This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, February 8, 2013
One who aspires for divine love should aim to be more humble than a blade of grass and more forbearing than a tree. Believe all to be superior to oneself and believe oneself to be the most sinful of all. This feeling will destroy ego and give rise to true humility; only then will the mind and heart be purified.
--------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
देखिये , दो बात पर जोर दिया जा रहा है ! एक तो इष्टदेव का ध्यान , क्योंकि उपासना मनको करनी है इसलिये नं . 1- रूपध्यान ! और दूसरी चीज़ जो सामने लाई गयी वह है सेवा वासना बढ़ाना ! मैंने आप लोगों को बताया था न कि जो दिव्य प्रेम गुरु के द्वारा मिलेगा उस प्रेम से सेवा मिलेगी ! तो अंतिम लक्ष्य सेवा है ! इसलिये अभी से सेवा की वासना बढ़ाना है ! अब भगवान् जब तक प्राप्त नहीं हैं गुरु सेवा बढ़ाना है , वह भावना , वासना वह इच्छा बढ़ाना है ! अपनी शक्ति के अनुसार वह सेवा भावना गुरु के प्रति हुई , भगवान के प्रति वाला फल देती है ! और फिर वह वासना साधना करते - करते जब भगवत प्राप्ति कराती है तो सेवा में
उसका बहुत बड़ा उपयोग स्वाभाविक रूप से हो जाता है ! इसलिये दो बांते ध्यान रखनी हैं - मन से रूपध्यान और सेवा वासना बढ़ाना !
*************जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***************
उसका बहुत बड़ा उपयोग स्वाभाविक रूप से हो जाता है ! इसलिये दो बांते ध्यान रखनी हैं - मन से रूपध्यान और सेवा वासना बढ़ाना !
*************जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***************
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