Thursday, November 24, 2011

खाली हाथ आये थे, गुरु-भक्ति साथ ले जायेंगे।
------श्री महाराजजी।


अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से भगवतचर्चा करना कुसंग है।
------श्री महाराजजी.


जिन्दगी उसी की महान है, जो गुरु के सुख में बीतती रहे।
------श्री महाराजजी।


जीवन वही है जो गुरु सेवा में ही लगा रहे।
-----श्री महाराजजी।


वे हमारी रक्षा करते हैं, वे हमारी रक्षा कर रहे हैं, वे आगे भी हमारी रक्षा करेंगे, इस पर विश्वास कर लो।
------श्री कृपालु भगवान।
परम प्रेमास्पद श्री कृष्ण तुम्हारे ही हैं. उन्हें थोडा भी दूर मत मानो. वे अपनी भुजाओ को पसारे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे है. वे तुम्हारे आंसुओ को देख कर बड़े प्रसन्न होते है. यह भावना नहीं सत्य बता रहा हूँ. वैसे तो वे प्रतिक्षण प्रत्येक संकल्प को नोट करते है किन्तु आंसू उन्हें अधिकाधिक प्रिय है.

The ultimate loving Shree Krishna is yours only. Do not feel them a little far from you. They are waiting for you with their open arms to embrace you. When they are seeing at your tears they become extremely happy. This is not the feeling but telling truth. They make note of each and every idea of your mind but tears are most dear to them.

- JAGADGURU SHREE KRIPALUJI MAHARAJ.

Saturday, November 19, 2011




सोच मन ! श्याम मिलन की बात |
यह जग है इक गोरखधंधा, कहा याय पतियात |
जेहि यम किंकर अस दसकंठहुँ, माटी महँ मिलि जात |
परम स्वारथिन सों नित जोरत, तिय सुत पति पितु नात |
जो बिनु स्वारथ पर-उपकारी, लोक वेद विख्यात |
... भजत न तेहि ‘कृपालु’ मन मूरख, सुंदर श्यामल गात ||

भावार्थ- अरे मन ! अब तो श्यामसुन्दर के मिलन की बात सोच | यह संसार तो गोरखधंधे के समान परिणाम में परिश्रम ही देगा | इसका क्या विश्वास करता है | जिसका यमराज भी नौकर था ऐसा रावण भी मिट्टी में मिल गया | महान् स्वार्थी स्त्री, पुत्र, पति, पितादि से तू प्रेम करता है | किन्तु जो बिना स्वार्थ के ही दूसरों का उपकार करने वाले हैं, ऐसा जिन्हें लोक, वेद सब जानते हैं ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं अरे मन ! उन श्यामसुन्दर से प्रेम क्यों नहीं करता | यह तेरी कितनी बड़ी भूल है |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.


अरे मन ! इहै सार संसार |
सुर दुर्लभ तनु पाय भजन करु, निशि दिन नंदकुमार |
लगत न दाम छ्दाम याम वसु, सुमिरु श्याम सरकार |
हरि व्यापक संसार एकरस, प्रति परमाणु मझार |
तिनके नाम-रूप-गुण गावत, का घटि जात तिहार |
...
झूठो जप, तप, जोग, याग, व्रत, नेम, धर्म, आचार |
हरि बिनु सुख ‘कृपालु’ नहिं सपनेहुँ, पचि पचि मरिय हजार ||

भावार्थ- अरे मन ! इस असार संसार में यही सार है कि देव दुर्लभ मानव-देह पाकर, निरन्तर श्यामसुन्दर का भजन कर | तू ही सोच ! इसमें तेरी कौड़ी भी तो नहीं खर्च होनी है | एकमात्र उन्हीं का स्मरण कर | श्यामसुन्दर संसार के परमाणु , परमाणु में व्याप्त हैं | उन्हीं के नाम, रूप एवं गुणों का गान कर | तेरा कुछ घट नहीं जायगा | जप, तप, योग, यज्ञ, व्रत, नेम, धर्म, आचार इनसे माया निवृति नहीं हो सकती | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि बिना श्यामसुन्दर की शरण गये स्वप्न में भी सुख नहीं मिल सकता, चाहे करोड़ों साधन करके मर जाओ |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
श्री महाराजजी के मुखारविंद से:
टाइम बरबाद न करो। जितना समय पेट भरने के लिए जरूरी है उतना समय संसार को दो,बाकी टाइम का उपयोग करो। भगवदविषय में लगाओगे तो बहुत जल्दी आगे बढ़ जाओगे अंत:करण की शुद्धि की और। और अगर मर गए बीच में तो जो साधना की है हमारी है वो तुमको फिर मनुष्य बना देगी और फिर कोई गुरु मिल जायेगा या तुम्हारा वही पुराना गुरु दूसरा रूप धारण करके आ जायेगा और तुमको फिर आगे बढ़ाएगा। अँधेर नहीं है भगवान के यहाँ कि बीच में छोड़ दिया गुरुजी ने। ऐसा नहीं होता। वो सदा के लिए हमारा साथ देता है भगवद प्राप्ति तक। इसलिए टाइम का उपयोग करो,समय नष्ट न करो, साधना करते रहो।


रटो रे मन ! छिन छिन श्यामा श्याम |
सद्घन चिद्घन आनंदघन जो, रूप एक द्वै नाम |
जासु नाम शिव शुक सनकादिक, गावत आठों याम |
जाकी लीला लखन ज्ञानिजन, बने विटप ब्रजधाम |
जासु धाम विधि ब्रज-रज याचत, ठड़े एक ही पाम |
... जिन ‘कृपालु’ गुन सुनि शुक से मुनि, तजत समाधि ललाम ||

भावार्थ- अरे मन ! ‘श्यामा-श्याम’ इस युगल नाम को प्रत्येक क्षण रटता रह | यह श्यामा-श्याम सच्चिदानन्द ब्रह्म के ही दो अभिन्न स्वरूप हैं | अरे मन ! इनके नाम को शिव, शुक, सनकादि परमहंस भी निरन्तर गाते रहते हैं | इनकी लीला को देखने के लिये ज्ञानी लोग भी ब्रज में वृक्षों का शरीर धारण करते हैं | इनके धाम की धूलि को ब्रह्मा सरीखे एक पैर से खड़े होकर माँगते रहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इन्हीं युगल सरकार के गुणों को सुनकर शुकदेव सरीखे परमहंस भी अपनी निर्विकल्प समाधि छोड़ देते हैं एवं वेदव्यास से श्रीमद् भागवत का श्रवण करते हैं |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.


अहो हरि ! ओहू दिन कब ऐहैं |
गावत गुन गोपाल निरंतर, दृगन अश्रु बरसैहैं |
रूप माधुरी निशिदिन ध्यावत, मन भृंगी बनि जैहैं |
बाट निहारि तिहारी पल पल, कलप समान जनैहैं |
हाय ! हाय ! करि इत उत भाजत, निज तनु सुधि बिसरैहैं |
...
यह ‘कृपालु’ जिय परम भरोसो, कबहुँ तो हरि अपनैहैं ||

भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! वह दिन कब आवेगा, जब आपके गुणों को गाते हुए प्रतिक्षण मेरी आँखें आँसू बहायेंगी | मेरा मन कब आपके चिन्मय स्वरूप का प्रतिक्षण चिन्तन करता हुआ भृंगी कीड़े की तरह तन्मय हो जायगा | कब आपके दर्शनों की प्रतिक्षण प्रतिक्षा में मुझे एक-एक क्षण कल्प-कल्पांतरों के समान लगेगा | ‘हा नाथ ! हा श्यामसुन्दर !!’ इस प्रकार कहते हुए, परम व्याकुलता-वश इधर-उधर भागते हुए, मैं कब पागल की भाँति अपनी सुधि-बुधि भूल जाऊँगा | ‘श्री कृपालु जी’ के ह्रदय में यह पूर्ण विश्वास है कि कभी न कभी तो नाथ इस दास को अवश्य अपनायेंगे |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...