Monday, February 11, 2013

अहंकार और प्रेम...........

जगत की और देखने वाला अहंकार से भरा हुआ हो जाता है,प्रभु की और देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है।

अहंकार सदा लेकर प्रसन्न होता है,प्रेम सदा देकर संतुष्ट होता है।
...
अहंकार को अकड़ने का अभ्यास है,प्रेम सदा झुक कर रहता है।

अहंकार जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है,प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है।

अहंकार दूसरों को ताप देता है,प्रेम शीतल मीठे जल सी तृप्ति देता है।

अहंकार संग्रह में लगा रहता है,प्रेम बाँट-बाँट कर आगे बढ़ता है।

अहंकार सबसे आगे रहना चाहता है,प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है।

अहंकार सब कुछ पाकर भी भिखारी है ,प्रेम अकिंचन रहकर भी पूर्ण धनी है।
अहंकार और प्रेम...........

जगत की और देखने वाला अहंकार से भरा हुआ हो जाता है,प्रभु की और देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है।

अहंकार सदा लेकर प्रसन्न होता है,प्रेम सदा देकर संतुष्ट होता है।

अहंकार को अकड़ने का अभ्यास है,प्रेम सदा झुक कर रहता है।

अहंकार जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है,प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है।

अहंकार दूसरों को ताप देता है,प्रेम शीतल मीठे जल सी तृप्ति देता है।

अहंकार संग्रह में लगा रहता है,प्रेम बाँट-बाँट कर आगे बढ़ता है।

अहंकार सबसे आगे रहना चाहता है,प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है।

अहंकार सब कुछ पाकर भी भिखारी है ,प्रेम अकिंचन रहकर भी पूर्ण धनी है।

 
 

 

सोचिए हम कितने सौभाग्यशाली हैं………………

श्री भगवान की महती अनुकम्पा से लाखो योनियों मे से कुछ जीवो को मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। इस मनुष्य शरीर मे भी कई हजार लोगो मे कोई एक वेद सम्मत धर्म कर्म मे रुचि रखता है। ऐसे कई हजार लोगो मे कोई एक निश्चित और प्रमाणिक पथ का अनुसरण कर भगवत प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। ऐसे कई हजार जिज्ञासु जीवों मे किसी एक को वास्तविक श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की प्राप्ति होती है और ऐसे कई हजार गुरु कृपा प्राप्त साधकों में से कोई एक रसिक महापुरुष अर्थात गोपी प्रेम प्राप्त महापुरुष का सत्संग प्राप्त करता है। इससे ही ज्ञात होता है कि ब्रजरस के मुर्तिमान स्वरुप 'कृपालु महाप्रभु' का सत्संग कितना दुर्लभतम है। श्री महाराजजी अपनी उदारता, दानशीलता और कृपा के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। उनका ऐसा स्वभाव है कि वे अकारण ही जीवों पर अनवरत कृपा करते रहते हैं।
सोचिऐ ऐसे रसिक शिरोमणि गुरु के हमारे लिए सहज सुलभ हो जाने पर भी हम उनकी आज्ञापालन मे क्यों लापरवाही कर रहे हैं ????
सोचिए हम कितने सौभाग्यशाली हैं………………

श्री भगवान की महती अनुकम्पा से लाखो योनियों मे से कुछ जीवो को मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। इस मनुष्य शरीर मे भी कई हजार लोगो मे कोई एक वेद सम्मत धर्म कर्म मे रुचि रखता है। ऐसे कई हजार लोगो मे कोई एक निश्चित और प्रमाणिक पथ का अनुसरण कर भगवत प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। ऐसे कई हजार जिज्ञासु जीवों  मे किसी एक को वास्तविक श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की प्राप्ति होती है और ऐसे कई हजार गुरु कृपा प्राप्त साधकों में से  कोई एक रसिक महापुरुष अर्थात गोपी प्रेम प्राप्त महापुरुष का सत्संग प्राप्त करता है। इससे ही ज्ञात होता है कि ब्रजरस के मुर्तिमान स्वरुप 'कृपालु महाप्रभु' का सत्संग कितना दुर्लभतम है। श्री महाराजजी अपनी उदारता, दानशीलता और कृपा के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। उनका ऐसा स्वभाव है कि वे अकारण ही जीवों  पर अनवरत कृपा करते रहते हैं।
 सोचिऐ ऐसे रसिक शिरोमणि गुरु के हमारे लिए सहज सुलभ हो जाने पर भी हम उनकी आज्ञापालन मे क्यों लापरवाही कर रहे हैं ????

 

संसार से राग (अनुकुल भाव युक्त) जितना पतन कारक है, उतना ही द्वेष (प्रतिकुल भाव युक्त) भी पतन कारक है । अतएव संसारी राग द्वेष रहित होने पर ही साधना संभव है । यही वास्तविक वैराग्य है । सब में श्रीकृष्ण का समान रुप से निवास है, अतः सब में समान भावना रखना है ।

सिद्ध (भगवत् प्राप्त महापुरुष) के चिन्तन से ही मन शुद्ध होता है । भावार्थ यह की हरि + गुरु से प्रेम हो एवं संसार से राग द्वेष रहित (उदासीन) भाव रहे । यही साधक का सच्चा स्वरुप है ॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
संसार से राग (अनुकुल भाव युक्त) जितना पतन कारक है, उतना ही द्वेष (प्रतिकुल भाव युक्त) भी पतन कारक है । अतएव संसारी राग द्वेष रहित होने पर ही साधना संभव है । यही वास्तविक वैराग्य है । सब में श्रीकृष्ण का समान रुप से निवास है, अतः सब में समान भावना रखना है । 

सिद्ध (भगवत् प्राप्त महापुरुष) के चिन्तन से ही मन शुद्ध होता है । भावार्थ यह की हरि + गुरु से प्रेम हो एवं संसार से राग द्वेष रहित (उदासीन) भाव रहे । यही साधक का सच्चा स्वरुप है ॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज
 

Saturday, February 9, 2013

AREY MAN,AVSAR BITYO JAT.........अरे! मन अवसर बीत्यों जात।

You are asleep in a illusionary trance created by our own mind. You are approaching death everyday and yet you cheerfully celebrate your Birthday. You do not realize that each day which is passing by is not a joyful moment, but a matter of regret, that so much time has passed away and very little remains. So without further delay and realizing that this body is temporary, you should start doing Sadhana from this moment.
AREY MAN,AVSAR BITYO JAT.........अरे! मन अवसर बीत्यों जात। 


You are asleep in a illusionary trance created by our own mind. You are approaching death everyday and yet you cheerfully celebrate your Birthday. You do not realize that each day which is passing by is not a joyful moment, but a matter of regret, that so much time has passed away and very little remains. So without further delay and realizing that this body is temporary, you should start doing Sadhana from this moment.

 



WHO ARE YOU!


Innumerable Salutations to YOU!
Countless Obeisances to YOU.
My sweet MASTER! the ocean of LOVE!
Master of sweetness!
A perennial source of JOY!
No one knows WHO ARE YOU!

Scholars accept YOU as the 5th JAGADGURU,
Supreme Amongst All,
Artist hail YOU,The Greatest Artist'.
Musicians try to imitate the Way.YOU sing,but fail,
When YOU sing,stone heart melts,
Dry hearts feel a new joy,a new thrill,
Poets marvel,'A SUPER HUMAN SKILL'.
New poetry springs out,
Within no time with no effort,
The poor adore YOU,'OUR BEST FRIEND'.
The sinners(like sharad ie.'me') finds a new hope for their redemption.

Devotees proclaim in ecstasy,
"AN INCARNATION OF DEVOTION"
And "PERSONIFICATION OF LOVE"
BUT NO ONE KNOWS TILL DATE THAT "WHO ARE YOU".
WHO ARE YOU!
 

Innumerable Salutations to YOU!
 Countless Obeisances to YOU.
 My sweet MASTER! the ocean of LOVE!
 Master of sweetness! 
A perennial source of JOY!
 No one knows WHO ARE YOU!
 
Scholars accept YOU as the 5th JAGADGURU,
 Supreme Amongst All,
 Artist hail YOU,The Greatest Artist'.
 Musicians try to imitate the Way.YOU sing,but fail,
 When YOU sing,stone heart melts,
 Dry hearts feel a new joy,a new thrill,
 Poets marvel,'A SUPER HUMAN SKILL'.
 New poetry springs out,
 Within no time with no effort,
 The poor adore YOU,'OUR BEST FRIEND'.
 The sinners(like sharad ie.'me') finds a new hope for their redemption. 

Devotees proclaim in ecstasy,
 "AN INCARNATION OF DEVOTION"
 And "PERSONIFICATION OF LOVE"
 BUT NO ONE KNOWS TILL DATE THAT "WHO ARE YOU"."
हमारी श्यामा, रसिकन - मुकुट - मनी |
इन्द्राणी, रुद्राणी, वाणी, जेतिक मणिरमनी |
रूपध्यान साधे आराधे, राधे गजगमनी |
ब्रज महँ अस ब्रजरस बरसावति, लजत विकुंठ धनी |
भृकुटि - विलास लखत कमलापति, किमि कमला कमनी |
...
सोइ ‘कृपालु’ वनचरिन बनायो, प्रानसखी अपनी ||

भावार्थ - हमारी किशोरी जी समस्त रसिकों के शिरोमणि की भी शिरोमणि हैं | इन्द्राणी, पार्वती, सरस्वती इत्यादि जितनी भी श्री – शिरोमणि - रत्न हैं, वे सब रूपध्यान करते हुए हमारी किशोरी जी की निरन्तर उपासना करती हैं | हमारी किशोरी जी ब्रज में ब्रजांगनाओं के साथ ऐसा दिव्यरस बरसाती हैं कि उसे देखकर बैकुण्ठ के स्वामी महाविष्णु भी लज्जित हो जाते हैं | महालक्ष्मी की तो गणना ही क्या है, महालक्ष्मी के स्वामी महाविष्णु भी भयभीत होकर किशोरी जी के भृकुटि - विलास को देखते रहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं वही किशोरी जी अकारण - करुण स्वभाव के कारण अशिक्षित वनचारियों को अपनी प्राणसखी बनाकर नित्य - रास में नित्य स्थान देती हैं |

( प्रेम रस मदिरा श्रीराधा – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
हमारी श्यामा, रसिकन - मुकुट - मनी |
इन्द्राणी, रुद्राणी, वाणी, जेतिक मणिरमनी | 
रूपध्यान साधे आराधे, राधे गजगमनी |
ब्रज महँ अस ब्रजरस बरसावति, लजत विकुंठ धनी |
भृकुटि - विलास लखत कमलापति, किमि कमला कमनी |
सोइ ‘कृपालु’ वनचरिन बनायो, प्रानसखी अपनी ||


भावार्थ  -  हमारी किशोरी जी समस्त रसिकों के शिरोमणि की भी शिरोमणि हैं | इन्द्राणी, पार्वती, सरस्वती इत्यादि जितनी भी श्री – शिरोमणि - रत्न हैं, वे सब रूपध्यान करते हुए हमारी किशोरी जी की निरन्तर उपासना करती हैं | हमारी किशोरी जी ब्रज में ब्रजांगनाओं के साथ ऐसा दिव्यरस बरसाती हैं कि उसे देखकर बैकुण्ठ के स्वामी महाविष्णु भी लज्जित हो जाते हैं | महालक्ष्मी की तो गणना ही क्या है, महालक्ष्मी के स्वामी महाविष्णु भी भयभीत होकर किशोरी जी के भृकुटि - विलास को देखते रहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं वही किशोरी जी अकारण -   करुण स्वभाव के कारण अशिक्षित वनचारियों को अपनी प्राणसखी बनाकर नित्य - रास में नित्य स्थान देती हैं |


( प्रेम रस मदिरा   श्रीराधा – माधुरी )
  जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

 
गुरु मिले कृपा रिझवार, गुरु कृपा मिले सरकार |
दोउ कृपा रूप साकार, गुरु महिमा अपरंपार ||

गुरु कह भजु नंदकुमार, गुरु कहँ भजु कह रिझवार |
दोउ दास्य धर्म उर धार, गुरु महिमा अपरंपार ||

.............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.............
गुरु मिले कृपा रिझवार, गुरु कृपा मिले सरकार |
दोउ कृपा रूप साकार, गुरु महिमा अपरंपार ||

गुरु कह भजु नंदकुमार, गुरु कहँ भजु कह रिझवार |
दोउ दास्य धर्म उर धार, गुरु महिमा अपरंपार ||    

.............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.............

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...