान,व्रतादि) प्राणहीन शव के समान हैं। यदि रूपध्यान रहित हैं। वेद से लेकर रामायण तक सभी ग्रंथ एक स्वर से कहते हैं कि भगवान का ध्यान करना चाहिए।

------(भक्ति-शतक), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।






मन की निर्मलता की कसौटी है- भगवत विषय में मन का लगाव। यह कसौटी क्ष्रेष्ठ है। ईश्वरीय तत्त्व को पाने के लिये हमारे मन में कितनी छटपटाहट है।यही मन की निर्मलता की सबसे बड़ी कसौटी है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


सुनो मन ! यह वेदन को सार |
कहत ‘ रसो वै स: ’ यह वेदन, या पर करिय विचार |
रसिक शिरोमणि ब्रह्म श्याम बिनु, रस न पाउ संसार |
‘उपासते पुरुषं’ येहि श्रुति को, इहै अर्थ उर धार |
सकल कामनाहीन दीन बनि, भजिये नंदकुमार |
...
तब ‘कृपालु’ तुम पाव प्रेम रस, बस गोलोक मझार ||

भावार्थ- अरे मन ! सब वेदों का यही निष्कर्ष है | वेद में जो ‘रसो वै स:’ कहा गया है, इस पर गम्भीर विचार कर | इसका भाव यही है कि रसिक शिरोमणि ब्रह्म श्यामसुन्दर के बिना संसार में कहीं भी वास्तविक सुख नहीं है | ‘ उपासते पुरुषम् ’ इस श्रुति का भी यही अर्थ है कि समस्त कामनाओं से रहित होकर नंद कुमार का भजन करो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तभी उनकी कृपा से तू प्रेम रस पा सकेगा एवं पश्चात् सदा के लिये गोलोक में निवास करेगा |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

Sunday, October 16, 2011



अहो हरि ! कहौं कौन पै जाय |
सुनत पुरानन कान स्वर्ग कहुँ, जहँ वैभव बहुताय |
पै तहँ वेद विधान कठिन पुनि, छीन पुन्य जग आय |
पुत्र कलत्र मित्र स्वारथ रत, पुनि रंकन को राय |
हौं अज्ञानी, मुक्ति ज्ञान ते, पुनि मोहिं सो न सुहाय |
...
तुम ही सों ‘कृपालु’ हौं कहिहौं, औरन कहे बलाय ||

भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारे सिवाय और कौन है जो हमारी दीन पुकार सुन सकेगा ? शास्त्रों-वेदों के द्वारा सुनते हैं कि स्वर्ग में महान् वैभव है, किन्तु तन्निमित कर्मों में बड़े-बड़े विधानों की अपेक्षा है, फिर पुण्य-क्षीण होने पर कूकर-शूकर आदि योनियों में जाना पड़ता है | स्त्री, पुत्र, मित्रादि घोर-स्वार्थी हैं और फिर स्वयं भिक्षुक हैं | सुनते हैं ज्ञान से मुक्ति हो जाती है, किन्तु हम तो अज्ञानी हैं, और फिर मुझे स्वप्न में भी मुक्ति अच्छी नहीं लगती | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – हम तो तुम्हारे द्वार पर धरना दिये बैठे हैं, केवल तुम्हीं से अनन्त-काल तक माँगने का निश्चय कर रखा है | अन्य लोगों से, वे चाहे स्वर्गीय देवता ही क्यों न हों, मैं भूलकर भी नहीं माँग सकता |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...