Wednesday, January 16, 2013



"THE GURU WHO IGNITES THE FLAME OF DIVINE KNOWLEDGE IN THE HEART OF A DEVOTEE IS GOD HIMSELF,BUT;THE ONE WHO CONSIDERS THE DIVINE GURU AS A HUMAN BEING (Even though he may have accumulated great literal knowledge of the scriptures), IS COMPLETELY IGNORANT AND HIS SPIRITUAL KNOWLEDGE IS TOTALLY USELESS LIKE AN ELEPHANT'S BATH.
THE LORD,WHOSE GRACIOUS FOOTDUST IS DESIRED BY THE GREAT YOGIS AND GYANIS AND WHO IS SUPREME CONTROLLER OF SOUL AND MAYA,HE HIMSELF DESCENDS ON THE EARTH PLANET AS GURU.BUT SEE THE FALLACY OF THE WORLD THAT,THE IGNORANT SOULS THINK HIM AS AN ORDINARY HUMAN BEING."



भगवननाम में भगवान की समस्त शक्तियाँ विध्यमान हैं। नाम स्वयं में पूर्ण है। किसी अन्य व्यक्ति से दीक्षा लेने की आवश्यकता नहीं है।
.........श्री कृपालुजी महाप्रभु।



वास्तविक गुरु के दिये हुए ज्ञान को सदा पुनरावृत्ति (मनन) के द्वारा पक्का करते रहना चाहिये अन्यथा मायाबद्ध होने के कारण अनादिकालीन अज्ञान उस ज्ञान पर हावी होकर उसे भुला देता है।
...........श्री कृपालुजी महाप्रभु।

गुरु कृपा जिस पर होती है हरि उसके पीछे-पीछे चलते हैं।

.......श्री कृपालुजी महाप्रभु।

Tuesday, January 15, 2013





जीव में जब तक देहाभिमान है, तब तक वह आसानी के साथ स्वयं अपने आपको कभी भी गिरा हुआ नहीं मानता। अतएव, नित्य होश में रहने वाले एक महापुरुष की आवश्यकता होती है जो उस बेहोश साधक की त्रुटियों को बता-बता कर उसे होश में लाता रहता है।

-------श्री महाराजजी।



सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना हरि-गुरु सेवा के नष्ट न होने पाये। अपने आपको अपने शरण्य की धरोहर मानकर उनकी नित्य सेवा करने में ही अपना भूरिभाग्य मानो।

------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


हाथ पैर की सेवा करना कोई बहुत बड़ी सेवा नहीं है, संत जो कहता है उसके अनुसार चलना ,सबसे बड़ी सेवा है।
-------श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...