Tuesday, January 22, 2013

हरि में हरि व गुरु , एवं गुरु में भी हरि गुरु दोनों समाहित हैं यह ज्ञान सदैव स्मरण रहना चाहिये ।
******श्री महाराज जी।
हरि में हरि व गुरु , एवं गुरु में भी हरि गुरु दोनों समाहित हैं यह ज्ञान सदैव स्मरण रहना चाहिये ।
 ******श्री महाराज जी।

 

Monday, January 21, 2013

We should constantly beg for forgiveness for all our sins with utmost humility.

----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
We should constantly beg for forgiveness for all our sins with utmost humility.

----jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

If you desire to be a true devotee, you must see God within each and every living being.
----------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
If you desire to be a true devotee, you must see God within each and every living being. 
----------jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 
 

खरे हरि कुंज-लतान तरे |
सा रे ग म प ध नि सुरन सों पुनि पुनि, मुरलिहिं तान भरे |
तानन श्री वृषभानुलली के, गुनगन गान करे |
करत ललिहिं गुन-गान मूँदि दृग, तिनकोइ ध्यान धरे |
धरत ध्यान देखन कहँ छिन छिन, नैनन प्रान लरे |
...
परत ‘कृपालु’ आन जब प्रानन, तब ही जानि परे ||

भावार्थ - श्री श्यामसुन्दर निकुंज में लताओं के नीचे खड़े हैं | सा रे ग म प ध नि इन सात स्वरों के विविध आरोह-अवरोह के द्वारा बार-बार मुरली बजा रहे हैं एवं उसी मुरली में श्री वृषभानुनन्दिनी राधा के गुणों को गा रहे हैं | उन्हीं का ध्यान भी कर रहे हैं | उन्हीं के ध्यान में अनुरक्त श्यामसुन्दर के नेत्र एवं प्राण परस्पर झगड़ा कर रहे हैं | झगड़ा यह है कि ये दोनों ही, एक दूसरे से प्रथम ही किशोरी जी से मिलना चाहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जब किसी के ऊपर कोई विपति आ जाती है तभी उसको अनुभव होता है | तात्पर्य यह है कि सनातन आनंदमय ब्रह्म को भी श्री किशोरी जी के वियोग में रोना पड़ता है |


( प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
खरे हरि कुंज-लतान तरे |
सा रे ग म प ध नि सुरन सों पुनि पुनि, मुरलिहिं तान भरे |
तानन श्री वृषभानुलली के, गुनगन गान करे |
करत ललिहिं गुन-गान मूँदि दृग, तिनकोइ ध्यान धरे |
धरत ध्यान देखन कहँ छिन छिन, नैनन प्रान लरे |
परत ‘कृपालु’ आन जब प्रानन, तब ही जानि परे ||


भावार्थ -  श्री श्यामसुन्दर निकुंज में लताओं के नीचे खड़े हैं | सा रे ग म प ध नि इन सात स्वरों के विविध आरोह-अवरोह के द्वारा बार-बार मुरली बजा रहे हैं एवं उसी मुरली में श्री वृषभानुनन्दिनी राधा के गुणों को गा रहे हैं | उन्हीं का ध्यान भी कर रहे हैं | उन्हीं के ध्यान में अनुरक्त श्यामसुन्दर के नेत्र एवं प्राण परस्पर झगड़ा कर रहे हैं | झगड़ा यह है कि ये दोनों ही, एक दूसरे से प्रथम ही किशोरी जी से मिलना चाहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जब किसी के ऊपर कोई विपति आ जाती है तभी उसको अनुभव होता है | तात्पर्य यह है कि सनातन आनंदमय ब्रह्म को भी श्री किशोरी जी के वियोग में रोना पड़ता है |


( प्रेम रस मदिरा  श्रीकृष्ण  –  माधुरी )
   जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

 
 



आप लोग शायद नहीं जानते आपके ह्रदय में भगवान् नित्य रहते हैं , लेकिन कोई फायदा नहीं ! सुनते हैं रहते हैं , रहते हैं अब आइडियाज (ideas) नोट करते हैं ! हाँ मानते नहीं ! अगर मान लें तो पाप कैसे करें ?अगर मान लें कि वो हमारे ह्रदय में हैं तो हम प्राइवेसी (privacy) जो रखते हैं अपनी , अपनी बीबी के खिलाफ सोच रहे हैं उसके बगल में बैठ कर , आपने ही बाप के खिलाफ सोच रहे हैं उसके ही पास में बैठ कर , अपने ही गुरु के खिलाफ भी सोचने लगते हैं , उन्ही के सामने बैठ कर के ! और तो और भगवान् को भी नहीं छोड़ते ! ये क्या भगवान् भगवान् भगवान् लगा रखा था ! उसके नौ बच्चे थे दसवाँ हुआ है आज ! हमारे एक बच्चा था मर गया ! क्या भगवान् का न्याय है तुम्हारे ! इसमें भगवान् क्या करें भाई ? ये तो तुम्हारे कर्म के हिसाब से फल मिलता है ! लेकिन अल्पज्ञ जीव अपनी अल्पज्ञता का स्वरूप दिखा देता है !

*************जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज**************

एक साधक का प्रश्न -- गुरु जीव पर अहैतु की कृपा क्यों करता है ?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर -- गुरु जीव पर अहैतु की कृपा करता है जिससे जीव भगवत्प्राप्ति अर्थात आनंद प्राप्ति कर सके , क्योंकि प्रत्येक जीव आनंद चाहता है और वह उसे संसार में ढूंढ़ रहा है , जहाँ आनंद नहीं है ! अतः गुरु ही अहैतु की कृपा कर उसे सही रास्ता ही नहीं बताता बल्कि उसे उस गन्तव्य स्थान तक पहुँचा भी देता है !

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...