Saturday, October 22, 2011

तृष्णा की नदी गहरी है, शरीर रूपी नाव जीर्ण है, अतएव बिना कुशल नाविक सद्गुरु के तुम भवसागर से कैसे पार उतरोगे। सद्गुरु की शरण ही संसार -सागर से बचाने वाली है।

हरि-गुरु को सदा अपने साथ महसूस करो। यानि कभी अपने आप को अकेला मत समझो। जब कभी मक्कारी का विचार पैदा हो, तुरंत यह सोचो कि वे देख रहे हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


सद्गुरु के पास किसी को इंकार नहीं है। जो डूबने को राजी है सद्गुरु उसे लेने को तैयार है। वह शर्ते नहीं रखता। वह पात्रताओं के जाल खडे नहीं करता। अपात्र को पात्र बना ले, वही तो सद्गुरु है। अयोग्य को योग्य बना ले वही तो सद्गुरु है। संसारी को सन्यासी बना ले, वही तो सद्गुरु है।

सदा गुरु की आज्ञा ही मानो सब आज्ञा काट के। ईश्वरीय जगत में हर काम मनसा(मन का) से ही नोट होता है, work देखा ही नहीं जाता। हमारा idea जहाँ आया वहाँ गड़बड़ हुआ।

संसारी वस्तु का त्याग वास्तविक त्याग नहीं है, वरन मन की आसक्ति का त्याग ही त्याग है।
-------श्री महाराजजी।


जो भगवान के शरणागत होने का अभ्यास करता है अर्थात मन को जगत से हटाकर श्रीकृष्ण में ही सर्वदा लगाने का अभ्यास करता है, वह सतसंपर्दायवादी है। और ठीक इसके विपरीत जो मायिक जगत में सुख मानते हुए तदर्थ प्रयत्नशील है, वह माया के संपर्दाय वाला है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।









सारा खेल मन के चिंतन और बुद्धि के decision पर है। वह जो चाहे बन सकता है- देव, दानव, या महापुरुष।
-------श्री महाराजजी।




लख्यो जग इक अचरज की बात |
बरसत बूँद पकरि नभ चढ़ि चह, जो मन बुधि न समात |
विधि हरि हर जेहि जानि न पावत, प्रभु प्रभुता विख्यात |
बिनु जाने प्रतीति नहिं तेहि बिनु, प्रीति न कतहुँ लखात |
बिना प्रीति नहिं द्रवत पिया, यह, सोच जिया अकुलात |
...
यह ‘कृपालु’ तो पिय-मग जोहत, खर् यो रहत दिन रात ||

भावार्थ- संसार की एक आश्चर्य की बात सुनो | बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़कर जीव आकाश में चढ़ना चाहता है, जो कि मन-बुद्धि से परे का विषय है | यह सर्वसिद्ध विषय है कि भगवान् के रहस्यों को ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी बुद्धि के बल से नहीं समझ सकते | बिना समझे विश्वास दृढ़ नहीं होता एवं बिना विश्वास के दृढ़ हुए प्रेम भी नहीं हो सकता और बिना बिना प्रेम के प्रियतम पिघलते भी नहीं | यह सब सोचकर हृदय अत्यन्त व्याकुल हो जाता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैं तो एकमात्र निरन्तर प्रियतम श्री कृष्ण की कृपा की बाट जोह रहा हूँ |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.




हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?


भक्ति रूपी महल दीनता पर ही खड़ा है। जिसे विशेष लाभ प्राप्त करना है उसे दीनता लानी होगी।
-------श्री महाराजजी।



हमारे श्री महाराजजी कलिमल ग्रसित अधम जीवों को भी सचमुच बरबस ब्रजरस में सराबोर करना चाहते हैं। उनके श्रीमुख से नि:सृत संकीर्तन ब्रज रस ही है, पीने वाला होना चाहिये। श्री महाराजजी की रचनाओं में निहित रस का रसास्वादन तो कोई रसिक ही कर सकता है, फिर भी हम जैसे पतित जीव भी इतना तो महसूस करते ही हैं कि ऐसा रस कभी नहीं मिला।

****बोलिये रसिक-शिरोमणि भगवान श्री कृपालुजी महाराज की जय..........................

Tuesday, October 18, 2011



सखी ! इन नैनन कहा करूँ? |
इन नैनन की लरिकैयन के, कारण आह भरूँ |
इन निगुरिन उर आग लगाई, हौं दिन रैन जरूँ |
इन ने तो निज नात जोरि लइ, हौं भल भाल परूँ |
कछु तो मोहिं समुझाउ श्याम बिनु, केहि विधि धीर धरूँ |
... अब ‘कृपालु’ अस दशा भई मम, ना जीऊँ न मरूँ ||

भावार्थ- एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी ! मैं इन आँखों का क्या करूँ | इनके लड़कपन के कारण रात-दिन मैं आहें भरा करती हूँ | इन निगुरियों ने हमारे हृदय में आग लगा दी | मैं बिना अपराध के ही जल रही हूँ | इन्होंने तो अपना नाता श्यामसुन्दर से स्थापित कर लिया, मैं भले ही भाड़ में पड़ूँ | अरी सखी ! मुझे कुछ तो समझा, मैं किस प्रकार धीरज धारण करूँ | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मेरी दशा तो ऐसी हो गयी है कि न जीवित रहते बनता है और न मरते ही बनता है |

(प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
श्यामा श्याम की प्राप्ति गुरु द्वारा ही होगी। अतएव गुरु की शरणागति निरंतर बनी रहे, तदर्थ निरंतर अनुकूल भाव से ही अनुसरण करना है तथा सदा यही सोचना है कि वे ही हमारे हैं। शेष सभी सफर के यात्री मिलन के समान हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


हरि-गुरु चिन्तन साधना, साध्य प्रेम निष्काम।
दिव्य दरस की प्यास नित, बाढ़े आठों याम।।
-----श्री महाराजजी।





चिन्तन में ही सारी शक्ति है। चिंतन से ही कोई जीव अपने आपको ऊपर उठा सकता है और चाहे तो नीचे भी गिरा सकता है।
------जगद्गुरु श्रीकृपालुजी महाराज।




सारा खेल मन के चिंतन और बुद्धि के decision पर है। वह जो चाहे बन सकता है- देव, दानव, या महापुरुष।
-------श्री महाराजजी।



अपना जीवन अपना न मानो, अपने शरण्य का ही मानो। सदा यही सोचो कि उनकी सेवा में ही क्षण-क्षण व्यतीत हो।
------श्री महाराजजी।



अपराध करने वाले का सबसे बड़ा अपराध है, भगवान या गुरु के प्रति ये सोचना कि उससे छिप कर मैं अपराध कर सकता हूँ। अगर किसी प्रकार से गुरु को पता भी पड़ गया तो फिर यह सोचना और भी अहितकर है कि किसी ने इनको बता दिया होगा।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

Monday, October 17, 2011

लोग अपने ही गुरु के सामने कहते हैं महाराजजी! आप तो अंतर्यामी है। अच्छा, मैं अंतर्यामी हूँ! और बोल जाते हैं झूठ। गुरु मन में कितना दुखी होता होगा ये सुन के कि देखो ये मुँह से बोलता है आप अंतर्यामी हैं और हमहीं से झूठ बोल रहा है, कपट की बात कर रहा है।
-----श्री महाराजजी।



रूपध्यान ही साधना है, उपासना है, भक्ति है।
-----श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...