Monday, February 11, 2013

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:

क्रोध आया कि सर्वनाश हुआ। बदतमीज़ कहने पर 'बदतमीज़' बन गए। आप इतने मूर्ख हैं कि एक मूर्ख ने 'मूर्ख' कह कर आपको मूर्ख बना दिया।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:

 क्रोध आया कि सर्वनाश हुआ। बदतमीज़ कहने पर 'बदतमीज़' बन गए। आप इतने मूर्ख हैं कि एक मूर्ख ने 'मूर्ख' कह कर आपको मूर्ख बना दिया।

 
 

 
"गुरु के व्यवहार को कभी मत देखो। सदा यह सोचो कि वो कुछ भी करें, कैसा भी व्यवहार करें , हमें इससे कोई मतलब नहीं। बस हमें तो आज्ञा पालन करना है। चाहे वो हमसे आँखें फेर लें, चाहे डांट लगायें, लेकिन हमारे प्यार में कभी कमी नहीं आयेगी। सदा उनको सुख पहुंचाना ही हमारे जीवन का प्रथम लक्ष्य है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।"
 
 
Shyama says, “All glories to Shyam!” Shyam says, “All glories to Shyama!” Shyama, Shyam and the Braj Gopis are all equally glorious. None is less than any of the others.
-------jagadguru shri kripalu ji maharaj .
Shyama says, “All glories to Shyam!” Shyam says, “All glories to Shyama!” Shyama, Shyam and the Braj Gopis are all equally glorious. None is less than any of the others.
-------jagadguru shri kripalu ji maharaj .
कृपामयी राधे, मेरे ऊपर भी तो कृपा करो, मुझ पर कृपा करने से तुम्हारे कृपा के भंडार मे कोई कमी नहीं आएगी अपितु तुम्हारे यश का ही विस्तार होगा।
हे! राधे, तुम्हारा तन, मन, प्राण सब कृपा द्वारा ही निर्मित है। तुम तो कृपा का ही एक दूसरा स्वरूप हो। राधे ! कृपा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य तुम नहीं कर सकती कृपा किए बिना तुमसे रहा भी नहीं जाता, जिस प्रकार संसार मे मछ्ली जल से ही जीवित रहती है उसी प्रकार कृपा ही तुम्हारा जीवन है अर्थात तुमने जीवन धारण ही कृपा करने के लिए किया है संसार मे सुर, नर, मुनि भी कृपा करते देखे जाते हैं परंतु वे बिना कारण के कृपा नहीं कर सकते।

.......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।



अहंकार और प्रेम...........

जगत की और देखने वाला अहंकार से भरा हुआ हो जाता है,प्रभु की और देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है।

अहंकार सदा लेकर प्रसन्न होता है,प्रेम सदा देकर संतुष्ट होता है।
...
अहंकार को अकड़ने का अभ्यास है,प्रेम सदा झुक कर रहता है।

अहंकार जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है,प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है।

अहंकार दूसरों को ताप देता है,प्रेम शीतल मीठे जल सी तृप्ति देता है।

अहंकार संग्रह में लगा रहता है,प्रेम बाँट-बाँट कर आगे बढ़ता है।

अहंकार सबसे आगे रहना चाहता है,प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है।

अहंकार सब कुछ पाकर भी भिखारी है ,प्रेम अकिंचन रहकर भी पूर्ण धनी है।
अहंकार और प्रेम...........

जगत की और देखने वाला अहंकार से भरा हुआ हो जाता है,प्रभु की और देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है।

अहंकार सदा लेकर प्रसन्न होता है,प्रेम सदा देकर संतुष्ट होता है।

अहंकार को अकड़ने का अभ्यास है,प्रेम सदा झुक कर रहता है।

अहंकार जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है,प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है।

अहंकार दूसरों को ताप देता है,प्रेम शीतल मीठे जल सी तृप्ति देता है।

अहंकार संग्रह में लगा रहता है,प्रेम बाँट-बाँट कर आगे बढ़ता है।

अहंकार सबसे आगे रहना चाहता है,प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है।

अहंकार सब कुछ पाकर भी भिखारी है ,प्रेम अकिंचन रहकर भी पूर्ण धनी है।

 
 

 

सोचिए हम कितने सौभाग्यशाली हैं………………

श्री भगवान की महती अनुकम्पा से लाखो योनियों मे से कुछ जीवो को मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। इस मनुष्य शरीर मे भी कई हजार लोगो मे कोई एक वेद सम्मत धर्म कर्म मे रुचि रखता है। ऐसे कई हजार लोगो मे कोई एक निश्चित और प्रमाणिक पथ का अनुसरण कर भगवत प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। ऐसे कई हजार जिज्ञासु जीवों मे किसी एक को वास्तविक श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की प्राप्ति होती है और ऐसे कई हजार गुरु कृपा प्राप्त साधकों में से कोई एक रसिक महापुरुष अर्थात गोपी प्रेम प्राप्त महापुरुष का सत्संग प्राप्त करता है। इससे ही ज्ञात होता है कि ब्रजरस के मुर्तिमान स्वरुप 'कृपालु महाप्रभु' का सत्संग कितना दुर्लभतम है। श्री महाराजजी अपनी उदारता, दानशीलता और कृपा के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। उनका ऐसा स्वभाव है कि वे अकारण ही जीवों पर अनवरत कृपा करते रहते हैं।
सोचिऐ ऐसे रसिक शिरोमणि गुरु के हमारे लिए सहज सुलभ हो जाने पर भी हम उनकी आज्ञापालन मे क्यों लापरवाही कर रहे हैं ????
सोचिए हम कितने सौभाग्यशाली हैं………………

श्री भगवान की महती अनुकम्पा से लाखो योनियों मे से कुछ जीवो को मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। इस मनुष्य शरीर मे भी कई हजार लोगो मे कोई एक वेद सम्मत धर्म कर्म मे रुचि रखता है। ऐसे कई हजार लोगो मे कोई एक निश्चित और प्रमाणिक पथ का अनुसरण कर भगवत प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। ऐसे कई हजार जिज्ञासु जीवों  मे किसी एक को वास्तविक श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की प्राप्ति होती है और ऐसे कई हजार गुरु कृपा प्राप्त साधकों में से  कोई एक रसिक महापुरुष अर्थात गोपी प्रेम प्राप्त महापुरुष का सत्संग प्राप्त करता है। इससे ही ज्ञात होता है कि ब्रजरस के मुर्तिमान स्वरुप 'कृपालु महाप्रभु' का सत्संग कितना दुर्लभतम है। श्री महाराजजी अपनी उदारता, दानशीलता और कृपा के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। उनका ऐसा स्वभाव है कि वे अकारण ही जीवों  पर अनवरत कृपा करते रहते हैं।
 सोचिऐ ऐसे रसिक शिरोमणि गुरु के हमारे लिए सहज सुलभ हो जाने पर भी हम उनकी आज्ञापालन मे क्यों लापरवाही कर रहे हैं ????

 

संसार से राग (अनुकुल भाव युक्त) जितना पतन कारक है, उतना ही द्वेष (प्रतिकुल भाव युक्त) भी पतन कारक है । अतएव संसारी राग द्वेष रहित होने पर ही साधना संभव है । यही वास्तविक वैराग्य है । सब में श्रीकृष्ण का समान रुप से निवास है, अतः सब में समान भावना रखना है ।

सिद्ध (भगवत् प्राप्त महापुरुष) के चिन्तन से ही मन शुद्ध होता है । भावार्थ यह की हरि + गुरु से प्रेम हो एवं संसार से राग द्वेष रहित (उदासीन) भाव रहे । यही साधक का सच्चा स्वरुप है ॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
संसार से राग (अनुकुल भाव युक्त) जितना पतन कारक है, उतना ही द्वेष (प्रतिकुल भाव युक्त) भी पतन कारक है । अतएव संसारी राग द्वेष रहित होने पर ही साधना संभव है । यही वास्तविक वैराग्य है । सब में श्रीकृष्ण का समान रुप से निवास है, अतः सब में समान भावना रखना है । 

सिद्ध (भगवत् प्राप्त महापुरुष) के चिन्तन से ही मन शुद्ध होता है । भावार्थ यह की हरि + गुरु से प्रेम हो एवं संसार से राग द्वेष रहित (उदासीन) भाव रहे । यही साधक का सच्चा स्वरुप है ॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...