Sunday, September 16, 2012



"संसार के कार्य करते हुए भी बीच-बीच में बारंबार 'भगवान मेरे सामने हैं' इस प्रकार रूपध्यान द्वारा निश्चय करते रहना चाहिये। इससे दो लाभ हैं - एक तो रूपध्यान परिपक्व होगा, दूसरे हम, भगवान को अपने समक्ष, साक्षात रूप से महसूस करते हुए उच्छृंक्ल न हो सकेंगे, जिसके परिणाम स्वरूप अपराधों से बचे रहेंगे। जीव तो, किंचित भी स्वतंत्र हुआ कि बस, वह धारा-प्रवाह रूप से संसार की ही ओर भागने लगेगा।

------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।"

"श्री महाराजजी कहते हैं कि:- आप जिससे प्यार करेंगे, उसी कि प्रोपेर्टी मिल जायेगी। देवताओं से प्यार करोगे तो, देवलोक मिल जायेगा, भूतों से प्यार करोगे,भूत लोक मिल जायेगा, मुझसे प्यार करोगे तो, तो मैं मिल जाऊंगा, तुम्हें क्या चाहिये? सोच लो,और उसी एरिया वाले से प्यार कर लो। देवताओं के विषय में बड़ी-बड़ी बातें हैं,उनके बड़े कानून हैं। लेकिन भगवान या महापुरुष के बारे में कुछ अक्ल लगाने की आवश्यकता नहीं हैं। बस भोले बालक बन कर सरैंडर करना है, शरणागत होना है, प्यार करना है, और कोई कडा कानून नहीं है।"

"हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।"

"भगवान की सेवा से भगवान की कृपा मिलेगी, उनका प्यार मिलेगा, अंत:करण शुद्ध होगा और वो तुम्हारा योगक्षेम वहन करेंगे।
------श्री महाराजजी।"
"परिपूर्ण तो कोई है नहीं,कमी सबमे है, लेकिन उस कमी को भी कोई सुनना नहीं चाहता।
------श्री कृपालु महाप्रभु।"


मेरे गुरुवर मेरे गिरिधर प्यारे, दोउ एकहि हो न सपनेहु न्यारे।
हरि की कृपा ते मिले गुरुवर प्यारे, गुरु की कृपा ते मिले गिरिधर प्यारे।
गिरिधर तो हैं प्राण हमारे, गुरुवर मेरे प्राण पियारे।
गुरुवर आत्मा गिरिधर प्यारे, गिरिधर आत्मा गुरुवर प्यारे।
गुरुवर कह भज गिरिधर प्यारे, गिरिधर कह भज गुरुवर प्यारे।

...
गुरुवर कह बड़ गिरिधर प्यारे, गिरिधर कह बड़ गुरुवर प्यारे।
निर्मल मन चह गिरिधर प्यारे, निर्मल मन कर गुरुवर प्यारे।
गुरुवर गिरिधर सँग भजु प्यारे, या गुरुवर को हि भज प्यारे।
मम गुरुवर मम गिरिधर प्यारे, तुम दोउ रहु नित हृदय हमारे।
 

Friday, September 14, 2012




Be a lover of God, not of the world. Do not beg your God and Master for health, wealth and material goods. When you bow to God but desire the world, you prove that you love not the Creator, but His creation. If you insist on asking God for something, ask the same thing as Prahlad: "God! Kindly destroy the very seed of desire that exists in my heart.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...