Sunday, November 27, 2011

श्यामसुंदर तुमसे मिलने को व्याकुल हैं...किन्तु तुम यह नहीं जानते थे....

अब यदि जान भी गए हो तो...............................मानना नहीं चाहते......

तुमने संसार में अकारण करुणा का व्यवहार कहीं नहीं देखा है........शायद इसीलिए अप्रतीती होती है....
...
यदि तुम यह मान लो की.........वे आज और अभी ही तुमसे मिलने को व्याकुल हैं...तो बस तुम्हारे ह्रदय में भी उनके जैसी ही व्याकुलता उत्पन्न हो जाये और बस ...वे मिल जायेंगे...

वो तुम्हारे झूठ मूठे रूप ध्यान , नाम , गुण आदि को भी तन्मयता से सुनते और देखते हैं...की शायद अब की बार ठीक से करेगा.....

पर होता क्या है...? वो परखते ही रह जाते हैं...और तुम उनके अहैतुकी स्नेह को न समझने के कारण ठीक ठीक नहीं कर पाते.....

इसलिए तुम उपरोक्त बात को मान लो ...जिस समय तुम मेरी बात पर विश्वास कर लोगे...बस यही स्वर्ण मुहूर्त होगा तुम्हारा....

----- तुम्हारा कृपालु.

Thursday, November 24, 2011


किशोरी मोरी, सुनिय नेकु इक बात |
हौं मानत हौं परम पातकी, विश्व-विदित विख्यात |
पै यह कौन बात अचरज की, तव चरनन विलगात |
कोउ इक मोहिं बताउ तुमहिं तजि, बिनु पातक जग जात |
जेहि दरबार कृपा बिनु कारन, बटत रही दिन रात |
... तेहि दरबार भयो अब टोटो, यह अचरज दरसात |
मोहिं ‘कृपालु’ कछु आपुन सोच न, तोहिं सोचि पछितात ||

भावार्थ- हे वृन्दावन विहारिणी राधिके ! मैं आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ, कृपया बुरा न मानते हुए सुन लीजिए | मैं स्वयं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं समस्त संसार में प्रख्यात एवं विश्वविदित पापात्मा हूँ, पर साथ ही यह भी कहना चाहता हूँ कि तुम्हारे चरण-कमलों से विमुख होने के कारण हूँ, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? अनादि काल से लेकर आज तक के इतिहास में मुझे किसी एक जीव का भी नाम बता दीजिए जो तुमसे विमुख होकर भी संसार में निष्पाप हुआ हो | आश्चर्य तो यह है कि जिस दरबार में बिना कारण ही निरन्तर कृपा का वितरण हुआ करता था, आज उसी दरबार में मुझ पतित के लिए कृपणता की जा रही है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मुझे अपनी तो कोई भी चिन्ता नहीं, किन्तु तुम्हारे अपयश को सोचकर बार-बार शोक-सा हो रहा है; क्योंकि तुम्हारा यह अपयश मुझ अभागे पतित के द्वारा ही होगा |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
चुरावति चित चितवनि नँदलाल |
यधपि महाविष्णु के ऐसेहिं, लोचन कमल विशाल |
पै ना जाने का जादू सखि, इन चितवनि गोपाल |
इन महँ रति-रस-सरस-प्रेम-रस, छ्लकत रह सब काल |
लखत लटू ह्वै जाति भटू सब, उमा रमा सी हाल |
... इक ‘कृपालु’ चितवनि महँ मूर्छित, गिर् यो काम बेहाल ||

भावार्थ- अरी सखी ! श्यामसुन्दर की मनोहर चितवन ने हमारा चित चुरा लिया | यधपि भगवान् महाविष्णु के भी नेत्र इसी प्रकार कमल के समान बड़े-बड़े हैं, फिर भी श्यामसुन्दर की इस चितवन में पता नहीं क्या जादू भरा हुआ है | अरी सखि ! इस चितवन से निरन्तर प्रेम-रस छलकता रहता है | उस चितवन को देखकर उमा, रमा, सरीखी भी तत्काल ही विभोर हो जाती हैं, फिर अन्य अंगनाओं की क्या बात कही जाय | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैंने तो यहाँ तक सुना है कि उनकी एक ही चितवनि में रास के समय कामदेव भी मूर्च्छित होकर गिर पड़ा था |


(प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण - माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

किशोरी मोरी, बिगरी देहु बनाय |
अति कोमल सुभाउ माँ तुम्हरो, वेद पुरानन गाय |
कासोँ कहूँ सुने को तुम बिनु ? मुझ दुखिया की माय |
मोरी दशा भली तुम जानत, कबहुँ न अघन अघाय |
कपटी कुटिल कुपूत रावरो, इत उत ठोकर खाय |
... भक्तिभाव कछु जानत नाहीँ, बनत रसिक-रस-राय |
अपनी ओर निहारि राधिके !, अब तो लेहु अपनाय |
मोहन सों इक बार मिला दो, परूँ तिहारे पाय |
तुम्हरो माय ! कहाय पूत अब, काके द्वारे जाय |
यह ‘कृपालु’ हठ पुरवहु राधे !, न तु सुत मातु लजाय ||

भावार्थ- हे ब्रजेश्वरी राधिके ! मेरी अनादि काल की बिगड़ी बना दीजिए | हे माँ राधे ! तुम्हारा हृदय अत्यन्त ही कोमल है, ऐसा वेदों और पुराणों ने बताया है | तुमको छोड़कर मैं दुखिया अपना दु:ख और किससे कहूँ, यदि कहूँ भी तो उसे पूर्ण करने की सामर्थ्य भी दूसरों में कहाँ है | हमारी अन्तरंग अवस्था को तुम अच्छी तरह जानती हो कि निरन्तर अनन्तान्त पापों को करते हुए भी, पापों से मेरा पेट नहीं भरता | तुम्हारा ही यह कपटी, दुष्ट कुपुत्र चौरासी लाख दरवाजों पर ठोकरें खा रहा है | माँ राधे ! मेरे अन्त:करण में नवधा-भक्ति के पाँचों भावों का लवलेश मात्र भी अंश नहीं है, फिर भी रसिकों का सिरमौर लोकरंजन के लिए बनता अवश्य हूँ | हे किशोरी जी ! अपनी वात्सल्यमयी दृष्टि के द्वारा, अपनी ओर देखकर, मुझे अब तो सदा के लिये अपना बना लो | मैं तुम्हारे चरण पकड़कर बार-बार यही माँगता हूँ कि प्यारे श्यामसुन्दर से एक बार अवश्य मिला दो | तुम्हारा पुत्र कहलाकर भी यदि मैं और किसी के द्वार पर जाऊँ तो यह शोभा नहीं देता | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह मेरा बाल-हठ अवश्य ही पूर्ण करो, अन्यथा यह पुत्र माता के नाम को कलंकित करेगा |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
किसी व्यक्ति को तत्वज्ञान हो जाना और भगवतरूचि बने रहना, प्रभु को पाने की छटपटाहट बनी रहना,यह हजारों जन्मों के प्रयत्न से भी नहीं हो पाता। यही छटपटाहट भगवदप्राप्ति की जड़ है। यह वह चिंगारी है जो भगवदप्रेम रूपी अग्नि को प्रज़्जव्लित करेगी। इसमे निरंतर व्याकुलतापूर्वक स्मरण का तृण पड़ता रहे तो चिंगारी से ज्वाला निकले।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।


तोहिं पतित जनन ही प्यारे हैं,
हम अगनित पापन वारे हैं!
पुनि कत कर एतिक बेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
नित सेवा मांगूँ श्यामा श्याम तेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
बढ़ें भक्ति निष्काम नित मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
जगद्गुरुत्तम प्रभु श्रीकृपालुजी महाराज की जय.............




"हम चाकर कुञ्ज बिहारी के"
यह वृन्दावन का रस है,इसको "कुञ्ज रस" कहते हैं ! और वृन्दावन के श्यामसुंदर को कुञ्ज बिहारी कहते हैं इसके आगे एक और रस होता है उसे "निकुंज रस" कहते हैं ! यहाँ जीव नहीं जा सकता, वो ललिता, विशाखा आदि का स्थान है ! उसके आगे "निभृत निकुंज" होता है, यहाँ ललिता, विशाखा आदि भी नहीं जा सकतीं, यहाँ केवल श्री राधाकृष्ण ही रहते हैं हम लोगों की जो अंतिम सीट है, वो "कुञ्ज रस" है ! इसलिए हम चाकर "कुञ्ज बिहारी" के हैं और ठाकुर जी के नहीं हैं -- मथुरा बिहारी, द्वारिका बिहारी, बैकुंठ बिहारी आदि के हम उपासक नहीं हैं !
.........................श्री महाराज जी

लगति सखि अब ससुरारि पियारि |
अब लौं रह अनजान पिया ते, रही उमरिया वारि |
अब दिय रसिक बताय पिया तव, मोहन मदन मुरारि |
अब न सुहात खेल गुड़ियन इन, दंपति पितु महतारि |
अब सोइ नाम रूप गुन लीला, धाम जनहिं मन हारि |
... कह ‘कृपालु’ जेहि चहत पिया बस, सोइ सुहागिनि नारि ||

भावार्थ- अरी सखि ! अब तो ससुराल ही अच्छी लगती है | अब तक मैं अपने प्रियतम को नहीं जानती थी, मायाधीन होने के कारण अज्ञानी थी, किन्तु अब रसिकों ने बता दिया है कि तेरे प्रियतम एकमात्र मदन-मोहन श्यामसुन्दर ही हैं | अब स्त्री, पति, माता, पिता, आदि संसार के नातेदार गुड़ियों के खेल के समान प्रतीत होते हैं | अब तो प्रियतम श्यामसुन्दर के ही नाम, रूप, लीला, गुण, धाम, जन में ही मन अनुरक्त रहता है | ‘श्री कृपालु जी’ प्रेम भरी ईर्श्र्या में कहते हैं जिसको पिया चाहे वही सुहागिन नारी है | तेरे ऊपर श्यामसुन्दर की कृपा हो गई क्योंकि तूने रसिकों की बात पर विश्वास कर लिया | कभी हमारा भी समय आयेगा |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
कहीं भी गलत जगह एटेचमेंट(attachment) हुआ कि शरणागति समाप्त हुई अत: गुरु रूपी भगवान को ही सब कुछ मानो।
------श्री महाराजजी।


श्री कृपालु जी महाराज के मुखारविंद से:-

जो आदेश मैंने तुमको दिया है: दीनता, मधुरभाषण, नम्रता , उनका पालन तुम लोग अभी नहीं कर रहे हो। एक भिक्षा माँग रहा हूँ, तुम लोग लापरवाही कर रहे हो, यह बुरी बात है।



इष्टदेव और गुरु में अभेद मानो। उनकी सेवा ही को अपना सर्वस्व मानो, उनकी इच्छा में ही इच्छा रखो।
-------श्री महाराजजी।


भगवदप्राप्ति महापुरुष के बताये मार्ग पर चलने से होगी, न की उनकी नकल करने से।
-----श्री महाराजजी।






कुसंग से बचने का एक ही रास्ता है, सदा हरि-गुरु को अपने हृदय में, अपने साथ ही महसूस करो।
--------श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...