Wednesday, February 6, 2013

Follow your Guru’s instructions completely and do not exercise your intellect independently.

अपनी बुद्धि को संत की बुद्धि में जोड़ दो।

------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ(LOVINGLY CALLED "SHRI MAHARAJJI" BY DEVOTEES.)
Follow your Guru’s instructions completely and do not exercise your intellect independently.

 अपनी बुद्धि को संत की बुद्धि में जोड़ दो।

 ------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ(LOVINGLY CALLED "SHRI MAHARAJJI" BY DEVOTEES.)

 
 

अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु(जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज) ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु(जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज) ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।
 
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।

Tuesday, February 5, 2013

सुख का अनुभव करते समय भी भगवान् को मत भूलो तथा दुःखकाल में भी उनकी कृपा का अनुभव करो।
........श्री महाराजजी।
सुख का अनुभव करते समय भी भगवान् को मत भूलो तथा दुःखकाल में भी उनकी कृपा का अनुभव करो।
........श्री महाराजजी।

 

    सत्संग हो या कुसंग, मनुष्य जैसा संग करता है वैसा बन जाता है।
    .........श्री महाराजजी।
    सत्संग हो या कुसंग, मनुष्य जैसा संग करता है वैसा बन जाता है।
 .........श्री महाराजजी।

     

    मन का ईश्वर में लगाव नित्य और निरंतर होना चाहिए।
    ......श्री महाराजजी।
    मन का ईश्वर में लगाव नित्य और निरंतर होना चाहिए।
......श्री महाराजजी।

     

    Think that your worshipped form of God and Guru are always and everywhere with you as your guardians and observers.
    .......SHRI MAHARAJJI.
    Think that your worshipped form of God and Guru are always and everywhere with you as your guardians and observers.
.......SHRI MAHARAJJI.

     
     

    सहनशीलता बढ़ाओ, नम्रता बढ़ाओ, दीनता बढ़ाओ।
    .....श्री महाराजजी।
    सहनशीलता बढ़ाओ, नम्रता बढ़ाओ, दीनता बढ़ाओ।
.....श्री महाराजजी।

     

    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...