Tuesday, September 11, 2012




"जिस वातावरण से तुमको नुकसान होने वाला है,उस वातावरण में तुम क्यों जाते हों। शास्त्रों में लिखा है- धधकते अंगारों के बीच लोहे के पिंजरे में प्राण त्याग देना अच्छा है, बजाय इसके कि गलत atmosphere में पहुँच जाना। भगवदप्राप्ति के एक सेकंड पहले तक पग पग पर खतरा है। शास्त्रों का ज्ञाता जितेंद्रिय धर्मात्मा अजामिल भी एक क्षण के कुसंग से पापियों की example बन गया। अनंत जन्मों का गलत अभ्यास है इसलिए बिगड़ना जल्दी हो जाता है और बनना देर में होता है। बिगड़ने की बहुत लंबी प्रैक्टिस है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।"

प्रश्न -भगवान् की प्राप्ति कैसे हो सकती है ?

उतर - यह तो समस्त शास्त्र -वेदों का सिद्धान्त है कि भगवान्
श्रीकृष्ण की प्राप्ति केवल भक्ति से ही हो सकती है !

--जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज .

प्रश्न -भगवान् का प्रेम कैसे मिलेगा ?

उतर -किसी भी उपाय से भगवान् का प्रेम नहीं हो सकता ! अनन्त कोटि साधना कर डालो -योग , यज्ञ ,जप ,तप पूजा लेकिन प्रेम नहीं मिलेगा !
हरि-गुरु कृपा से ही प्रेम मिलता है ! किसी साधना से नहीं ! भगवान् के पस अनन्त शक्तियाँ हैं ! उनमें प्रेम शक्ति सर्वोपरि है !
वह अन्य सारी शक्तियाँ शक्तिमान के आधीन रहती हैं किन्तु प्रेमा शक्ति ऐसी शक्ति है जिसके आधीन भगवान् रहते हैं !

-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज .
किशोरी मोरी, करहु कृपा की कोर |
बहुविधि नाच नचावति स्वामिनि !, यह माया बरजोर |
काम क्रोध अरु लोभ मोह मद, घेरे चहुँ दिशि चोर |
जानतहूँ नहिं मानत ठानत, हठहिँ हठी मन मोर |
सुत वित नारि पियारि लगति अति, यदपि कहावत तोर |
...



ताते दै निज प्रेम ‘ कृपालुहिं ’, हेरहु हमरिहुँ ओर ||


भावार्थ - हे किशोरी जी ! मुझ पर कृपा दृष्टि करो | यह प्रबल माया मुझे अनेक प्रकार के नाच नचा रही है | काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये बड़े-बड़े शत्रु चारों ओर से घेरे हुए हैं | सब कुछ जानते हुए भी यह हठीला मन दुराग्रह के कारण नहीं मानता, संसार की ओर ही जाता है | यधपि मैं तुम्हारा कहलाता हूँ फिर भी धन, पुत्र, स्त्री आदि से प्यार करता हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं इसलिए एक बार हमारी ओर भी देखकर, अपना विशुद्ध प्रेम देकर कृतार्थ करो |


(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

It is God's promise that He will accept and love the individual soul in the same manner that the individual soul loves Him."

श्री कृपालु जी महाराज के मुखारविंद से:-

जो आदेश मैंने तुमको दिया है: दीनता, मधुरभाषण, नम्रता , उनका पालन तुम लोग अभी नहीं कर रहे हो। एक भिक्षा माँग रहा हूँ, तुम लोग लापरवाही कर रहे हो, यह बुरी बात है।


जीवन वही है जो हरि-गुरु सेवा में ही लगा रहे।
-----श्री महाराजजी।"



जिन्दगी उसी की महान है, जो हरि-गुरु के सुख में बीतती रहे।
------श्री महाराजजी।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...