Thursday, November 10, 2011

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के दिव्यतिदिव्य प्रवचन अब आप सभी "सहारा समय" राष्ट्रीय न्यूज़ channel पर भी 10 नवम्बर से प्रतिदिन प्रात:6:30 बजे से नियमित रूप से सुन सकते हैं।

ATTENTION DEAR FRIENDS: YOU MUST LISTEN TO JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ'S DIVINE LECTURES DAILY ON "SAHARA SAMAY" NATIONAL NEWS CHHANEL FROM 10TH NOVEMBER, 6.30.A.M. DONT MISS THE GOLDEN OPPURTUNITY.SO TUNE IN REGULARLY TO 'SAHARA SAMAY CHANNEL' SHARP 6.29 A.M.FROM TODAY.
OTHER PRAVACHAN TIMINGS ARE AS FOLLOWS:

SADHNA CHHANELL:7:10 A.M TO 7:40 A.M.
AASTHA CHHANEL: 6:20 P.M:TO 6:45 P.M.

Saturday, November 5, 2011




हमारे परमपूजनीय श्री महाराजजी (जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज) तो कृपा की मूर्ति ही हैं। यानि अंदर बाहर सर्वत्र कृपा ही कृपा है। यही उनका वास्तविक स्वरूप है। 'कृपालु' का अर्थ ही है कृपा लूटाने वाला। कोई दुर्भावना से आए सदभावना से उनके पास आये वे सब पर कृपा ही करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि गुरुवर का तन मन सब कृपा का ही बना हुआ है। सोते जागते उठते बैठते उनका एक ही काम है जीवों पर कृपा करना। उनका तन,मन सब कृपा ही कृपा का बना हुआ है, वे बिना कृपा किये रह ही नहीं सकते। लेकिन हम जिस दिन उन्हें सेंट-परसेंट 'कृपालु' मान लेंगे बस हमारा काम बन जायेगा।




अरे मन ! स्वारथ को संसार |
विकसित कुसुम सुवास लेत जिमि, मधुकर करि गुंजार |
जब ही कुसुम गिरत भूतल पर, भूलि न ताहि निहार |
त्यों जग पुत्र, कलत्र, मित्र, पति, जहँ लगि नातेदार |
बिनु स्वारथ कोउ बात करत नहिं, करु गंभीर विचार |
... ताते भजु ‘कृपालु’ अब निशिदिन, नागर नंद-कुमार ||

भावार्थ- अरे मन ! यह सारा संसार स्वार्थी है | जैसे खिले हुए फूल के ऊपर भँवरा गुंजार करता हुआ सुगंध लेता है | किन्तु जैसे ही फूल झड़कर गिर जाता है भँवरा उसकी ओर भूलकर भी नहीं देखता | उसी प्रकार पुत्र, स्त्री, पति, मित्र आदि जितने भी संसार के नातेदार हैं, उनका जब तक स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक ही नातेदारी निभाते हैं | गम्भीरतापूर्वक विचार कर | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इसलिए हे मन ! तू भी इन स्वार्थियों को छोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर का भजन कर |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.


अगति के गति तुम दीनदयाल !
जग सब बने बने के साथी, पति वनिता पितु बाल |
पै तुम कूबरि कहँ सुंदरि करि, किय निहाल तत्काल |
लै द्वै मूठि सुदामहिँ कन किय, दै द्वै लोक निहाल |
उन पाण्डव वनवासिन कहँ तुम, दियो साथ गोपाल |
... दिय ‘कृपालु’ गति-मातु पूतनहिँ, तुम सम कौन कृपाल ||

भावार्थ- हे दीनों पर दया करने वाले श्यामसुन्दर ! निराधार के तुम्हीं आधार हो | जगत् के माता, पिता, स्त्री, पति, बच्चे आदि सब तो बने-बने के ही साथी हैं, किन्तु तुमने तो कुबरी सरीखी कुरूपा स्त्री को भी सुन्दरी बना कर निहाल कर दिया | सुदामा के दो मुट्ठी तंदुल लेकर दो लोक दे दिये | वनवासी अकिंचन पाण्डवों का भी तुमने पूरा-पूरा साथ दिया | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कहाँ तक कहें ? विष पिलाने वाली पूतना राक्षसी को भी अपनी माता के समान गोलोक दान कर दिया | तुम्हारे समान कृपालु और कौन हो सकता है ?

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
भगवान और गुरु सर्वव्यापक हैं, हमारे क्षण-क्षण के विचारों को, चिंतन को नोट करते हैं, ये विश्वास हमें सदा अपने हृदय में बनाये रखना चाहिये।
------श्री महाराजजी।


सच्चा गुरु कभी संसारी वस्तु नहीं दिया करता। वास्तविक गुरु कभी सिद्धियों का चमत्कार नहीं दिखाते। वे कभी मिथ्या आशीर्वाद व श्राप भी नहीं देते।
-----श्री महाराजजी।



गुरु की शरण गहो जाय गुरुधामा।
हरि नाम गुण गावो बनो निष्कामा।।
आदेश पालन हो सदा गुरुधामा।
आदेश पालन ते मिलें श्याम श्यामा।।

------श्री महाराजजी।







भक्ति में अनन्यता परमावश्यक है। हमारे मन की आसक्ति 'भक्ति', 'भक्त', 'भगवान' के अतिरिक्त और कहीं नहीं होनी चाहिए।
------श्री कृपालु महाप्रभु।
जीव में जब तक देहाभिमान है, तब तक वह आसानी के साथ स्वयं अपने आपको कभी भी गिरा हुआ नहीं मानता। अतएव, नित्य होश में रहने वाले एक महापुरुष की आवश्यकता होती है जो उस बेहोश साधक की त्रुटियों को बता-बता कर उसे होश में लाता रहता है।

-------श्री महाराजजी।


सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना हरि-गुरु सेवा के नष्ट न होने पाये। अपने आपको अपने शरण्य की धरोहर मानकर उनकी नित्य सेवा करने में ही अपना भूरिभाग्य मानो।

------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।





हाथ पैर की सेवा करना कोई बहुत बड़ी सेवा नहीं है, संत जो कहता है उसके अनुसार चलना ,सबसे बड़ी सेवा है।
-------श्री महाराजजी।

Wednesday, November 2, 2011

अगर कोई हमको बुरा-भला भी कहता है तो सोचो कि उसने कौन सी नयी बात या गलत बात कह दी। भगवदप्राप्ति के पहले हममें सब अवगुण ही तो भरे पड़े हैं। फिर फ़ैक्ट को मानने में हमें बुरा क्यों लग रहा है।
------श्री महाराजजी।



क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो. पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो.
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।













स्वयं से पूछो 'तुमने कितने घंटे साधना करने में लगाये? B.a ,M.a,M.ed करने में तो 10 गुणा समय दिया-पेट के लिए। ईश्वरीय काम के लिए कितने घंटे दिये?' और चाहते हो पूरा लाभ मिल जाये। कोई नगर तुम्हारे घर से 100 मील दूर है, तो दस मील चलने के बाद तुम खड़े क्यों हो गए? अरे और आगे चलो, नगर मिलेगा। रोड ठीक है, माइलस्टोन भी मिल रहें हैं। लेकिन अगर आपको रोड़ पर डाउट हो गया ,तो 10 मील जाकर लौट आए। फिर 10 मील दक्षि...ण चले, फिर 10 मील उत्तर चले, फिर पश्चिम चले, इस प्रकार जीवन भर चलते जाओ, तो कभी भी लक्ष्य तक नहीं पहुचोंगे।
25 foot गड्ढा खोदा।निराश हो गया,"अजी यहाँ पानी नहीं है", और जगह खोदो। वहाँ भी 20 foot खोदा। यहाँ भी नहीं है। इस प्रकार करोड़ों foot खोदते जाओ। पानी नहीं निकलेगा। यदि लगातार एक जगह 50 foot और खोद डालते तो पानी निकल आया होता। अगर वास्तविक महापुरुष मिल जाये, तो कुछ भी असम्भव नहीं। अनन्त नगण्य जीव महापुरुष बने हैं। तुम क्यों नहीं बन सकते?

--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी भगवान।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...