Wednesday, February 13, 2013

मन हरि में तन जगत में, कर्मयोग येहि जान।
तन हरि में मन जगत में, यह महान अज्ञान।।

जिसका मन सदा श्यामसुंदर में ही अनुरक्त रहे,और शरीर से संसार का कार्य करे, वह कर्मयोग है। किन्तु जिसका मन संसार में अनुरक्त रहे ,एवं शरीर से भगवद्भक्ति करे ,वह पराकाष्ठा का मूर्ख है।
-------भक्ति शतक.
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से.........
मन हरि में तन जगत में, कर्मयोग येहि जान।
 तन हरि में मन जगत में, यह महान अज्ञान।।

 जिसका मन सदा श्यामसुंदर में ही अनुरक्त रहे,और शरीर से संसार का कार्य करे, वह कर्मयोग है। किन्तु जिसका मन संसार में अनुरक्त रहे ,एवं शरीर से भगवद्भक्ति करे ,वह पराकाष्ठा का मूर्ख है।
-------भक्ति शतक.
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से.........

 
 

लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है, परन्तु हमारा स्वयं का क्या होगा ,इसकी फिक्र नहीं है। आश्चर्य: अपनी फिक्र क्यो नहीं करते हो।
-----श्री कृपालुजी महाराज.
लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है, परन्तु हमारा स्वयं का क्या होगा ,इसकी फिक्र नहीं है। आश्चर्य: अपनी फिक्र क्यो नहीं करते हो।
-----श्री कृपालुजी महाराज.

 
 

हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।
हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।

 
 

दिव्य द्रष्टि प्रदान कर हरि का प्रत्यक्ष दर्शन करा देते हैं !
...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सूर्य के उदय होते ही प्रकाश पा कर वस्तुएँ दिखायी देने लगती हैं ! इसी प्रकार संत दिव्य द्रष्टि प्रदान कर हरि का प्रत्यक्ष दर्शन करा देते हैं !
...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

 
 

 
‎"Tears are an absolutely essential part of sadhana. By shedding tears for God and Guru, we wash our sins away. Then, God and Guru enter the heart and make it pure."
-------shri maharaj ji.
"Tears are an absolutely essential part of sadhana. By shedding tears for God and Guru, we wash our sins away. Then, God and Guru enter the heart and make it pure."
-------shri maharaj ji.
 
 
जब तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ ! जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का ? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्री कृष्ण दासत्व ही है ! श्री कृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो ! हम छूट देते हैं ! लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते ! भगवत्प्राप्ति से पहले रहता है अहंकार ! अतः सदा सावधान रहो !
---------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु।
जब तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ ! जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का ? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्री कृष्ण दासत्व ही है ! श्री कृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो ! हम छूट देते हैं ! लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते ! भगवत्प्राप्ति से पहले रहता है अहंकार ! अतः सदा सावधान रहो !
---------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु।

 



 
क्रोध आवे भी तो भीतर ही रहने दो ! बाहर न आने पावे ये अभ्यास कर लो ! फिर उसके बाद भीतर भी न आने पावे ये अभ्यास कर लो ! एक साहब अपने सर्वेन्ट को डाँटता है कि देर से आया बेवकूफ , गधा और वो कहता है यस सर , यस सर ! भीतर गुस्सा है , बाहर यस सर क्योंकि अगर वो भी कह दे कि गधे ! तुम भी तो देर से आते हो ऑफिस ! भीतर से ऐसे ही कह रहा है लेकिन बाहर से कन्ट्रोल किये हुये है ! कटु वाक्य न बोलो , किसी के अपमान करने पर बाहर से उसका प्रतिवाद न करो और फिर भीतर से निकालो ! सब फैक्ट है ! मान लो तुम ऐसे हो !
*****जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*****
क्रोध आवे भी तो भीतर ही रहने दो ! बाहर न आने पावे ये अभ्यास कर लो ! फिर उसके बाद भीतर भी न आने पावे ये अभ्यास कर लो ! एक साहब अपने सर्वेन्ट को डाँटता है कि देर से आया बेवकूफ ,  गधा और वो कहता है यस सर , यस सर ! भीतर गुस्सा है , बाहर यस सर क्योंकि अगर वो भी कह दे कि गधे ! तुम भी तो देर से आते हो ऑफिस ! भीतर से ऐसे ही कह रहा है लेकिन बाहर से कन्ट्रोल किये हुये है ! कटु वाक्य न बोलो , किसी के अपमान करने पर  बाहर से उसका प्रतिवाद न करो और फिर भीतर से निकालो ! सब फैक्ट है ! मान लो तुम ऐसे हो ! 
**************जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*************

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...