This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, August 21, 2012
Sunday, August 19, 2012
DOHA FROM RADHA GOVIND GEET..............BY SHRI MAHARAJJI.
माया ने भुलाया अरु गोविंद राधे।
गुरु ने जगाया ये भिखारी उन्हें का दे।।
भावार्थ: माया ने जीव को अपना स्वरूप- मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ,भुला दिया था। वह अपने को शरीर मान कर शरीर के नातेदारों में ही आसक्ति कर बैठा। गुरु ने उसे इस मोह तंद्रा से जगा कर उसे याद दिलाया कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो अतः तुम्हारा संबंध केवल परमात्मा से ही है। इस उपकार के बदले शरीर के सुख साधन की भौतिक सम्पत्ति का भिक्षुक अपने गुरु को क्या दे सकता है?
गुरु ने जगाया ये भिखारी उन्हें का दे।।
भावार्थ: माया ने जीव को अपना स्वरूप- मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ,भुला दिया था। वह अपने को शरीर मान कर शरीर के नातेदारों में ही आसक्ति कर बैठा। गुरु ने उसे इस मोह तंद्रा से जगा कर उसे याद दिलाया कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो अतः तुम्हारा संबंध केवल परमात्मा से ही है। इस उपकार के बदले शरीर के सुख साधन की भौतिक सम्पत्ति का भिक्षुक अपने गुरु को क्या दे सकता है?
MERE 'KRIPALU' BHAGWAN............
हमारे परमपूजनीय श्री महाराजजी (जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज) तो कृपा की मूर्ति ही हैं। यानि अंदर बाहर सर्वत्र कृपा ही कृपा है। यही उनका वास्तविक स्वरूप है। 'कृपालु' का अर्थ ही है कृपा लूटाने वाला। कोई दुर्भावना से आए सदभावना से उनके पास आये वे सब पर कृपा ही करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि गुरुवर का तन मन सब कृपा का ही बना हुआ है। सोते जागते उठते बैठते उनका एक ही काम है जीवों पर कृपा करना। उनका तन,मन सब कृपा ही कृपा का बना हुआ है, वे बिना कृपा किये रह ही नहीं सकते। लेकिन हम जिस दिन उन्हें सेंट-परसेंट 'कृपालु' मान लेंगे बस हमारा काम बन जायेगा।
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