This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Sunday, August 26, 2012
देहु हरि ! यह झगड़ो निपटाय |
अति ही प्रबल तिहारी दासी, माया शक्ति कहाय |
लख चौरासी योनि नचावति, मोहिं जानि असहाय |
सुतहिँ मार दासी पितु देखत, यह जगहूँ न सुनाय |
पुनि तुम कहँ बिनु हेतु सनेही, वेद पुरानन गाय |
...
अति ही प्रबल तिहारी दासी, माया शक्ति कहाय |
लख चौरासी योनि नचावति, मोहिं जानि असहाय |
सुतहिँ मार दासी पितु देखत, यह जगहूँ न सुनाय |
पुनि तुम कहँ बिनु हेतु सनेही, वेद पुरानन गाय |
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बरजि ‘कृपालु’ आपुनी माया, देहु प्रेम रस प्याय ||
भावार्थ - हे श्यामसुन्दर ! यह झगड़ा समाप्त कर दीजिये | यह तुम्हारी दासी,शक्ति,माया अत्यन्त ही प्रबल है | मुझे असहाय समझ कर चौरासी लाख योनियों में भटका रही है | बड़े आश्चर्य की बात है कि जीव पुत्र को तुम्हारी माया दासी मारे और तुम पिता होकर देखो | ऐसा तो संसारी, स्वार्थी पिता भी नहीं करता फिर तुम्हें तो वेद पुराण बिना कारण के ही कृपा करने वाला बताते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे दयामय ! अपनी माया को रोक लो तथा मुझे प्रेम-रस पिला कर निहाल कर दो |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
भावार्थ - हे श्यामसुन्दर ! यह झगड़ा समाप्त कर दीजिये | यह तुम्हारी दासी,शक्ति,माया अत्यन्त ही प्रबल है | मुझे असहाय समझ कर चौरासी लाख योनियों में भटका रही है | बड़े आश्चर्य की बात है कि जीव पुत्र को तुम्हारी माया दासी मारे और तुम पिता होकर देखो | ऐसा तो संसारी, स्वार्थी पिता भी नहीं करता फिर तुम्हें तो वेद पुराण बिना कारण के ही कृपा करने वाला बताते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे दयामय ! अपनी माया को रोक लो तथा मुझे प्रेम-रस पिला कर निहाल कर दो |
(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.
O Kishori Ji! Glance towards me with Your benevolent eyes. Your extremely powerful maya is making me dance in many ways. I am surrounded from all sides by powerful enemies such as lust, anger, greed, attachment and pride. Despite knowing the truth, this stubborn mind of mine refuses to accept it, and continues to go towards the world.
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