Monday, February 4, 2013

पहले नदी पार हो जाओ ,तब नाव को चैलेंज करो। अगर 10 फीट भी अभी नदी पार करना शेष है ,जहाँ अगाध पानी है सिर के ऊपर और आपने कहा - अब क्या है, कूद पड़ो। न, न अभी ख़तरा है, संकट अभी टला नहीं है। नामापराध यानि संत के प्रति अपराध कर देने पर ,भावभक्ति पर जाकर (जब भगवतदर्शन होने वाला होता है) वह उच्च कोटि का साधक भी अभाव भक्ति यानि भक्ति में शून्यता को प्राप्त हो जाता है, साधारण जीव की क्या हैसियत?
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
पहले नदी पार हो जाओ ,तब नाव को चैलेंज करो। अगर 10 फीट भी अभी नदी पार करना शेष है ,जहाँ अगाध पानी है सिर के ऊपर और आपने कहा - अब क्या है, कूद पड़ो। न, न अभी ख़तरा है, संकट अभी टला नहीं है। नामापराध यानि संत के प्रति अपराध कर देने पर ,भावभक्ति पर जाकर (जब भगवतदर्शन होने वाला होता है) वह उच्च कोटि का साधक भी अभाव भक्ति यानि भक्ति में शून्यता को प्राप्त हो जाता है, साधारण जीव की क्या हैसियत?
 -------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

 
 

विपरीत चिंतन होने लगे तो तुरंत लाइन काट दो, - "नहीं मैं ही गलत हूँ, वो सही है, उनसे गलत काम हो ही नहीं सकता।" जैसे खाना खाते समय यदि एक चीज भी गलत आई,थोड़ी सी प्रतिकूल चीज भी आई,मुख से बाहर निकाल दिया। ऐसे ही आत्मा के प्रतिकूल पदार्थ यानि प्रतिकूल चिंतन प्रारम्भ होते ही इलाज़ करो, अन्यथा द्रौपदी के चीर की भाँति बढ़ता ही जायेगा,फिर संभल नहीं पायेगा। भगवान कहते हैं ," समस्त शास्त्रों का समस्त ज्ञान समस्त जीव प्राप्त नहीं कर सकते हैं।" यदि वह केवल इतना याद रखे कि विरक्त होकर वास्तविक गुरु के शरणागत हों और प्रतिक्षण गुरु के अनुकूल ही चिंतन व संकल्प करें तो उनका काम बन जायेगा।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
विपरीत चिंतन होने लगे तो तुरंत लाइन काट दो, - "नहीं मैं ही गलत हूँ, वो सही है, उनसे गलत काम हो ही नहीं सकता।" जैसे खाना खाते समय यदि एक चीज भी गलत आई,थोड़ी सी प्रतिकूल चीज भी आई,मुख से बाहर निकाल दिया। ऐसे ही आत्मा के प्रतिकूल पदार्थ यानि प्रतिकूल चिंतन प्रारम्भ होते ही इलाज़ करो, अन्यथा द्रौपदी के चीर की भाँति बढ़ता ही जायेगा,फिर संभल नहीं पायेगा। भगवान कहते हैं ," समस्त शास्त्रों का समस्त ज्ञान समस्त जीव प्राप्त नहीं कर सकते हैं।" यदि वह केवल इतना याद रखे कि विरक्त होकर वास्तविक गुरु के शरणागत हों और प्रतिक्षण गुरु के अनुकूल ही चिंतन व संकल्प करें तो उनका काम बन जायेगा।
 --------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

 
 

Shyama Shyam nam rupa leela guna dhama,
Gao roke rupadhyana yukta athon yama.

Sing the glories of Shyama Shyam’s (Radha Krishna’s) divine names, forms, qualities pastimes and abodes. Shed tears of longing for Them with your mind absorbed in Their loving remembrance.
-------jagadguru shree kripalu ji maharaj.
Shyama Shyam nam rupa leela guna dhama,
Gao roke rupadhyana yukta athon yama.

Sing the glories of Shyama Shyam’s (Radha Krishna’s) divine names, forms, qualities pastimes and abodes. Shed tears of longing for Them with your mind absorbed in Their loving remembrance.
-------jagadguru shree kripalu ji maharaj.

Sunday, February 3, 2013



जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज समझाते हैं ..............

जिसने अनुकूल ही रहने का निश्चय कर लिया है । फिर उसका कोई क्या कर लेगा? रामानंद सरीखे संत ने कबीरदास से कह दिया कि हम तुमको चेला नहीं बनायेंगे. कबीरदास ने सोचा, बहुत भोले हैं

गुरूजी.. '''''कहीं गुरु चेला बनाया करता है ! गुरु चेला नहीं बनाता, चेला गुरु बनाया करता है..''''' मैं तुम्हारे अनुकूल चिंतन ही करूँगा तब तुम क्या करोगे? उसने वही किया और वह इतना बड़ा संत कबीरदास बन गया ।

 प्रथम श्रद्धा युक्त हो जा, शरण गुरु पद प्यारे |
गुरु की बुद्धि में जोड़ निज बुद्धि, है शरण यह प्यारे |
आँसू भक्त का आभूषण है।



.....श्री महाराजजी।
Word of wisdom:

God's greatest grace is that, if we love Him without the slightest tinge of self seeking, He becomes willing to be enslaved by us tiny souls.

The way to achieve fearlessness is to become detached. That is also the science of work : do your duty, but be detached from the results.
......SHRI MAHARAJJI.
Word of wisdom: 

God's greatest grace is that, if we love Him without the slightest tinge of self seeking, He becomes willing to be enslaved by us tiny souls.

The way to achieve fearlessness is to become detached. That is also the science of work : do your duty, but be detached from the results
हमें कभी भी मन मे निराशा नहीं लाना है, दृढ़ विश्वास जमाना है, ये नहीं सोचना है की साधना करते हुये इतने दिन हो गये, इतने साल बीत गये लेकिन हमारा काम अब तक नहीं बना । ये सोचिये की अब तो उनके हो गये, उनके हाथों बिक गये सब कुछ दे दिया अब time से क्या मतलब । आज मिले कल मिले हजार जन्म बाद मिले या न मिले । हमारा काम उनको अपना मान कर उनकी सेवा की याचना करना । उनकी विरह में तड़पते रहना बस हमारी इतनी ड्यूटि है । इसके आगे सोचना नहीं है, सोचना विचारना बुद्धि लगाना ये शरणागति काम नहीं है ।
!! जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज !!
हमें कभी भी मन मे निराशा नहीं लाना है, दृढ़ विश्वास जमाना है, ये नहीं सोचना है की साधना करते हुये इतने दिन हो गये, इतने साल बीत गये लेकिन हमारा काम अब तक नहीं बना । ये सोचिये की अब तो उनके हो गये, उनके हाथों बिक गये सब कुछ दे दिया अब time से क्या मतलब । आज मिले कल मिले हजार जन्म बाद मिले या न मिले । हमारा काम उनको अपना मान कर उनकी सेवा की याचना करना । उनकी विरह में तड़पते रहना बस हमारी इतनी ड्यूटि है । इसके आगे सोचना नहीं है, सोचना विचारना बुद्धि लगाना ये शरणागति काम नहीं है । 
by-!! जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज !!

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...