Saturday, November 19, 2011

पिय मोल अमोलक लीजिये |
अस अवसर फिर नाहिँ मिलैगो, बातन मोर पतीजिये |
बनन चहत जो अमर-सुहागिनि, तन-मन-प्रानन दीजिये |
दै सरबस लै प्रेम-सुधा-रस, तेहि रस महँ नित भीजिये |
पुनि तेहि रसहिं पिवाइय औरहिं, आपुहुँ सोइ रस पीजिये |
... जनम ‘कृपालु’ सफल कर लीजिय, क्यों कर ? निज कर मीजिये ||


भावार्थ- अरी सखी ! अनमोल श्यामसुन्दर को मोल ले ले | मानव-देह प्राप्ति-रूपी ऐसा स्वर्ण अवसर फिर नहीं मिलेगा | मेरी बात पर विश्वास कर ले | यदि तू अनन्त-काल के लिए अमर सुहागिन बनना चाहती है, तो उन्हीं श्यामसुन्दर को सदा के लिए अपना सर्वस्व दे दे | प्राकृत, तन, मन आदि देकर अनन्त काल के लिए दिव्य प्रेमानन्द का आस्वादन कर | फिर उसी प्रेमानन्द को स्वयं पीते हुए औरों को भी पिलाती जा | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि उपर्युक्त बात मान कर अपना जन्म सफल कर ले अन्यथा पछताना पड़ेगा |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.


 
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के दिव्यतिदिव्य प्रवचन अब आप सभी "सहारा समय" राष्ट्रीय न्यूज़ channel पर भी 10 नवम्बर से प्रतिदिन प्रात:6:30 बजे से नियमित रूप से सुन सकते हैं।

ATTENTION DEAR FRIENDS: YOU MUST LISTEN TO JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ'S DIVINE LECTURES DAILY ON "SAHARA SAMAY" NATIONAL NEWS CHHANEL FROM 10TH NOVEMBER, 6.30.A.M. DONT MISS THE GOLDEN OPPURTUNITY.SO TUNE IN REGULARLY TO 'SAHARA SAMAY CHANNEL' SHARP 6.29 A.M.FROM TODAY.
OTHER PRAVACHAN TIMINGS ARE AS FOLLOWS:

SADHNA CHHANELL:7:10 A.M TO 7:40 A.M.
AASTHA CHHANEL: 6:20 P.M:TO 6:45 P.M.
तुम अपने को शरीर क्यों मानते हो? अपने को केवल आत्मा मानो और सबमें हमारा प्रेमास्पद,हमारा परमात्मा बैठा हुआ है,ये दृढ़ विश्वास करो। और सोचो किसी के दिल को दुखाना,किसी की बुराई करना,किसी में दुर्भावना लाना इससे हमारे प्राण वल्लभ को कितना कष्ट होगा।
-------श्री महाराजजी।


मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।

और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।

भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।
...
हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।

माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।

जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।

रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।

Thursday, November 10, 2011


तुमहिं तजि नहिं चहिये गोलोक |
अस ससुरारि पियारि लगति केहि, पिय न होय जेहि ओक |
अस न चहौं तव मधुर मिलन रस, जहँ न विरह-रस शोक |
तजि रस द्वैत न चह सुख निर्गुण, रस अद्वैत अशोक |
तजि तव रूपहिं नहिं चह भूलेहुँ, ब्रह्मानंदालोक |
... अस ‘कृपालु’ रस को चह पुनि जहँ, विधि निषेध को रोक ||

भावार्थ- एक तत्वज्ञ रसिक कहता है – हे श्यामसुन्दर ! तुमको छोड़कर मैं तुम्हारा गोलोक भी नहीं चाहता | संसार में किसी भी प्रेयसी को ऐसी ससुराल प्यारी नहीं लगती, जिस ससुराल के घर में उसका प्रियतम न हो | मैं ऐसा नित्य-मधुर-मिलन का भी रस नहीं चाहता जिसमें विरह-रस का मिश्रण न हो | मैं सेवक-सेव्य-भावयुक्त द्वैत प्रेम-रस से रहित एकत्व ब्रह्मानन्दरस को भी नहीं चाहता | मैं तुम्हारी रूप-माधुरी को छोड़कर तुम्हारे प्रकाश-मात्र के ब्रह्मानन्द को भी नहीं चाहता | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में पुन: ऐसे रस को क्यों चाहूँगा, जो स्वर्गादि लोक सम्बन्धी है, जहाँ विधि निषेध की भयंकर व्याधि है |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

सुनो हरि अधम उधारन हार |
तुम्हरे सब चाकर हैं नागर, गुन आगर सरकार |
पै इक निगुनी बिनु नहिं शोभा, होति गुनिन दरबार |
ज्यों न होत मायिक दुख तो तोहिं, को पूछत संसार |
त्यों न होय जो मो सम निगुनी, हो न गुनिन सत्कार |
... जानत जग ‘कृपालु’ है तुम्हरो, अपनो जानि निहार ||

भावार्थ- हे अधमों को अपनाने वाले श्यामसुन्दर ! एक प्रार्थना हमारी भी सुन लो | हे नाथ ! तुम्हारे समस्त दास समस्त गुणों के भण्डार एवं रसिक हैं | लेकिन किसी भी दरबार में बिना एक गुणहीन व्यक्ति के गुणी लोगों की शोभा नहीं है | जिस प्रकार यदि संसार में मायिक दु:ख न होता तो आनन्दस्वरूप तुम को कौन पूछता ? उसी प्रकार मुझ सरीखे अवगुण के भण्डार यदि तुम्हारे दरबार में न होंगे तो सर्वगुणसंपन्न तुम्हारे समस्त भक्तों का सम्मान क्या रह जायगा ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – हे श्यामसुन्दर ! भ्रमवश सारा संसार मुझे तुम्हारा भक्त जानता है, तुम भी एक बार अपना जानकर मेरी ओर देख लो |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
IGNORANCE,WORLDLY DESIRES AND GREED ARE THE CAUSES OF WRONG DOINGS.
WHEN CAUSE EXISTS,EFFECT IS BOUND TO HAPPEN.IN FACT,THERE IS NO ONE IN THE WORLD WHO IS NOT GUILTY OF COMMITTING SIN. A SINFUL HEART DEPRIVES A PERSON FROM REACHING KRISHN,AND VANITY FORBIDS A PERSON FROM ACCEPTING HIS SINS.
WHEN A PERSON SINCERELY ACCEPTS HIS OWN FAULTS AND SINS,HE BECOME HUMBLE.ONLY THEN HE BECOME A DEVOTEE,BECAUSE NOW HE HAS DEVELOPED A SIMPLE HEART INSTEAD OF CONCEITED ONE THAT CAN BE OFFERED TO KRISHN THROUGH DEVOTION AND REMEMBRANCE.

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.



UNNECESSARY GOSSIPING, FAULT FINDING IN OTHER DEVOTEES,AND ENTERING INTO CRITICISM,ARE COMMON WEAKNESSES OF A HUMAN MIND.A DEVOTEE MUST AVOID THEM.SUCH A HABIT MAY CAUSE SPIRITUAL TRANSGRESSIONS AND LEAD HIM INTO TROUBLE.

-------SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.



किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।










कृपा करु बरसाने वारी, तेरी कृपा का भरोसा भारी।
कोउ हो या न हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...