This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, November 29, 2011
श्यामसुंदर तुमसे मिलने को व्याकुल हैं...किन्तु तुम यह नहीं जानते थे....
अब यदि जान भी गए हो तो............................ ...मानना नहीं चाहते......
तुमने संसार में अकारण करुणा का व्यवहार कहीं नहीं देखा है........शायद इसीलिए अप्रतीती होती है....
...
यदि तुम यह मान लो की.........वे आज और अभी ही तुमसे मिलने को व्याकुल हैं...तो बस तुम्हारे ह्रदय में भी उनके जैसी ही व्याकुलता उत्पन्न हो जाये और बस ...वे मिल जायेंगे...
वो तुम्हारे झूठ मूठे रूप ध्यान , नाम , गुण आदि को भी तन्मयता से सुनते और देखते हैं...की शायद अब की बार ठीक से करेगा.....
पर होता क्या है...? वो परखते ही रह जाते हैं...और तुम उनके अहैतुकी स्नेह को न समझने के कारण ठीक ठीक नहीं कर पाते.....
इसलिए तुम उपरोक्त बात को मान लो ...जिस समय तुम मेरी बात पर विश्वास कर लोगे...बस यही स्वर्ण मुहूर्त होगा तुम्हारा....
----- तुम्हारा कृपालु.
अब यदि जान भी गए हो तो............................
तुमने संसार में अकारण करुणा का व्यवहार कहीं नहीं देखा है........शायद इसीलिए अप्रतीती होती है....
...
यदि तुम यह मान लो की.........वे आज और अभी ही तुमसे मिलने को व्याकुल हैं...तो बस तुम्हारे ह्रदय में भी उनके जैसी ही व्याकुलता उत्पन्न हो जाये और बस ...वे मिल जायेंगे...
वो तुम्हारे झूठ मूठे रूप ध्यान , नाम , गुण आदि को भी तन्मयता से सुनते और देखते हैं...की शायद अब की बार ठीक से करेगा.....
पर होता क्या है...? वो परखते ही रह जाते हैं...और तुम उनके अहैतुकी स्नेह को न समझने के कारण ठीक ठीक नहीं कर पाते.....
इसलिए तुम उपरोक्त बात को मान लो ...जिस समय तुम मेरी बात पर विश्वास कर लोगे...बस यही स्वर्ण मुहूर्त होगा तुम्हारा....
----- तुम्हारा कृपालु.
अरे मन ! अस तृष्णा बलवान |
बड़े बड़े भूपति भये भूतल, उदय अस्त लौं भान |
तिनहुँन की सोइ दशा रही जो, एक भिखारिहिं जान |
यह तृष्णा नहिं छोड़ति इंद्रहुँ, जेहि सुरपति सब मान |
जब लौ नहिं सुमिरहु मन निशिदिन, सुंदर श्याम सुजान |
... तब लौ सुख ‘कृपालु’ नहिं पैहौं, वेद पुरान प्रमान ||
भावार्थ- अरे मन ! यह तृष्णा इतनी बलवती है कि इस पृथ्वी पर बड़े-बड़े राजा हुए जिनका सम्पूर्ण धरातल पर राज्य था किंतु उनकी दशा भी ठीक एक भिखारी के समान थी | कहाँ तक कहें यह तृष्णा देवराज इन्द्र को भी नहीं छोड़ती जिसे सब देवताओं का स्वामी मानते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, हे मन ! वेद पुराण चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जब तक तू श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण नहीं करेगा तब तक सुख न पा सकेगा |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
बड़े बड़े भूपति भये भूतल, उदय अस्त लौं भान |
तिनहुँन की सोइ दशा रही जो, एक भिखारिहिं जान |
यह तृष्णा नहिं छोड़ति इंद्रहुँ, जेहि सुरपति सब मान |
जब लौ नहिं सुमिरहु मन निशिदिन, सुंदर श्याम सुजान |
... तब लौ सुख ‘कृपालु’ नहिं पैहौं, वेद पुरान प्रमान ||
भावार्थ- अरे मन ! यह तृष्णा इतनी बलवती है कि इस पृथ्वी पर बड़े-बड़े राजा हुए जिनका सम्पूर्ण धरातल पर राज्य था किंतु उनकी दशा भी ठीक एक भिखारी के समान थी | कहाँ तक कहें यह तृष्णा देवराज इन्द्र को भी नहीं छोड़ती जिसे सब देवताओं का स्वामी मानते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, हे मन ! वेद पुराण चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जब तक तू श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण नहीं करेगा तब तक सुख न पा सकेगा |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
Monday, November 28, 2011
दयामय ! अपनो विरद विचार |
वेद पुरान बखान अकारन, करुनाकर सरकार |
पुनि तोहिं लगत पतित अति प्यारो, अस कह रसिक पुकार |
हौं अति पतित रहित साधन पुनि, पुनि मतिमंद गमार |
यह बड़ सोच, जान जग मो कहँ, तुम्हरोइ नंदकुमार |
... लाज बचाउ ‘कृपालु’ आपुनिहिं, अपनो जानि निहार ||
भावार्थ- हे दयालु श्यामसुन्दर ! तुम अपने विरद पर विचार करो | सरकार को वेदों-पुराणों में बिना कारण के ही कृपा करने वाला बतलाया है | फिर तुम्हारे संतों ने भी पुकार-पुकार कर यह कहा कि तुम पतितों से अत्यधिक प्यार करते हो | मैं तो अत्यधिक पतित हूँ, फिर साधनहीन हूँ, फिर बुद्धिहीन भी हूँ | मुझे सब से बड़ी चिन्ता यही है कि संसार मुझे तुम्हारा भक्त समझता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अतएव अपनी लज्जा की रक्षा करो, एवं मुझे अपना जान कर एक बार निहार दो |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
वेद पुरान बखान अकारन, करुनाकर सरकार |
पुनि तोहिं लगत पतित अति प्यारो, अस कह रसिक पुकार |
हौं अति पतित रहित साधन पुनि, पुनि मतिमंद गमार |
यह बड़ सोच, जान जग मो कहँ, तुम्हरोइ नंदकुमार |
... लाज बचाउ ‘कृपालु’ आपुनिहिं, अपनो जानि निहार ||
भावार्थ- हे दयालु श्यामसुन्दर ! तुम अपने विरद पर विचार करो | सरकार को वेदों-पुराणों में बिना कारण के ही कृपा करने वाला बतलाया है | फिर तुम्हारे संतों ने भी पुकार-पुकार कर यह कहा कि तुम पतितों से अत्यधिक प्यार करते हो | मैं तो अत्यधिक पतित हूँ, फिर साधनहीन हूँ, फिर बुद्धिहीन भी हूँ | मुझे सब से बड़ी चिन्ता यही है कि संसार मुझे तुम्हारा भक्त समझता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अतएव अपनी लज्जा की रक्षा करो, एवं मुझे अपना जान कर एक बार निहार दो |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
नाथ ! हौं तुमहिं सोचि पछितात |
पितु सर्वज्ञ सर्वव्यापक अरु, सर्वसमर्थ कहात |
ता सुत द्वार लक्ष चौरासी, माँगत भीख लखात |
जानत जगहुँ कौन सुत, पितु कहँ, जासु बनी यह गात |
पुनि ज्ञानिहुँ-अज्ञेय पिता कहँ, किमि हौं जानि सकात |
... याते करु ‘कृपालु’ अनुकंपा, पितहिं लाज अब जात ||
भावार्थ- हे नाथ ! मुझे अपना पछतावा कुछ नहीं है, केवल तुम्हारे विषय में ही चिन्ता है | जो पिता सर्वज्ञ, सर्वव्यापक एवं सर्वसमर्थ कहलाता हो, उसका पुत्र चौरासी लाख दरवाजों पर भिक्षा माँगता फिरे, इसमें पिता का ही अपयश है | संसार में भी कौन सा नवजात शिशु अपने माता-पिता को जानता है किन्तु फिर भी माता-पिता यथाशक्ति उसका योग-क्षेम वहन करते ही हैं | तुम तो महान् ज्ञानियों से भी अज्ञेय हो, फिर हम अज्ञानी तुम्हें कैसे जान सकते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – इसलिए हे नाथ ! अब अपने पुत्र पर कृपा करो एवं अपने वात्सल्य से कृतार्थ करो, अन्यथा पिता की ही लाज जायगी |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
पितु सर्वज्ञ सर्वव्यापक अरु, सर्वसमर्थ कहात |
ता सुत द्वार लक्ष चौरासी, माँगत भीख लखात |
जानत जगहुँ कौन सुत, पितु कहँ, जासु बनी यह गात |
पुनि ज्ञानिहुँ-अज्ञेय पिता कहँ, किमि हौं जानि सकात |
... याते करु ‘कृपालु’ अनुकंपा, पितहिं लाज अब जात ||
भावार्थ- हे नाथ ! मुझे अपना पछतावा कुछ नहीं है, केवल तुम्हारे विषय में ही चिन्ता है | जो पिता सर्वज्ञ, सर्वव्यापक एवं सर्वसमर्थ कहलाता हो, उसका पुत्र चौरासी लाख दरवाजों पर भिक्षा माँगता फिरे, इसमें पिता का ही अपयश है | संसार में भी कौन सा नवजात शिशु अपने माता-पिता को जानता है किन्तु फिर भी माता-पिता यथाशक्ति उसका योग-क्षेम वहन करते ही हैं | तुम तो महान् ज्ञानियों से भी अज्ञेय हो, फिर हम अज्ञानी तुम्हें कैसे जान सकते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – इसलिए हे नाथ ! अब अपने पुत्र पर कृपा करो एवं अपने वात्सल्य से कृतार्थ करो, अन्यथा पिता की ही लाज जायगी |
(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
सुधार अपने अंदर साधक को स्वयं करना है और भूलकर भी ये न सोचो कि भविष्य में कोई दिव्य शक्ति साधना करेगी। दिव्य शक्ति को जो कुछ करना है वह स्वयं करती है। उसके किए हुए अनुग्रह को भगवदप्राप्ति के पूर्व कोई समझ नहीं सकता। यही गंदी आदत यदि तुरंत नहीं छोड़ी तो नासूर बनकर विकर्मी बना देगी और फिर उच्छृंखल होकर कहोगे सब कुछ उन्ही को करना है। इसलिए तुरंत निश्चय बदलो।
-------श्री महाराजजी।
श्री महाराजजी कहते हैं कि:- आप जिससे प्यार करेंगे, उसी कि प्रोपेर्टी मिल जायेगी। देवताओं से प्यार करोगे तो, देवलोक मिल जायेगा, भूतों से प्यार करोगे,भूत लोक मिल जायेगा, मुझसे प्यार करोगे तो, तो मैं मिल जाऊंगा, तुम्हें क्या चाहिये? सोच लो,और उसी एरिया वाले से प्यार कर लो। देवताओं के विषय में बड़ी-बड़ी बातें हैं,उनके बड़े कानून हैं। लेकिन भगवान या महापुरुष के बारे में कुछ अक्ल लगाने की आवश्यकता नहीं हैं। बस भोले बालक बन कर सरैंडर करना है, शरणागत होना है, प्यार करना है, और कोई कडा कानून नहीं है।
अपना प्रत्येक कार्य करते समय सदा यही विश्वास रखो कि मेरे प्रत्येक कार्य को महाराजजी देख रहें हैं। और वो तो वास्तव में देख ही रहें हैं, हमें realize करना होगा बस।
-------श्री महाराजजी।
श्री महाराजजी कहते हैं कि:- आप जिससे प्यार करेंगे, उसी कि प्रोपेर्टी मिल जायेगी। देवताओं से प्यार करोगे तो, देवलोक मिल जायेगा, भूतों से प्यार करोगे,भूत लोक मिल जायेगा, मुझसे प्यार करोगे तो, तो मैं मिल जाऊंगा, तुम्हें क्या चाहिये? सोच लो,और उसी एरिया वाले से प्यार कर लो। देवताओं के विषय में बड़ी-बड़ी बातें हैं,उनके बड़े कानून हैं। लेकिन भगवान या महापुरुष के बारे में कुछ अक्ल लगाने की आवश्यकता नहीं हैं। बस भोले बालक बन कर सरैंडर करना है, शरणागत होना है, प्यार करना है, और कोई कडा कानून नहीं है।
अपना प्रत्येक कार्य करते समय सदा यही विश्वास रखो कि मेरे प्रत्येक कार्य को महाराजजी देख रहें हैं। और वो तो वास्तव में देख ही रहें हैं, हमें realize करना होगा बस।
Subscribe to:
Posts (Atom)
मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
-
Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
-
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
-
ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...



















