Saturday, February 9, 2013

अरे मैं तो तैयार बैठा हूँ देने के लिए, कोई लेने वाला तो हो .......
अनाधिकारी को भी अधिकारी मैं बना दूंगा , कोई बात तो माने मेरी........
किसी को परवाह ही नहीं अपनी , तो मैं क्या कर लूँगा ?
.............श्री महाराजजी।
अरे मैं तो तैयार बैठा हूँ देने के लिए, कोई लेने वाला तो हो .......
अनाधिकारी को भी अधिकारी मैं बना दूंगा , कोई बात तो माने मेरी........ 
किसी को परवाह ही नहीं अपनी , तो मैं क्या कर लूँगा ?
.............श्री महाराजजी।

 

जो भगवान के शरणागत होने का अभ्यास करता है अर्थात मन को जगत से हटाकर श्रीकृष्ण में ही सर्वदा लगाने का अभ्यास करता है, वह सतसंपर्दायवादी है। और ठीक इसके विपरीत जो मायिक जगत में सुख मानते हुए तदर्थ प्रयत्नशील है, वह माया के संपर्दाय वाला है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
जो भगवान के शरणागत होने का अभ्यास करता है अर्थात मन को जगत से हटाकर श्रीकृष्ण में ही सर्वदा लगाने का अभ्यास करता है, वह सतसंपर्दायवादी है। और ठीक इसके विपरीत जो मायिक जगत में सुख मानते हुए तदर्थ प्रयत्नशील है, वह माया के संपर्दाय वाला है।
 ------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

 
 

Time is valuable so it should not be wasted. The past is over and the future is uncertain. Only the present is in our hands. Use it for the attainment of Shree Krishna's love before it is too late.
......SHRI MAHARAJJI.
Time is valuable so it should not be wasted. The past is over and the future is uncertain. Only the present is in our hands. Use it for the attainment of Shree Krishna's love before it is too late.
 ......SHRI MAHARAJJI.

 

Friday, February 8, 2013



श्री महाराजजी के श्रीमुख से.................

1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।

2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
...

3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।


4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।


6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।

7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है.

-------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज.
 

 






भगवतविषय की प्यास ही किशोरी जी का रूप है !
------श्री महाराज जी।


One who aspires for divine love should aim to be more humble than a blade of grass and more forbearing than a tree. Believe all to be superior to oneself and believe oneself to be the most sinful of all. This feeling will destroy ego and give rise to true humility; only then will the mind and heart be purified.
--------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
To derive spiritual benefit, the mind must be exclusively united with the omnipresent God.
उस व्यापक ईश्वर का लाभ पाने के लिये ईश्वर में मन को एक करना होगा।
***jagadguru shri kripalu ji maharaj***
To derive spiritual benefit, the mind must be exclusively united with the omnipresent God. 
उस व्यापक ईश्वर का लाभ पाने के लिये ईश्वर में मन को एक करना होगा।
******jagadguru shri kripalu ji maharaj******

 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...