Tuesday, February 12, 2013

ALL THE NAMES,VIRTUES,LEELAS,ABODES AND THE RASIK SAINTS OF RADHA KRISHN ARE TOTALLY SYNONYMOUS.
------SHRI MAHARAJJI.
ALL THE NAMES,VIRTUES,LEELAS,ABODES AND THE RASIK SAINTS OF RADHA KRISHN ARE TOTALLY SYNONYMOUS.
 ------SHRI MAHARAJJI.

 
 

There were eighty eight thousand paramahamsas headed by Shaunaka, they asked Suta Ji, What is the superior path ? How can we attain our ultimate goal of Divine Bliss .Suta JI answered in a single verse "DEVOTION TO Shri Krishna is the simplest and the easiest in the age of Kali Yug. At another place in the Bhagavatam, Parikshit asked Shukadeva Paramahamsa " Please briefly instruct me as to how I can attain my goal." Shukadeva .. replied "Practice exclusive selfless devotion to Shri Krishna , abandoning all kinds of worldly desires including the desire for liberation ".... One should not be lazy in the matter of acquiring spiritual knowledge.
" Excerpt Bhagavad bhakti by ..Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj JI .........JAI SHREE RADHEY.
There were eighty eight thousand paramahamsas headed by Shaunaka, they asked Suta Ji, What is the superior path ? How can we attain our ultimate goal of Divine Bliss .Suta JI answered in a single verse "DEVOTION TO Shri Krishna is the simplest and the easiest in the age of Kali Yug. At another place in the Bhagavatam, Parikshit asked Shukadeva Paramahamsa " Please briefly instruct me as to how I can attain my goal." Shukadeva .. replied "Practice exclusive selfless devotion to Shri Krishna , abandoning all kinds of worldly desires including the desire for liberation ".... One should not be lazy in the matter of acquiring spiritual knowledge.
 " Excerpt Bhagavad bhakti by ..Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj JI .........JAI SHREE RADHEY.

 

 
"मनुष्य का शरीर' 'श्रद्धा' और 'महापुरुष की प्राप्ति' इन तीन चीजों का मिलना अत्यंत दुर्लभ है।
'मनुष्य शरीर' और 'महापुरुष' मिल भी जाये तो तीसरी चीज 'श्रद्धा' मिलना अत्यधिक दुर्लभ है। अनादिकाल से इसी में गड़बड़ी हुई है। अनंत संत हमें मिलें लेकिन हमारी उनके प्रति श्रद्धा नहीं हुई इसलिए हमारा लक्ष्य हमें प्राप्त नहीं हुआ।
पहले श्रद्धा, उसके बाद साधु संग, फिर भक्ति करो - ये नियम है।

-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।"
"मनुष्य का शरीर' 'श्रद्धा' और 'महापुरुष की प्राप्ति' इन तीन चीजों का मिलना अत्यंत दुर्लभ है।
'मनुष्य शरीर' और 'महापुरुष' मिल भी जाये तो तीसरी चीज 'श्रद्धा' मिलना अत्यधिक दुर्लभ है। अनादिकाल से इसी में गड़बड़ी हुई है। अनंत संत हमें मिलें लेकिन हमारी उनके प्रति श्रद्धा नहीं हुई इसलिए हमारा लक्ष्य हमें प्राप्त नहीं हुआ।
 पहले श्रद्धा, उसके बाद साधु संग, फिर भक्ति करो - ये नियम है।

 -----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।"
 
 
 
जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु की कुछ विशेषताएँ........

1- ये पहले जगद्गुरु हैं जिनका कोई गुरु नहीं है और वे स्वयं जगद्गुरुतम हैं ।

2 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने एक भी शिष्य नहीं बनाया किन्तु इनके लाखों अनुयायी हैं ।
...

3 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिनके जीवन काल में ही जगद्गुरुतम उपाधि की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई गई हो ।

4 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने ज्ञान एवं भक्ति दोनों में सर्वोच्चता प्राप्त की व् दोनों का मुक्तहस्त से दान कर रहे हैं ।

5- ये पहले जगद्गुरु हैं जो विदेशों में भी स्वयं प्रचारार्थ गये ।

6- ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने पूरे विश्व में श्री राधाकृष्ण की माधुर्य भक्ति का धुआंधार प्रचार किया एवं सुमधुर श्री राधे नाम को विश्वव्यापी बना दिया ।

7- सभी महान सन्तों ने मन से ईश्वर भक्ति की बात बतायी है , जिसे , ध्यान , सुमिरन , स्मरण या मेडीटेशन आदि नामों से बताया गया है ।श्री कृपालु जी ने प्रथम बार एस ध्यान को ' रूपध्यान ' नाम देकर स्पष्ट किया कि ध्यान की सार्थकता तभी है जब हम भगवान् के किसी मनोवांछित रूप का चयन करके उस रूप पर ही मन को टिकाये रहें। मन को भगवान् के किसी एक रूप पर केन्द्रित करने का नाम ही ध्यान या मन से भक्ति करना है , क्योंकि भगवान् के ही एक रूप पर मन को न टिकने से , मन यत्रतत्र संसार में ही भागता रहेगा। भगवान् को तो देखा नहीं तो फिर उनके रूप का ध्यान कैसे किया जाय , उसका क्या विज्ञान है , उसका अभ्यास कैसे करना है , आदि बातों को - भक्तिरसामृत सिन्धु , नारद भक्ति सूत्र , ब्रह्मसूत्र आदि के द्वारा प्रमाणित करते हुए श्री कृपालु जी महाराज ने प्रथम बार अपने ग्रन्थ ' प्रेम रस सिद्धान्त ' में बड़े स्पष्ट रूप से समझाया है।

8- ये पहले जगद्गुरु हैं जो ९० वर्ष की आयु में भी समस्त उपनिषदों , भागवत आदि पुराणों , ब्रह्मसूत्र , गीता आदि से प्रमाणों के नम्बर इतनी तेज गति से बोलते हैं कि श्रोताओं को स्वीकार करना पड़ता है कि ये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ वास्तविक महापुरुष हैं ।
 
वे हमारी रक्षा करते हैं, वे हमारी रक्षा कर रहे हैं, वे आगे भी हमारी रक्षा करेंगे, इस पर विश्वास कर लो।
------श्री कृपालु भगवान।

 

हरि और गुरु दोनों शुद्ध तत्व हैं ! यदि जीव का अशुद्ध मन हरि एवं गुरु में लग जाता है तब हरि और गुरु के प्रेम में रंग कर वह शुद्ध बन जाता है !
*************जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***************
हरि और गुरु दोनों शुद्ध  तत्व हैं ! यदि जीव का  अशुद्ध मन हरि एवं गुरु में लग जाता है तब हरि और गुरु के प्रेम में रंग कर वह शुद्ध बन जाता है !
*************जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***************

 

श्यामसुन्दर ! तुम अनादिकाल से मेरे थे , और अनंतकाल तक मेरे बने रहोगे , यह वेदों में तुम्हीं ने स्वयं कहा है ! फिर अधम उधारन श्री कृष्ण ! मुझे क्यों भुला दिया ?
********श्री महाराज जी ********

हे श्यामसुन्दर ! तुम अनादिकाल से मेरे थे , और अनंतकाल तक मेरे बने रहोगे ,  यह वेदों में तुम्हीं ने स्वयं कहा है ! फिर अधम उधारन श्री कृष्ण ! मुझे क्यों भुला दिया ?
********श्री महाराज जी ********

 
 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...