Monday, February 4, 2013

सुनु वंशीवारे साँवरे |
लख चौरासी योनि चराचर, चलत पिराने पाँव रे |
यदपि मिली नर तनु सुर दुर्लभ, लागी भल यह दाँव रे |
तदपि न तुम सन हेत करत मन, लेत न तुम्हरो नाँव रे |
मृग मृगजल ज्यों प्यास बुझत नहिं, धोखा है सब ठाँव रे |
...
अब कृपालु अपनाव ‘कृपालुहिं’, देहु वास नँदगाँव रे ||

भावार्थ - हे मुरली मनोहर श्यामसुन्दर ! हमारी भी सुन लो | जड़ चेतनात्मक चौरासी लाख योनियों में भटकते - भटकते हमारे पाँव थक गये | यधपि देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानव देह हमें मिली | बड़ा अच्छा अवसर है | किन्तु यह मूढ़ मन न तुम्हारा नाम लेता है और न तुमसे प्रेम ही करता है | जैसे हिरन की प्यास मरुस्थल में उड़ते हुए बालू के कणों पर सूर्य - रश्मियों के पड़ने में भ्रमवश दीखने वाले जल से नहीं बुझती, उसी प्रकार सांसारिक पदार्थों के विषयों से इन्द्रिय मन आदि की तृप्ति नहीं होती | हे कृपासिन्धु ! अब ‘श्री कृपालु जी’ को अपना बनाकर नन्दग्राम का वासी बना दो |

( प्रेम रस मदिरा दैन्य - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.

 

परेशान नहीं करती उनको ज़िंदगी की ठोकरें ..........

जिन्हें तेरा नाम लेकर संभल जाने की आदत है .......

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परेशान नहीं करती उनको ज़िंदगी की ठोकरें ..........

जिन्हें तेरा नाम लेकर संभल जाने की आदत है .......

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जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----श्री महाराजजी.
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
 -----श्री महाराजजी.

 
भगवान का नाम,रूप,लीला,गुण,धाम एवं उनके भक्त सब एक ही हैं,इनमे कहीं भी मन का अनुराग अनन्यता ही है।
भगवान का नाम,रूप,लीला,गुण,धाम एवं उनके भक्त सब एक ही हैं,इनमे कहीं भी मन का अनुराग अनन्यता ही है।

 
 

MY MIND! BE HUMBLE,SELFLESS AND WHOLEHEARTEDLY SURRENDER TO YOUR BELOVED MASTER,AND ALWAYS TRY TO PLEASE HIM WITH YOUR SINCERE SERVICES.
******RADHEY-RADHEY********

O MY MIND! BE HUMBLE,SELFLESS AND WHOLEHEARTEDLY SURRENDER TO YOUR BELOVED MASTER,AND ALWAYS TRY TO PLEASE HIM WITH YOUR SINCERE SERVICES.
 ******RADHEY-RADHEY********

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।
श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
 एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

 

पहले नदी पार हो जाओ ,तब नाव को चैलेंज करो। अगर 10 फीट भी अभी नदी पार करना शेष है ,जहाँ अगाध पानी है सिर के ऊपर और आपने कहा - अब क्या है, कूद पड़ो। न, न अभी ख़तरा है, संकट अभी टला नहीं है। नामापराध यानि संत के प्रति अपराध कर देने पर ,भावभक्ति पर जाकर (जब भगवतदर्शन होने वाला होता है) वह उच्च कोटि का साधक भी अभाव भक्ति यानि भक्ति में शून्यता को प्राप्त हो जाता है, साधारण जीव की क्या हैसियत?
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
पहले नदी पार हो जाओ ,तब नाव को चैलेंज करो। अगर 10 फीट भी अभी नदी पार करना शेष है ,जहाँ अगाध पानी है सिर के ऊपर और आपने कहा - अब क्या है, कूद पड़ो। न, न अभी ख़तरा है, संकट अभी टला नहीं है। नामापराध यानि संत के प्रति अपराध कर देने पर ,भावभक्ति पर जाकर (जब भगवतदर्शन होने वाला होता है) वह उच्च कोटि का साधक भी अभाव भक्ति यानि भक्ति में शून्यता को प्राप्त हो जाता है, साधारण जीव की क्या हैसियत?
 -------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...