हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, November 28, 2011
Sunday, November 27, 2011
महापुरुषों के वचनों को ही मानना है। उनके आचरण पर ध्यान कभी नहीं देना है। यदि वे हमारे साथ खिलवाड़ करें तो उनके सुख के लिए उसमें तन,मन से शामिल हों। लेकिन बुद्धि को उनके चरणों में डाल दो और उनसे दीनातिदीन होकर यही प्रार्थना करो की प्रभु बस इन श्री चरणों में ही सदा-सदा बनाये रखों। वे क्या हैं? हम नहीं जान सकते हैं। ये तो केवल वही जान सकता है जिस पर वो कृपा करके बोध करा देते हैं। केवल इतना ही दृढ़ विश्वास बनाये रखो कि वे ही हमारे सर्वस्व है। सर्वसमर्थ हैं सर्वांतर्यामी हैं और इतना ही नहीं वे तो हमारे बिलकुल अपने हैं और सदा से हम पर अकारण करुण हैं।
------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।
हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।
सुनो मन ! एक अनोखी बात |
काम क्रोध मद लोभ तजहु जनि, भजहु तिनहिं दिन रात |
काम इहै पै कब मोहिं मिलिहहिं, सुंदर श्यामल गात |
क्रोध इहै घनश्याम-मिलन बिन, जीवन बीत्यो जात |
रहु येदि मद मदमत दास हौं, स्वामी मम बलभ्रात |
... रह ‘कृपालु’ यह लोभ छिनहिँ छिन, बढ़इ प्रेम पिय नात ||
भावार्थ- अरे मन ! एक अनोखी बात सुन | तू काम, क्रोध, मद, लोभ का परित्याग न कर वरन् इनका दिन रात सेवन कर | किन्तु कामना यह रहे कि श्यामसुन्दर कब मिलेंगे ? क्रोध यह हो कि श्यामसुन्दर के मिले बिना मानव-जीवन समाप्त हुआ जा रहा है | मद यह रहे कि मैं श्यामसुन्दर का दास हूँ एवं वे मेरे स्वामी हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि लोभ यह रहे कि श्यामसुन्दर के युगल चरणों में प्रत्येक क्षण प्रेम बढ़ता जाय |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
काम क्रोध मद लोभ तजहु जनि, भजहु तिनहिं दिन रात |
काम इहै पै कब मोहिं मिलिहहिं, सुंदर श्यामल गात |
क्रोध इहै घनश्याम-मिलन बिन, जीवन बीत्यो जात |
रहु येदि मद मदमत दास हौं, स्वामी मम बलभ्रात |
... रह ‘कृपालु’ यह लोभ छिनहिँ छिन, बढ़इ प्रेम पिय नात ||
भावार्थ- अरे मन ! एक अनोखी बात सुन | तू काम, क्रोध, मद, लोभ का परित्याग न कर वरन् इनका दिन रात सेवन कर | किन्तु कामना यह रहे कि श्यामसुन्दर कब मिलेंगे ? क्रोध यह हो कि श्यामसुन्दर के मिले बिना मानव-जीवन समाप्त हुआ जा रहा है | मद यह रहे कि मैं श्यामसुन्दर का दास हूँ एवं वे मेरे स्वामी हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि लोभ यह रहे कि श्यामसुन्दर के युगल चरणों में प्रत्येक क्षण प्रेम बढ़ता जाय |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
हम श्यामसुंदर के आगे ,. उनको सामने खड़ा करके , रो कर उनका दर्शन , उनका प्रेम मांगे बस ...यही भक्ति है......और कुछ नहीं करना धरना है ...
ध्यान दो.....रो कर ...अकड कर नहीं .....
वो सब जानते हैं ....मक्कारी नहीं चलेगी वहां....अंतर्यामी हैं वो .......घट घट वासी हैं ...
जैसे कोई पानी में डूबने लगता है , और तैरना नहीं जानता है ... तो वो कितनी ब्याकुलता मैं हाथ ऊपर करता है ...कल्पना करके देखिये....सब ...समझ आ जायेगा..
जैसे मछली को पानी से बाहर डाल दो ...... कैसे तडपती है पानी के लिए ....सोचिये जरा..
ऐसे ही श्यामसुंदर से मिलने के लिए हमे भी तडपना ही होगा .......
इस जन्म में या फिर हजार जन्म बाद. फिर ........लेकिन करना ये ही पड़ेगा .....लौटकर यहीं आना पड़ेगा जहाँ इस समय हो.....
इसलिए अभी से अबाउट टर्न हो जाओ .......बुधि को बार बार समझाओ ...तब चलोगे तेजी से ...
जल्दी करो समय बहुत कम है...
मानव देह क्षण भंगुर है ...अगला पल मिले न मिले कोई गारंटी नहीं है ..यमराज ले जायेगा टाइम पूरा होते ही..कोई चांस नहीं मिलेगा दुबारा.....
बिना परमीसन के और बिना बताये ले जायेगा......
--------- तुम्हारा कृपालु.
ध्यान दो.....रो कर ...अकड कर नहीं .....
वो सब जानते हैं ....मक्कारी नहीं चलेगी वहां....अंतर्यामी हैं वो .......घट घट वासी हैं ...
जैसे कोई पानी में डूबने लगता है , और तैरना नहीं जानता है ... तो वो कितनी ब्याकुलता मैं हाथ ऊपर करता है ...कल्पना करके देखिये....सब ...समझ आ जायेगा..
जैसे मछली को पानी से बाहर डाल दो ...... कैसे तडपती है पानी के लिए ....सोचिये जरा..
ऐसे ही श्यामसुंदर से मिलने के लिए हमे भी तडपना ही होगा .......
इस जन्म में या फिर हजार जन्म बाद. फिर ........लेकिन करना ये ही पड़ेगा .....लौटकर यहीं आना पड़ेगा जहाँ इस समय हो.....
इसलिए अभी से अबाउट टर्न हो जाओ .......बुधि को बार बार समझाओ ...तब चलोगे तेजी से ...
जल्दी करो समय बहुत कम है...
मानव देह क्षण भंगुर है ...अगला पल मिले न मिले कोई गारंटी नहीं है ..यमराज ले जायेगा टाइम पूरा होते ही..कोई चांस नहीं मिलेगा दुबारा.....
बिना परमीसन के और बिना बताये ले जायेगा......
--------- तुम्हारा कृपालु.
होति जग इक अनहोनी बात |
जो नहिं होइ सक तीनि काल महँ, सोइ जग हो दिन रात |
रसिकन कह सिगरो जग दुलहिनि, दूलह श्यामल गात |
दूलह रस बिनु नीरस दुलहिनि, रस नहिं पाय सकात |
पै जग लखु सब दुलहिनि दुलहिनि, दुलहिनि की बनि जात |
... जो ‘कृपालु’ यह जान मरम सो, जोरत हरि सोँ नात ||
भावार्थ- संसार में एक ऐसी अनहोनी बात है जो सदा होती रहती है | वस्तुत: जो त्रिकाल में भी असम्भव है, वही बात दिन-रात हो, यह कितना बड़ा आश्चर्य है | रसिकजन कहते हैं – समस्त जीवात्माएँ परमात्मा श्यामसुन्दर की दुल्हन-स्वरूपा हैं | यह सर्वविदित है कि दुलहा श्यामसुन्दर दिव्य रस का भण्डार हैं एवं दुल्हन जीवात्मा अनादि काल से मायाधीन होने के कारण आनन्द-रस से वंचित है | अतएव सिद्ध हुआ कि बिना श्यामसुन्दर-रूपी प्रियतम की प्राप्ति के जीवात्मा-रूपी दुल्हन स्वप्न में भी आनन्द प्राप्ति नहीं कर सकती | किन्तु संसार का आश्चर्यमय कार्य देखो | एक दुल्हन जीवात्मा दूसरी दुल्हन जीवात्मा की दुल्हन बन जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जो इस रहस्य को जान लेता है वह तत्काल मायिक संसार से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में अनुरक्त हो जाता है |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
जो नहिं होइ सक तीनि काल महँ, सोइ जग हो दिन रात |
रसिकन कह सिगरो जग दुलहिनि, दूलह श्यामल गात |
दूलह रस बिनु नीरस दुलहिनि, रस नहिं पाय सकात |
पै जग लखु सब दुलहिनि दुलहिनि, दुलहिनि की बनि जात |
... जो ‘कृपालु’ यह जान मरम सो, जोरत हरि सोँ नात ||
भावार्थ- संसार में एक ऐसी अनहोनी बात है जो सदा होती रहती है | वस्तुत: जो त्रिकाल में भी असम्भव है, वही बात दिन-रात हो, यह कितना बड़ा आश्चर्य है | रसिकजन कहते हैं – समस्त जीवात्माएँ परमात्मा श्यामसुन्दर की दुल्हन-स्वरूपा हैं | यह सर्वविदित है कि दुलहा श्यामसुन्दर दिव्य रस का भण्डार हैं एवं दुल्हन जीवात्मा अनादि काल से मायाधीन होने के कारण आनन्द-रस से वंचित है | अतएव सिद्ध हुआ कि बिना श्यामसुन्दर-रूपी प्रियतम की प्राप्ति के जीवात्मा-रूपी दुल्हन स्वप्न में भी आनन्द प्राप्ति नहीं कर सकती | किन्तु संसार का आश्चर्यमय कार्य देखो | एक दुल्हन जीवात्मा दूसरी दुल्हन जीवात्मा की दुल्हन बन जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जो इस रहस्य को जान लेता है वह तत्काल मायिक संसार से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में अनुरक्त हो जाता है |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
जो आँसू स्वयं गुरु आकर न पोंछे, तब तक उन्हें झूठे आँसू मानो।
-----श्री महाराजजी।
सब लोग दीनता, कम बोलने का अभ्यास करो, सहनशीलता बढ़ाने का अभ्यास करो। यही मेरी खुशी है।
------श्री महाराजजी।
दीनता का दूसरा नाम ही साधना है।
-----श्री महाराजजी।
जहाँ प्यार किया जाता है,वहाँ व्यवहार नहीं देखा जाता।
------श्री महाराजजी।
अपनी बुराई सुनकर सौभाग्य मानकर विभोर हो जाओ कि यह हमारा हितैषी है, क्योंकि हमारे दोषों को देखकर बता रहा है,अत: उन बुराइयों को निकालो।
-----श्री महाराजजी।
-----श्री महाराजजी।
सब लोग दीनता, कम बोलने का अभ्यास करो, सहनशीलता बढ़ाने का अभ्यास करो। यही मेरी खुशी है।
------श्री महाराजजी।
दीनता का दूसरा नाम ही साधना है।
-----श्री महाराजजी।
जहाँ प्यार किया जाता है,वहाँ व्यवहार नहीं देखा जाता।
------श्री महाराजजी।
अपनी बुराई सुनकर सौभाग्य मानकर विभोर हो जाओ कि यह हमारा हितैषी है, क्योंकि हमारे दोषों को देखकर बता रहा है,अत: उन बुराइयों को निकालो।
-----श्री महाराजजी।
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...
















