Sunday, September 16, 2012



Only by the Grace of the 'true Guru' one can attain Divine knowledge. But one finds a 'genuine Guru' by 'God's grace'.


"तृष्णा की नदी गहरी है, शरीर रूपी नाव जीर्ण है, अतएव बिना कुशल नाविक सद्गुरु के तुम भवसागर से कैसे पार उतरोगे। सद्गुरु की शरण ही संसार -सागर से बचाने वाली है।"
मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।

और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।

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भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।


हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।

माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।

जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।

रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।

भगवत्कृपा के हेतु अन्तः कारण शुद्ध करना होगा !
यह कार्य वास्तविक गुरु की सहायता से ही होगा !

To attain the grace of god ,one will have to completely purity the heart.
This is possible only by the guidance of a genuine Guru.

-jagadguru shree kripalu ji maharaj .



"गुरु के व्यवहार को कभी मत देखो। सदा यह सोचो कि वो कुछ भी करें, कैसा भी व्यवहार करें , हमें इससे कोई मतलब नहीं। बस हमें तो आज्ञा पालन करना है। चाहे वो हमसे आँखें फेर लें, चाहे डांट लगायें, लेकिन हमारे प्यार में कभी कमी नहीं आयेगी। सदा उनको सुख पहुंचाना ही हमारे जीवन का प्रथम लक्ष्य है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।"



हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे !
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नाम 'कृपालु' काम तुम जानति,
भलो बुरो जस तेरो री किशोरी राधे। !

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.



"ALWAYS KEEP YOUR MIND ABSORBED IN 'RADHAKRISHN' AND YOUR 'BELOVED GURU'."

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...