Saturday, October 29, 2011

साधक को भगवान से विमुख करने वाला सबसे महान शत्रु कुसंग ही है। साधक को इसलिये साधना से भी अधिक दृष्टिकोण कुसंग से बचने पर रखना चाहिये। भगवननाम संकीर्तन रूपी औषधि के साथ-साथ कुसंग रूपी कुपथ्य से परहेज भी करते रहें तो रोग ठीक हो जायेगा और हम अपने परमचरम लक्ष्य तक पहुँच पायेंगे।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।




हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?
‎'मनुष्य का शरीर' 'श्रद्धा' और 'महापुरुष की प्राप्ति' इन तीन चीजों का मिलना अत्यंत दुर्लभ है।
'मनुष्य शरीर' और 'महापुरुष' मिल भी जाये तो तीसरी चीज 'श्रद्धा' मिलना अत्यधिक दुर्लभ है। अनादिकाल से इसी में गड़बड़ी हुई है। अनंत संत हमें मिलें लेकिन हमारी उनके प्रति श्रद्धा नहीं हुई इसलिए हमारा लक्ष्य हमें प्राप्त नहीं हुआ।
पहले श्रद्धा, उसके बाद साधु संग, फिर भक्ति करो - ये नियम है।

-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।





श्री महाराजजी से एक साधक का प्रश्न:- भजन किसे कहते हैं?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:- प्रेमास्पद की सेवा ही भजन है। सेवा तभी होती है जब प्रीति प्रबल हो, प्रीति तभी प्रबल होती है जब प्रेमास्पद में अपनत्व का भाव प्रबल होता है,अपनत्व के भाव की प्रबलता तभी समझी जाती है, जब अपने सुख की चिन्ता नहीं रहती, केवल प्रेमास्पद की सेवा का ही ध्यान रहता है। यही सच्ची साधना है।
मेरे गुरुवर मेरे गिरिधर प्यारे, दोउ एकहि हो न सपनेहु न्यारे।
हरि की कृपा ते मिले गुरुवर प्यारे, गुरु की कृपा ते मिले गिरिधर प्यारे।
गिरिधर तो हैं प्राण हमारे, गुरुवर मेरे प्राण पियारे।
गुरुवर आत्मा गिरिधर प्यारे, गिरिधर आत्मा गुरुवर प्यारे।
गुरुवर कह भज गिरिधर प्यारे, गिरिधर कह भज गुरुवर प्यारे।
गुरुवर कह बड़ गिरिधर प्यारे, गिरिधर कह बड़ गुरुवर प्यारे।
निर्मल मन चह गिरिधर प्यारे, निर्मल मन कर गुरुवर प्यारे।
गुरुवर गिरिधर सँग भजु प्यारे, या गुरुवर को हि भज प्यारे।
मम गुरुवर मम गिरिधर प्यारे, तुम दोउ रहु नित हृदय हमारे।

Thursday, October 27, 2011





पकरि गयो चोरत माखनचोर |
सूने घर घुसि खात रहे दुरि, नवनि चोर-सिरमोर |
पाछे ते गोपी ने औचक, पकर् यो कर बरजोर |
ल्याईं बाँधि मातु यशुमति ढिग, दियो उरहनो घोर |
हरि कह ‘पद्मराग-मणि-कंकण, तपत पाणि रह मोर |
...
याही ते ‘कृपालु’ हौं मैया !, दिय मटुकिहिं कर बोर’ ||

भावार्थ- माखनचोर चोरी करते हुए पकड़े गये | चोरों के सरदार श्यामसुन्दर एक गोपी के सूने घर में घुस कर मक्खन खा रहे थे, पीछे से उस गोपी ने उनके दोनों हाथ जबर्दस्ती पकड़ लिये एवं बाँधकर मैया यशोदा के पास ले आयी तथा घोर उलाहना दिया | तब श्यामसुन्दर ने यह बात बनायी कि मैया मैं चोरी नहीं कर रहा था वरन् पद्मराग मणि के कंकण से जलते हुए अपने हाथों को ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मक्खन की मटुकी में डुबा कर ठंडा कर रहा था |

(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.


तन का भरोसा नहीं गोविन्द राधे।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे।।

कालि से भजूँगा जनि गोविन्द राधे।
कहु जाने काल कब टिकिट कटा दे।।
...

कालि का उधार तजु गोविन्द राधे।
जाने कब काल लाल झंडी दिखा दे।।

इस तन का भरोसा करके और हम आराम से संसार में भाग रहें हैं। बड़े-बड़े प्लान बनाते हैं, पंचवर्षीय, दसवर्षीय, पचासवर्षीय, इन्शुरेंस कराते हैं। अभी हम 20 साल के हैं, 25 साल का इन्शुरेंस करा लों, और अंदर ही अंदर डरते भी जाते हैं। लेकिन गलत काम, चोरी, नहीं छोड़ते। सही काम छोड़ देते हैं। भगवान की भक्ति करना है और ईधर रुपया मिलेगा। आज कौन सा काम करोगे? रुपए वाला। क्यों? अजी उसमें आनंद है। भगवान में आनंद है यह बात तुम नहीं मानते। मानते तो हैं। क्या मानते हो? अगर सचमुच मानते तो भगवान के कार्य को महत्व देते, उसको तुरंत करते।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
निष्काम प्रेम से हमारा पतन नहीं हो सकता और हम निरंतर आगे बढ़ते जायेंगे। इसलिये संत लोग हमेशा आदेश देते हैं कि संत और भगवान से निष्काम प्रेम ही करो ताकि पतन न हो।
------श्री महाराजजी।




जिस वातावरण से तुमको नुकसान होने वाला है,उस वातावरण में तुम क्यों जाते हों। शास्त्रों में लिखा है- धधकते अंगारों के बीच लोहे के पिंजरे में प्राण त्याग देना अच्छा है, बजाय इसके कि गलत atmosphere में पहुँच जाना। भगवदप्राप्ति के एक सेकंड पहले तक पग पग पर खतरा है। शास्त्रों का ज्ञाता जितेंद्रिय धर्मात्मा अजामिल भी एक क्षण के कुसंग से पापियों की example बन गया। अनंत जन्मों का गलत अभ्यास है इसलिए बिगड़ना जल्दी हो जाता है और बनना देर में होता है। बिगड़ने की बहुत लंबी प्रैक्टिस है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
भगवान की सेवा से भगवान की कृपा मिलेगी, उनका प्यार मिलेगा, अंत:करण शुद्ध होगा और वो तुम्हारा योगक्षेम वहन करेंगे।
------श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...