Thursday, November 10, 2011

IGNORANCE,WORLDLY DESIRES AND GREED ARE THE CAUSES OF WRONG DOINGS.
WHEN CAUSE EXISTS,EFFECT IS BOUND TO HAPPEN.IN FACT,THERE IS NO ONE IN THE WORLD WHO IS NOT GUILTY OF COMMITTING SIN. A SINFUL HEART DEPRIVES A PERSON FROM REACHING KRISHN,AND VANITY FORBIDS A PERSON FROM ACCEPTING HIS SINS.
WHEN A PERSON SINCERELY ACCEPTS HIS OWN FAULTS AND SINS,HE BECOME HUMBLE.ONLY THEN HE BECOME A DEVOTEE,BECAUSE NOW HE HAS DEVELOPED A SIMPLE HEART INSTEAD OF CONCEITED ONE THAT CAN BE OFFERED TO KRISHN THROUGH DEVOTION AND REMEMBRANCE.

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.



UNNECESSARY GOSSIPING, FAULT FINDING IN OTHER DEVOTEES,AND ENTERING INTO CRITICISM,ARE COMMON WEAKNESSES OF A HUMAN MIND.A DEVOTEE MUST AVOID THEM.SUCH A HABIT MAY CAUSE SPIRITUAL TRANSGRESSIONS AND LEAD HIM INTO TROUBLE.

-------SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.



किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।










कृपा करु बरसाने वारी, तेरी कृपा का भरोसा भारी।
कोउ हो या न हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।।
SHRI MAHARAJJI SAYS:

PEOPLE RARELY ACCEPT THEIR FAULTS.PRIDE,VANITY,AND EGO DONOT ALLOW THEM TO BE HUMBLE.I HAVE SEEN PEOPLE SAYING, "O, I NEVER STEAL.I NEVER TELL A LIE.I NEVER SET MY EYES ON ANY OTHER WOMEN EXCEPT MY WIFE.I NEVER DO ANYTHING WRONG". WHETHER ONE HAS DONE ANYTHING WRONG OR NOT IS ONE THING,BUT SUCH EXPRESSIONS ARE PURE EXPOSITIONS OF SELF-CONCEIT AND VANITY.AND ARE A MAIN CAUSE OF SPIRITUAL TRANSGRESSIONS.

--------SHRI MAHARAJJI.



SOMEONE MIGHT WONDER HOW CONTINUING HUMBLENESS CAN WITHSTAND SURVIVAL IN THIS WORLD. WELL, YOU SHOULD KNOW THAT THERE IS A DIFFERENCE IN SHOWING HUMBLENESS AND IN BEING HUMBLE.
'CHAITANYA MAHAPRABHU' JI DID NOT SAY TO SHOW YOUR HUMBLENESS AROUND IN THE WORLD.HE SAID TO BE HUMBLE IN YOUR HEART AND MIND.HE MEANT HUMBLENESS AS AN INNER QUALITY FOR DEVOTIONAL PURPOSES.
MAINTAINING THIS VIRTUE,YOU SHOULD BEHAVE IN THE WORLD AS REQUIRED AND AS THE SITUATION PERMITS.YOU MAY REBUKE AND GROWL AT THE MISTAKE OF YOUR EMPLOYEE BUT STILL RETAIN YOUR INNER SELF CALM.



संसार के कार्य करते हुए भी बीच-बीच में बारंबार 'भगवान मेरे सामने हैं' इस प्रकार रूपध्यान द्वारा निश्चय करते रहना चाहिये। इससे दो लाभ हैं - एक तो रूपध्यान परिपक्व होगा, दूसरे हम, भगवान को अपने समक्ष, साक्षात रूप से महसूस करते हुए उच्छृंक्ल न हो सकेंगे, जिसके परिणाम स्वरूप अपराधों से बचे रहेंगे। जीव तो, किंचित भी स्वतंत्र हुआ कि बस, वह धारा-प्रवाह रूप से संसार की ही ओर भागने लगेगा।

------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।



लोकरंजन का लक्ष्य भी घोर कुसंग है। प्राय: साधक थोड़ा बहुत समझ लेने पर अथवा थोड़ा बहुत अनुभव कर लेने पर, उसे दुनिया के सामने गाता फिरता है,एवं धीरे धीरे यह अभिमान का रूप धारण कर लेता है,जिसके परिणाम-स्वरूप साधक की वास्तविक निधि ,दीनता छिन जाती है एवं हँसी-हँसी में लोकरंजन की बुद्धि परिपक्व हो जाती है। अतएव साधक को लोकरंजन रूपी महाव्याधि से बचना चाहिये।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।






श्री कृपालु महाप्रभु जी समझाते हैं कि:-
क्षमा माँगने के बाद पुन: अपराध न हो। हमने हृदय से अपराध को अपराध नहीं माना तभी तो क्षमा माँग लेने पर पुन: वही अपराध करते हैं।
WHEN A SOUL DESPERATELY CRIES FOR 'RADHARANI', SHE RUNS TO HIM WITHOUT EVEN CARING FOR HERSELF.WHEN A SOUL LOVINGLY CALLS 'RADHEY! 'RADHEY!' RADHARANI ALSO SHEDS TEARS OF LOVE FOR HIM.THE DEVOTEE FURTHER SAYS,"WHEN RADHA RANI HERSELF IS MY DIVINE GUARDIAN,WHY SHOULD I BE AFRAID OF ANYTHING IN THE WORLD."


SHREE MAHARAJJI SAYS:

THE PURPOSE OF LIFE IS TO RECEIVE THE SELFLESS DIVINE LOVE AND FOR THAT YOU HAVE TO FOLLOW THE DEVOTIONAL GUIDELINES AND DISMISS YOUR INTELLECTUAL IDEOLOGIES FROM YOUR MIND.






SHRI MAHARAJJI SAYS:

YOUR MIND IS THE DEVOTEE,NOT THE BODY,AND THAT MIND NEEDS PURIFICATION BECAUSE IT IS IMPURE.HOW COULD A MECHANICAL REPETITION OF THE NAME PURIFY THE MIND WHEN IT IS ENGAGED IN WORLDLY TALK AND ACTIVITIES? THIS IS THE REASON THAT THE HEARTS OF SUCH DOERS REMAIN DEVOID OF DEVOTIONAL FEELINGS AND TRUE ASPIRATION.
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के दिव्यतिदिव्य प्रवचन अब आप सभी "सहारा समय" राष्ट्रीय न्यूज़ channel पर भी 10 नवम्बर से प्रतिदिन प्रात:6:30 बजे से नियमित रूप से सुन सकते हैं।

ATTENTION DEAR FRIENDS: YOU MUST LISTEN TO JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ'S DIVINE LECTURES DAILY ON "SAHARA SAMAY" NATIONAL NEWS CHHANEL FROM 10TH NOVEMBER, 6.30.A.M. DONT MISS THE GOLDEN OPPURTUNITY.SO TUNE IN REGULARLY TO 'SAHARA SAMAY CHANNEL' SHARP 6.29 A.M.FROM TODAY.
OTHER PRAVACHAN TIMINGS ARE AS FOLLOWS:

SADHNA CHHANELL:7:10 A.M TO 7:40 A.M.
AASTHA CHHANEL: 6:20 P.M:TO 6:45 P.M.

Saturday, November 5, 2011




हमारे परमपूजनीय श्री महाराजजी (जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज) तो कृपा की मूर्ति ही हैं। यानि अंदर बाहर सर्वत्र कृपा ही कृपा है। यही उनका वास्तविक स्वरूप है। 'कृपालु' का अर्थ ही है कृपा लूटाने वाला। कोई दुर्भावना से आए सदभावना से उनके पास आये वे सब पर कृपा ही करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि गुरुवर का तन मन सब कृपा का ही बना हुआ है। सोते जागते उठते बैठते उनका एक ही काम है जीवों पर कृपा करना। उनका तन,मन सब कृपा ही कृपा का बना हुआ है, वे बिना कृपा किये रह ही नहीं सकते। लेकिन हम जिस दिन उन्हें सेंट-परसेंट 'कृपालु' मान लेंगे बस हमारा काम बन जायेगा।




अरे मन ! स्वारथ को संसार |
विकसित कुसुम सुवास लेत जिमि, मधुकर करि गुंजार |
जब ही कुसुम गिरत भूतल पर, भूलि न ताहि निहार |
त्यों जग पुत्र, कलत्र, मित्र, पति, जहँ लगि नातेदार |
बिनु स्वारथ कोउ बात करत नहिं, करु गंभीर विचार |
... ताते भजु ‘कृपालु’ अब निशिदिन, नागर नंद-कुमार ||

भावार्थ- अरे मन ! यह सारा संसार स्वार्थी है | जैसे खिले हुए फूल के ऊपर भँवरा गुंजार करता हुआ सुगंध लेता है | किन्तु जैसे ही फूल झड़कर गिर जाता है भँवरा उसकी ओर भूलकर भी नहीं देखता | उसी प्रकार पुत्र, स्त्री, पति, मित्र आदि जितने भी संसार के नातेदार हैं, उनका जब तक स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक ही नातेदारी निभाते हैं | गम्भीरतापूर्वक विचार कर | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इसलिए हे मन ! तू भी इन स्वार्थियों को छोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर का भजन कर |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...